भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५३२ \t रसतरङ्गिणी जाय तो फिर रस डालकर करछी से चलाते हुए पकायें । जब पकने पर रूपा- माखीचूर्ण लालकमल के सदृश वर्ण का हो जाय तो चूल्हे से कढ़ाही को उतार कर शुद्ध रौप्यमाक्षिक को निकालकर भस्म करने के काम लावें ॥ ६०-६३ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः विमलं तु जात्यमादौ सुविधाय पोट्टलीस्थम् । अथ दोलिकाख्ययन्त्रे वृषपत्रजोत्थवारा ॥ ६४ ॥ विधिना विधानदक्षः संस्वेदयेद् द्वियामम् । विमलोऽतिवेलमेवं विमलत्वमेत्यनल्पम् ॥ ६५ ॥ द्वितीयः प्रकारः वासकस्वरसे स्वेदनाद् दोलायन्त्रेण निष्पाद्यः । उक्तं हि- "विमला तु शुद्धयति दिनं वासाजशृङ्गीरसे स्विन्ना" इत्यादिना रसपद्धत्याम्॥६४,६५ भा. टी.-रूपामाखीचूर्ण को एक कपड़े में बाँधकर पोटली बना लें । इस पोटली को दोलायन्त्र में वासापत्रस्वरस भर उसमें लटका दें और दो पहर तक अग्नि देकर पकायें । इस विधि से शीघ्र ही विमलमाक्षिक शुद्ध हो जाती है ॥ ६४, ६५ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः मेषशृङ्गीरसेनापि दोलायन्त्रे विधानतः । पाचितं रौप्यमाक्षीकं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ६६ ॥ मेषशृङ्गीत्यादि निगदव्याख्यातम् । योगरत्नाकरे तु विधानमन्यदप्युक्तम् । तथाहि - "कर्कौटीमेषशृङ्गीजै रसैर्जम्बीरजैर्दिनम् । आतपे भावना देया शुद्धं स्यात्तारमाक्षिकम्” इति ॥ ६६ ॥ भा.टी.- दोलायन्त्र में मेढासिंगी स्वरस भरकर उसमें रूपामाखी को दो पहर तक स्वेदन करने से भी रूपामाखी शुद्ध हो जाती है ॥ ६६ ॥ रौप्यमाक्षिकस्य मारणप्रकारः विमलो लकुचद्रावैः पदांशबलिसंयुतः । पिष्ट्वा तु सप्तधैवेह पुटितो याति पञ्चताम् ॥ ६७ ॥ अस्य मारणं लकुचजलैः गन्धकेन चेति सुगमम् ॥ ६७ ॥ भा.टी.-शुद्ध रूपामाखी में चतुर्थांश शुद्ध गन्धकचूर्ण मिला बड़हल के स्वरस के साथ मर्दन करके टिकिया बनाकर सुखा लें । अब इन टिकियाओं को सम्पुट में बन्द करके पुट में फूँक दें । इस विधि को सात बार दुहराने से विमल की भस्म हा जाती है ॥ ६७ ॥