भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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एकविंशस्तरङ्गः ५१६ आराम आता है । मंडूरभस्म को रससिन्दूर के साथ एक मास तक निरन्तर सेवन करने से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है । शोथ, ज्वर तथा अतीसार युक्त पांडुरोग में मंडूरभस्म को दशमूलकषाय के साथ सेवन करना चाहिये ॥ १३६-१४० ॥ वक्तव्य—पुनर्नवाष्टक क्वाथ—"पुनर्नवानिम्बपटोलशुण्ठीतिक्तामृतादार्व्य- भयाकषायः" । पञ्चकोल—"पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक और सौंठ" इन पाँच औषधियों के समुदाय को पञ्चकोल कहा जाता है । यह लौहादि विज्ञानीय नाम बीसवाँ तरङ्ग समाप्त हुआ। अथ उपधात्वादिविज्ञानीयो नाम एकविंशस्तरङ्गः अथ सुवर्णमाक्षिकस्य नामानि सुवर्णमाक्षिकं स्वर्णमाक्षिकं हेममाक्षिकम् । माक्षीकं माक्षिकञ्चैव ताप्यञ्च धातुमाक्षिकम् ॥ १ ॥ माक्षीकधातुश्च तथा तापीजञ्चापि तन्मतम् । ईषत्सुवर्णसाहित्यात्सुवर्णगुणसाम्यतः ॥ २ ॥ सुवर्णद्युतिमत्त्वाद्वा स्वर्णमाक्षिकमुच्यते । तापीतीरभवत्वाच्च ताप्यं तापीजमुच्यते ॥ ३ ॥ तत्र प्राधान्यादादौ स्वर्णमाक्षिकं तावद् विशदयति नामगुणकर्मभिः सुवर्ण- माक्षिकमिति—नामबहुत्वं व्यवहारसुखायेत्युक्तपूर्वम् ईषत्सुवर्णसाहित्यादिति सुवर्णमाक्षिकनामनिर्वचनं हेतुगर्भञ्चेति ॥ १-३ ॥ भा.टी.—सुवर्णमाक्षिक, स्वर्णमाक्षिक, हेममाक्षिक, माक्षीक, माक्षिक, ताप्य, धातुमाक्षिक, माक्षीकधातु, तापीज; ये सब नाम सोनामाखी के कहे जाते हैं । इसमें बहुत अल्पांश स्वर्ण होने तथा इसके गुणों में सोने के गुणों की समानता होने और इसमें कुछ स्वर्ण जैसी चमक होने से इसको स्वर्णमाक्षिक कहते हैं । और क्योंकि यह अधिकांश में तापी नदी के किनारे पर पाया जाता है, अतः इसे तापीज भी कहते हैं ॥ १-३ ॥ वक्तव्य—शास्त्रों के कथनानुसार स्वर्णमाक्षिक स्वर्ण का उपधातु निश्चित होता है, क्योंकि इसमें कुछ स्वर्ण का सहयोग और गुण होते हैं । परन्तु वास्तव में यह लौह का उपधातु है । विश्लेषण करने पर इसमें लौह, गन्धक तथा बहुत अल्पांश में ताम्र धातु का भाग पाया जाता है । इसको लौहसमास (Compo- und) निश्चित किया गया है। इसको (Iron sulphide) कहते हैं । उक्त