रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२८ रसतरङ्गिणी भस्म लेकर दोनों को मिला मधु के साथ चाटने से शरीर में बल और वीर्य की वृद्धि होती है । गर्भिणी के गर्भाशय-स्राव को रोकने के लिये एक रत्ती स्वर्णमाक्षिकभस्म को पिंडखजूर के साथ सेवन कराने से निश्चित लाभ होता है । गर्भावस्था में होनेवाले ज्वरातिसार और शूल को शान्त करने के लिये स्वर्णमाक्षिकभस्म को अतीस, बेलगिरी, खरेंटी, सोंठ, जलवेत, सुगन्धवाला; इनके क्वाथ के साथ सेवन कराना चाहिये ॥३०-४२॥ स्वर्णमाक्षिकस्य सत्त्वपातनप्रकारः गोमूत्रैरण्डतैलाभ्यां कदलीकन्दवारिणा । घृतेन मधुना चापि भावयेद्धेममाक्षिकम् ॥४३॥ सप्तवारं विभाव्याथ मूषायां विन्यसेत्ततः । ध्मापयेत्सुचिरं विज्ञस्त्वतिप्रखरवह्निना ॥४४॥ एवं नातिचिरादेव ध्मातं कनकमाक्षिकम् । मृदुलं रविलोहाभं सत्त्वं मुञ्चति शोभनम् ॥४५॥ अथ माक्षिकसत्त्वपातनप्रकारः गोमूत्रैरण्डतैलाभ्यामित्यादिना ॥४३-४५॥ भा.टी.—स्वर्णमाक्षिक को गोमूत्र, एरंडतैल, कदलीकन्दस्वरस, गोघृत तथा शहद की पृथक्-पृथक् सात भावना देकर एक दृढमूषा में रखें । इस मूषा को कोष्ठी में रखकर तीव्र अग्नि से देर तक तपायें तो ताम्र के समान वर्ण और स्पर्श में सुन्दर माक्षिकसत्त्व निकल आता है ॥४३-४५॥ द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः पादांशटङ्कणोपेतं मर्दितं हेममाक्षिकम् । ध्मातं मूषागतं सत्त्वं मुञ्चत्याशु सुनिश्चितम् ॥४६॥ भा.टी.—स्वर्णमाक्षिक में चतुर्थांश सुहागा मिलाकर पीस लें, अब इसको एक मूषा में रखकर तीव्र अग्नि में तपायें तो माक्षिक का सत्व प्राप्त होता है ॥४६॥ तृतीयः सत्त्वपातनप्रकारः समगन्धं पचेत्ताप्यं चतुर्यामं प्रयत्नतः । ततोऽर्द्धगन्धकं भृष्टटङ्कणं चार्द्धभागिकम् ॥४७॥ विन्यस्य चान्धमूषायां ध्मापयेदतियत्नतः । एवं नातिचिरादेव सत्त्वं शुल्बनिभं पतेत् ॥४८॥ भा.टी.—पहिले स्वर्णमाक्षिकचूर्ण और शुद्धगन्धकचूर्ण दोनों को एकत्र समभाग