रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३० रसतरङ्गिणी मृतस्वर्णमाक्षिकसत्त्वस्य आमयिकः प्रयोगः हेममाक्षिकसत्त्वं तु यथादोषानुपानतः । ताप्यवन्मेलितं हन्ति दुःसाध्यानामयानपि ॥५४॥ भा.टी.—स्वर्णमाक्षिकसत्त्वभस्म को तत्तद्-दोषहर द्रव्यों के चूर्ण या कषाय आदि अनुपान के साथ स्वर्णमाक्षिकभस्म की भाँति प्रयोग करने से दुःसाध्य रोग भी नष्ट हो जाते हैं ॥ ५४ ॥ अथ रजतमाक्षिकस्य नामानि रौप्यमाक्षिकमाख्यातं तारजं तारमाक्षिकम् । विमलं श्वेतमाक्षीकं तथा रजतमाक्षिकम् ॥५५॥ ईषद्रौप्यस्य साहित्याद् वा रौप्यगुणसाम्यतः । रौप्यवद् द्युतिमत्त्वाद्वा रौप्यमाक्षिकमुच्यते ॥५६॥ रजतमाक्षिकनामानि तन्त्रे व्यवहृतानि—'विमलं श्वेतमाक्षीकं तथा रजत- माक्षिकम्' इति रजतमाक्षिकं विमलनाम्ना व्यवहृतम् । आह च रसमाधवः 'विमलं तारमाक्षिकम्' इति ॥ ५५, ५६ ॥ भा.टी.—रौप्यमाक्षिक, तारज, तारमाक्षिक, विमल, श्वेतमाक्षिक, रजत- माक्षिक, ये सब नाम रूपामाखी के कहे जाते हैं। इस रूपामाखी में बहुत थोड़ा रजत का मिश्रण होने से अथवा इसमें रजत के समान गुण धर्म होने से अथवा इसमें रजतवत् चमक होने से इसको रौप्यमाक्षिक कहते हैं ॥ ५५, ५६ ॥ वक्तव्य—विमलमाक्षिक भी लोह का समास है, इसे आयरन पाइराइटिस ( Iron pyritis ) कहते हैं और स्वर्णमाक्षिक को कापर पाइराइटिस ( Copper pyritis ) कहते हैं। माक्षिक का एक और भेद होता है जिसे कांस्यमाक्षिक आर्सेनो पाइराइटिस ( Arsano pyritis ) कहते हैं। विमल माक्षिक रजत के समान कुछ-कुछ चमकीला होने से रौप्यमाक्षिक कहा जाता है। जात्यरजतमाक्षिकस्य स्वरूपम् स्निग्धं सकोणं गुरु च वर्तुलं रजतोज्ज्वलम् । रौप्यवच्चाकचिक्याढ्यं जात्यं तद्रौप्यमाक्षिकम् ॥५७॥ जात्यं रजतमाक्षिकं स्निग्धमित्याद्युक्तम् । आहुश्च प्राञ्चः—"कांस्यवच्चाक- चिक्याढ्यं कषे घृष्टन्तु रौप्यवत् । गुरु स्निग्धं सितं यत्तच्छ्रेष्ठं स्यात्तारमाक्षिकम्" इति ॥ ५७ ॥ भा.टी.—उत्तम रूपामाखी स्निग्ध, कोणयुक्त, गुरुभार, प्रायः वर्तुल