रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१८ रसतरङ्गिणी मण्डूरगुणाः—कामला एव कुड्यं भित्तिः, तत्पातने कुलिशं वज्रमिवेति । अशेषतः सर्वथा ॥ १३२-१३४ ॥ भा.टी.—उत्तम मंडूरभस्म वृष्य, शीत, उत्तम रुचिकारक, अग्निदीपक, पित्तप्रकोपशामक और उत्तम रक्तवर्धक है । यह भस्म तीव्रपाण्डु तथा कामला रोग को नष्ट करने में एक अद्भुत गुण रखती है। और शोषरोगनाशक, शोथ- संहारक, हलीमक तथा प्लीहा वृद्धि को शीघ्र ही शान्त करती है ॥१३२-१३४॥ मण्डूरस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाल्लोहमात्राविधानवित् । गुञ्जाद्वितयपर्यन्तं मण्डूरं विनियोजयेत् ॥ १३५ ॥ मंडूरभस्म को चौथाई रत्ती मात्रा से लेकर दो रत्ती की मात्रा तक प्रयोग किया जाता है ॥ १३५ ॥ मण्डूरस्य आमयिकः प्रयोगः पुनर्नवाष्टकक्वाथसंयुक्तं लोहकिट्टकम् । निषेवितं निहन्त्याशु शोफजां महतीं रुजम् ॥ १३६ ॥ कट्वीफलत्रिकनिशायुग्मचूर्णेन शोलितम् । मण्डूरमचिरादेव नाशयेत्कामलां ध्रुवम् ॥ १३७ ॥ विडङ्गतिफलापञ्चकोलाब्दपरिशीलितम् । मण्डूरं कृमिशोफार्शोग्रहणीप्लीहपाण्डुनुत् ॥ १३८ ॥ रससिन्दूरसंयुक्तं मण्डूरं तु निषेवितम् । मासमात्रप्रयोगेण रक्तवृद्धिकरं परम् ॥ १३६ ॥ दशमूलकषायेण मण्डूरं परिशीलितम् । सशोथं सज्वरं सातिसारं पाण्ड्वामयं हरेत् ॥ १४० ॥ इति लोहादिविज्ञानीया नाम विंशस्तरङ्गः मण्डूरस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—निगदव्याख्यातः । पुनर्नवाष्टकक्वाथः—'पुनर्न- वानिम्बपटोलशुण्ठीतिक्तामृतादार्वभयाकषायः' इत्युक्तः ॥१३६-१४०॥ भा.टी.—भयंकर सर्वांगीण शोथ और उसके कष्ट को मिटाने के लिये मंडूर भस्म को पुनर्नवाष्टककषाय के साथ प्रयोग किया जाता है। कामला रोग में मंडूर- भस्म को कुटकी, त्रिफला तथा हरिद्राचूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करने से शीघ्र आराम आता है । मंडूरभस्म को विडंग, त्रिफला, पञ्चकोल और मोथाचूर्ण में मिलकर सेवन करने से उदरकृमि, शोथ, अर्श, ग्रहणी, प्लीहा तथा पांडुरोग में