भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५३४ रसतरङ्गिणी ग्राह्यतुत्थकस्य स्वरूपम् शिखिकण्ठसमच्छायं गुरु स्निग्धं महोज्ज्वलम् । तुत्थकं शस्यते विज्ञैरन्यद्धीनगुणं मतम् ॥ ७२ ॥ उत्कृष्टतुत्थलक्षणं शिखिकण्ठसमच्छायमिति–शिखी मयूरः, तस्य कंठच्छा- यासमा छाया यस्य तत् नीलवर्णमित्यर्थः ॥ ७२ ॥ भा.टी.—मोर के कंठ के सदृश छायावाला अर्थात् नीलवर्ण, गुरुभार, स्निग्ध तथा अत्यन्त चमकीला तूतिया औषधि कार्य में उत्तम माना जाता है। इससे भिन्न स्वरूप तुत्थ हीनगुण होता है ॥ ७२ ॥ तुत्थकस्य निर्मलीकरणम् सुचूर्णितं तुत्थकं तु दशतोलकसंमितम् । क्षिपेदत्युष्णसलिले पञ्चतोलकसंमिते ॥७३॥ ततः सारकपत्रेण सारयेद्वाससाथवा । सारितं सलिलं विज्ञः काचपात्रतलस्थितम् ॥७४॥ तावत्संस्थापयेद्यावन्नैति तत्कणरूपताम् । एवं कणत्वमापन्नं तुत्थं शुद्धयै नियोजयेत् ॥७५॥ भा.टी.—तूतिये का सूक्ष्म चूर्ण करके दस तोला लें, अब इस चूर्ण को पाँच तोले अत्यन्त गरम जल में डाल घोल लें। अब इस घोल को फिल्टर पेपर अथवा वस्त्र से छान लें। अब इस छुने हुए जल को एक काँच के पात्र में तब तक एकांत में रख दें जब तक कि पात्र के तल में कण (क्रिस्टल) जम जायँ। इस कण रूप तुत्थ को शुद्धि के लिए काम लाना चाहिये ॥७३–७५॥ निर्मलीकृततुत्थस्य गुणाः तुत्थं तु तिक्तकं त्वच्यं ग्राहि वान्तिकरं परम् । कफघ्नमथ चक्षुष्यं व्रणदोषनिषूदनम् ॥७६॥ उपदंशफिरङ्गोत्थक्षतशोधनकृत्परम् । क्लिष्टवर्त्मप्रशमनं क्षारकर्मकरं स्मृतम् ॥७७॥ निर्मलीकृततुत्थगुणाः तुत्थं तु तिक्तमित्यादिना। त्वच्यं त्वग्दोषहरम्, क्लिष्टवर्त्म नेत्ररोगविशेषः ॥ ७६, ७७ ॥ भा.टी.–उक्त विधि से साफ किया हुआ तुत्थ तिक्तरस, त्वच्य, ग्राही तथा वामक होता है। इसके प्रयोग से कफप्रकोप नष्ट होता है। यह आँखों के लिए लाभदायक, व्रणविकृतियों को दूर करनेवाला होता है। तुत्थ उपदंश, फिरंगजन्य क्षतों (घाव) को शुद्ध करने के लिए उत्तम द्रव्य है। नेत्रपलकों के भीतर