रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ एकविंशस्तरङ्गः ५२६ में लेकर कड़ाही में डालकर बारह घण्टे तक चूल्हे पर पकायें । शीतल होने पर स्वर्णमाक्षिकचूर्ण को निकालकर उसमें स्वर्णमाक्षिक से आधा भाग गन्धक तथा आधा भाग भुना हुआ सुहागाचूर्ण मिलाकर इसको अन्धमूषा में बन्द करके इस मूषा को कोष्ठी में रखें, धौंकनी से तपायें तो शीघ्र ही ताम्र सदृश माक्षिकसत्व निकल आता है ॥ ४७, ४८ ॥ स्वर्णमाक्षिकसत्त्वस्य मारणप्रकारः हेममाक्षिकसत्त्वन्तु पञ्चतोलकसंमितम् । तन्मितं विमलं सूतं बलिं दत्त्वा च मर्दयेत् ॥४६॥ जम्बीरस्य रसेनाथ मर्दयेदेकवासरम् । संशोष्य सम्पुटे कृत्वा पुटयेत्तीव्रवह्निना ॥५०॥ त्रिवारं पुटयेदेवं निर्दिष्टेनैव वर्त्मना । एवं माक्षिकसत्त्वन्तु पञ्चतां याति निश्चितम् ॥५१॥ माक्षिकसत्त्वमारणन्तु समसूतगन्धककृतकज्जल्या जम्बीरजलपिष्टया त्रिवारं पुटनात् सम्पाद्यते ॥ ४६-५१ ॥ भा.टी.—पाँच तोला स्वर्णमाक्षिकसत्व, पाँच तोला शुद्धपारद, पाँच तोला शुद्ध गन्धक लेकर इन तीनों को एकत्र खरल में पीसकर अब इसमें जम्बीरीनींबू का रस डालकर एक दिनभर खूब मर्दन करें और धूप में सुखा लें । अब इस चूर्ण को एक दृढ़ सम्पुट में बन्द करके तीव्र पुट में फूँक दें । इस तरह पारदगन्धक के साथ तीन तीव्र पुट देने से माक्षिकसत्व की निश्चित भस्म हो जाती है ॥ ४६-५१ ॥ स्वर्णमाक्षिकसत्त्वस्य गुणाः हेममाक्षिकसत्त्वं तु शिशिरं रुचिरं परम् । वृष्यं बल्यं तथा मेध्यं जीर्णज्वरविनाशनम् ॥५२॥ रक्तपित्तं क्षयं कासं दाहं हन्यात्सुदारुणम् । योगवाहि परञ्चैतद्रसायनमनुत्तमम् ॥५३॥ भा.टी.—स्वर्णमाक्षिकसत्वभस्म शिशिर और उत्तम रुचिकारक, वृष्य, बल्य, मेधावर्धक, ज्वरनाशक, रक्तपित्त, क्षय, कास तथा भयंकर दाह को शान्त करती है । यह भस्म योगवाही होती है और उत्तम रसायन का कार्य करती है ॥ ५२, ५३ ॥