भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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एकविंशस्तरङ्गः ५३१

( गोलखण्डवाली ), रजत के समान उज्ज्वल और रजत के समान ही चमकीली होती है ॥ ५७ ॥ हेयरौप्यमाक्षिकस्य शोधनप्रयोजनम् समलं लघु रूक्षञ्च कषेऽतिमलिनच्छवि । अवर्तुलं विवर्णञ्च हेयं स्याद्रौप्यमाक्षिकम् ॥ ५८ भा.टी.—मलयुक्त, लघुभार, रूक्ष ( बाहर से खुश्क ), कसौटी पर घिसने से अत्यन्त मलिन रेखा खींचनेवाली, लम्बे या विषम खंडयुक्त, फीके वर्ण की रौप्यमाक्षिक औषधि-प्रयोग में अग्राह्य समझनी चाहिये ॥ ५८ ॥ रौप्यमाक्षिकस्य शोधनप्रयोजनम् अशुद्धं रौप्यमाक्षीकं स्वर्णमाक्षिकवद् भृशम् । जनयत्याशु मन्दाग्नि तथा कुष्ठादिकान् गदान् ॥ ५६ ॥ अशुद्धन्तु “स्वर्णमाक्षिकवद्दोषा विज्ञेयास्तारमाक्षिके” इति प्राचीनोक्त्यनुसारं प्राह स्वर्णमक्षिकवद् भृशमिति । स्पष्टमन्यत् ॥ ५६ ॥ भा.टी.—अशुद्ध रूपामाखी के सेवन करने से प्रायः अशुद्ध स्वर्णमाक्षिक के समान ही मन्दाग्नि तथा कुष्ठ आदि रोग उत्पन्न होते हैं । अतः इसको शुद्ध करके प्रयोग में लाना चाहिये ॥ ५६ ॥ रौप्यमाक्षिकस्य प्रथमः शोधनप्रकारः [ गोतिका ] विमलं तु जात्यमादौ सुविचूर्य खल्वमध्ये । अथ निम्बूकोत्थवारा निदधीत वै कटाहे ॥ ६० ॥ अथ लौहचुल्लिकायां विनिधापयेत् कटाहम् । चुल्ल्यां प्रदीप्त्य वह्निं परिचालयेच्च दर्ध्या ॥ ६१ ॥ विमलन्तु नैति यावत्त्वारक्तपङ्कजाभम् । निक्षिप्य निम्बूकाम्भस्तावत्पचेत्प्रयत्नात् ॥ ६२ ॥ अरुणोत्पलप्रकाशं विमलं विलोक्य वैद्यः । अवतारयेद्विशुद्धं विमलं प्रयोगयोग्यम् ॥ ६३ ॥ भा.टी.—उत्तम स्वच्छ रूपामाखी को खरल में डालकर बारीक चूर्ण कर लें । अब इस चूर्ण को एक लोहे की कड़ाही में डाल उसमे नींबू का रस भी भर दें और कड़ाही को लोहे के चूल्हे में या भट्टी पर रखकर अग्नि जलायें । तीव्र अग्नि से पकाते हुए लोह करछी से चलाते रहें । जब नींबू का रस सूख

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