रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकाविंशस्तरङ्गः ५३३ रौप्यमाक्षिकस्य सामान्येन मारणम् स्वर्णमाक्षिकवत्कार्यं रौप्यमाक्षिकमारणम् । प्रयोगाल्पतया चास्य व्याख्यानं नाधिकं कृतम् ॥६८॥ वस्तुतस्तु स्वर्णमाक्षिकवदेवास्य सर्वे मारणादिकम् । व्यवहारस्त्वल्प एव, सीसोपमञ्चास्य सत्त्वं लकुचजलटङ्कणाभ्यां साध्यम् ॥ ६८ ॥ भा.टी.—रूपामाखी की भस्म-विधि स्वर्णमाक्षिकभस्म-विधि के समान ही समझनी चाहिए। क्योंकि विमलमाक्षिक का प्रयोग बहुत ही कम होता है। अतः इसके विषय में अधिक व्याख्यान की आवश्यकता नहीं समझी गयी है ॥६८॥ रौप्यमाक्षिकस्य गुणादिनिरूपणम् स्वर्णमाक्षिकवज्ज्ञेया विमलस्य गुणा बुधैः । मात्रां चामयिकं योगं तथैव परिलक्षयेत् ॥६९॥ भा.टी.—रूपामाखी भस्म के गुण, मात्रा तथा आमयिक प्रयोगविधि स्वर्णमाक्षिक भस्म के समान ही समझनी चाहिए ॥ ६९ ॥ रौप्यमाक्षिकस्य सत्त्वपातनम् पादांशटङ्कणोपेतो लकुचद्रावमर्दितः । विमलः सुचिरं ध्मातः सत्त्वं सीसोपमं त्यजेत् ॥७०॥ भा.टी.—शुद्ध विमलमाक्षिक से चतुर्थांश सुहागाचूर्ण मिला बड़हल के स्वरस से मर्दन कर मूषा में भर लें । अब इस मूषा को कोष्ठी में तीव्र अग्नि से तपायें तो सीसे के सदृश सत्त्वपातन होता है ॥ ७० ॥ अथ तुत्थकस्य नामानि तुत्थं तु तुत्थकं तुत्थाञ्जनञ्चापि मयूरकम् । सस्यकं ताम्रगर्भञ्च शिखिग्रीवञ्च तन्मतम् ॥७१॥ सुवर्णरजताभ्यान्तरं ताम्रस्य यथाक्रमागतमुपधातुं तुत्थमेवात ऊर्ध्वं वर्ण- यति । अस्य नामानि व्यवहृतप्रायाणि तन्त्रेषु ॥७१॥ भा.टी.—तुत्थ, तुत्थक, तुत्थाञ्जन, मयूरक, सस्यक, ताम्रगर्भ तथा शिखि- ग्रीव, ये सब नाम तूतिया के कहे जाते हैं ॥७१॥ वक्तव्य—तूतिया नैसर्गिक रूप में प्राप्त होता है तथा कृत्रिमविधि से भी बनाया जाता है । कृत्रिमविधि से निर्माण करने पर ताम्र की कच्ची धातु को गन्धक में मिला भट्ठी में तीव्र अग्नि से तपाते हैं और इसमें धौंकनी द्वारा वायु प्रवेश कराते हैं । फिर इस भुने हुए द्रव्य में गन्धकाम्ल डालकर द्रव्य के स्फटिक बनाये जाते हैं जिनको ताम्रगन्धित् ( Copper sulphate ) कहा जाता है ।