भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५२० रसतरङ्गिणी विश्लेषण से यह उपधातु निश्चित होता है; न कि उपरस । ग्रन्थान्तर में स्वर्ण माक्षिक तथा तारमाक्षिक भेद से स्वर्णमाक्षिक दो प्रकार का माना गया है। ग्राह्यसुवर्णमाक्षिकस्य लक्षणम् स्निग्धं गुरु श्यामलकान्ति किञ्चित् कषे सुवर्णद्युतिसुप्रकाशम् । कोणोज्झितं स्वर्णसमानवर्णं सुवर्णमाक्षीकमिह प्रशस्तम् ॥४॥ ग्राह्यसुवर्णमाक्षिकं स्निग्धादिगुणम् । उक्तञ्चाभियुक्तैः—"स्वर्णाभं स्वर्ण- माक्षिकं निष्कोणं गुरुतायुतम् । कालिमानं किरेत्तत्तु करे घृष्टं न संशयः” इति । 'स्वर्णवर्णो गुरु स्निग्धं ईषन्नीलच्छवि स्फुटम् । कषे कनकवद् घृष्टं तद् वरं हेम- माक्षिकम्” इति च । अतो विपरीतं हेयमिति तत्स्वरूपनिर्देशो व्याख्यात- प्रायपाठः ॥ ४ ॥ भा.टी.—जो स्वर्णमाक्षिक बाहर से देखने में स्निग्ध, गुरुभार, नीली काली चमकयुक्त, तथा कसौटी में रगड़ने पर कुछ-कुछ स्वर्ण समान रेखा खींचनेवाला कोण रहित, सोने के समान वर्णवाला हो उसे उत्तम स्वर्ण- माक्षिक समझा जाता है ॥ ४ ॥ हेयसुवर्णमाक्षिकस्य लक्षणम् खरं परं वै गुरुताविहीनं प्रवृत्तकोणं खरलोहकाभम् । प्रकीर्तितं तत्परिहेयमेव सुवर्णमाक्षीकमिहामयज्ञैः ॥ ५ ॥ भा.टी.—स्पर्श में खरदरा, अल्पभार, कोणोंवाला, खर तथा लोह की आभावाला स्वर्णमाक्षिक औषधि-कार्य के लिए अग्राह्य समझना चाहिए ॥५॥ स्वर्णमाक्षिकशोधनस्य प्रयोजनम् अशोधितं वाऽमृतमप्यशुद्धं निषेवितं माक्षिकमक्षिबाधाम् । मन्दानलं कुष्ठहलीमकादीन् कोष्ठानिलं वै जनयेन्नितान्तम् ॥ ६ ॥ माक्षिकशोधनप्रयोजनं अशोधितं वामृतमप्यशुद्धमित्यादिना । आहुश्च— “मन्दानलत्वं बलहानिमुग्रां विष्टंभितां नेत्रगदान् सकुष्ठान् । मालां विधत्तेऽथि च गण्डपूर्वां शुद्धयादिहीनं खलु माक्षिकन्तु” इति ॥ ६ ॥ भा.टी.—अशुद्ध स्वर्णमाक्षिक अथवा अशुद्ध और असम्यक् मारित स्वर्ण- माक्षिक सेवन से नेत्रविकृति, मन्दाग्नि, कुष्ठ रोग, हलीमक रोग, कोष्ठ में वायु- प्रकोप आदि विकार उत्पन्न होते हैं । अतः इसको शुद्ध करके ही भस्म करना चाहिये ॥ ६ ॥