रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१६ रसतरङ्गिणी जाती है तो लोहा में मैल पृथक् होकर नीचे गिर जाता है। जो कुछ वर्षों के बाद पृथ्वी पर पिंडी के रूप में पाया जाता है इसी लोहमल को मंडूर कहते हैं। इसका विशद वर्णन लोहप्रकरण में आ गया है ॥ १२३ ॥ मण्डूरस्य नामानि मण्डूरं तु समाख्यातं किट्टं लोहभवं तथा। लोहकिट्टं लोहमलं लोहोच्छिष्टञ्च तन्मतम् ॥ १२४ ॥ भा.टी.—मंडूर को किट्ट तथा लोहभव, लोहकिट्ट, लोहमल और लोहो- च्छिष्ट नाम से व्यवहार किया जाता है ॥ १२४ ॥ मण्डूरस्य प्राशस्त्यम् षष्टिवर्षीयमधमं मध्यं सप्ततिवार्षिकम् । सर्वश्रेष्ठं समाख्यातं मण्डूरं शतवार्षिकम् ॥ १२५ ॥ मण्डूरप्रशस्तिः कालयोगतारतम्याद् गुणभेदभिन्ना। तथाहि—षष्टिवर्षीयमधमं गुणत इति शेषः, मध्यं सप्ततिवार्षिकम्, अन्यत्र तु "मध्यञ्चाशीतिवार्षिकम्” इत्युक्तम्। सर्वश्रेष्ठमिति पूर्वापेक्षयेति भावः। वस्तुतस्तु शतवर्षोत्तरमुत्तरोत्तरं पुरातनतायां गुणप्रकर्ष इति साम्प्रदायिका भावयन्ति ॥ १२५ ॥ भा.टी.—साठ वर्ष का पुराना मंडूर अधम (बहुत साधारण गुणकारक) और सत्तर वर्ष का पुराना मंडूर मध्यमगुण, किन्तु सौ वर्ष का पुराना मंडूर गुणों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है ॥ १२५ ॥ प्रकारान्तरेण ग्राह्यमण्डूरस्य स्वरूपम् स्निग्धं गुरु दृढं चैव कृष्णं कोटरवर्जितम् । जीर्णं नष्टपुरःस्थञ्च मण्डूरं ग्राह्यमुच्यते ॥ १२६ ॥ जीर्णं नष्टपुरःस्थमिति प्रायः अनेकशतवर्षपुरातनासम्पत्तेरित्यर्थः ॥ १२६ ॥ भा.टी.—जो मंडूर देखने में चिकना, गुरुभार, दृढ, कृष्णवर्ण और गढ़े और छिद्र या खोखलेपन से रहित तथा बहुत पुराने उजड़े हुए शहरों के समीप पाया जाता हो तो वह ग्राह्य मंडूर होता है ॥ १२६ ॥ मण्डूरस्य शोधनविधिः ध्मातं विभीतकाङ्गारैर्गोमूत्रे परिषेचितम् । सप्तवारं लोहमलं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १२७ ॥ ध्मातं विभीतकाङ्गारैरिति शुद्धिः, "अक्षाङ्गारैर्धमेत्किट्टमिति” प्राचीन- संवादात् ॥ १२७ ॥