रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशस्तरङ्गः ५१७ लोहमंडूर को बहेड़े की लकड़ी की अग्नि या उसके तेज अंगारों में तपा- तपाकर सात बार गोमूत्र में बुझाने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ १२७ ॥ प्रकारान्तरेण मण्डूरस्य शोधनविधिः प्रखरदहनतप्तं लोहकिट्टं पुराणं विपुलसुरभिमूत्रे सप्तवारं निषिक्तम् । निगदितविधियोगान्मारणायानुरूपं कलयति खलु शुद्धिं सत्वरं निर्विशेषां ॥ १२८ ॥ भा.टी.—पुराने लोहमंडूर को तीव्र कोयलों की अग्नि में तपाकर गोमूत्र में बुझा दें । इस तरह सात बार गोमूत्र में बुझा देने से वह शुद्ध हो जाता है और आगे लिखी हुई विधि के अनुसार भस्म करने के योग्य हो जाता है॥१२८॥ अथ मण्डूरस्य मारणप्रकारः चूर्णीकृतं तु मण्डूरं त्रिफलाक्वथिताम्भसा । सम्पेप्य सम्पुटे कृत्वा त्रिंशद्वारं ततः पुटेत् ॥ १२६ ॥ एवं नातिचिरादेव रक्तचन्दनसप्रभम् । मण्डूरं जायते तूर्णं ततो योगेषु योजयेत् ॥ १३० ॥ लोहमारकगणोदितैस्तु तैर्भेषजैरपि सह प्रपेषितम् । लोहकिट्टमथ सम्पुटीकृतं पाचितं खलु समेति पच्छताम्॥१३१॥ भा.टी.—शुद्ध मण्डूर को चूर्ण करके त्रिफलाकषाय में घोटकर सुखा लें, अब इसे एक सम्पुट में बन्द करके साधारण पुट में फूँक देवें । इस विधि को तीस बार दुहराने से शीघ्र ही लालचन्दन के वर्ण की उत्तम भस्म हो जाती है । इसको योगों में काम ला सकते हैं । अथवा (शुद्ध) मंडूर को पूर्वोक्त लोह- मारकगण की ओषधियों के स्वरस अथवा कपाय में घोटकर पुट देने से भी मंडूर की भस्म हो जाती है ॥ १२६-१३१ ॥ मृतमण्डूरस्य गुणाः मण्डूरं सुमृतं वृष्यं शिशिरं रुचिरं परम् । दीपनं पित्तशमनं रक्तवृद्धिकरं परम् ॥ १३२ ॥ पाण्डुप्रमत्तमातङ्गमदमर्दनकेशरी । कामलाकुड्यकुलिशं मण्डूरं तु विशेषतः ॥ १३३ । शोषप्रशमनञ्चैव तथा शोफप्रणाशनम् । हलीमकं च प्लीहानं मण्डूरं हन्त्यशेषतः ॥ १३४ ॥