रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशस्तरङ्गः ५४१ चतुर्थः शोधनप्रकारः अम्लवर्गप्रदिष्टेन एकेनाप्यौषधेन तु । भावितं सप्तधा तुत्थं शुद्धमायात्यनुत्तमम् ॥११२॥ भा.टी.—अम्लवर्ग में बताये हुए किसी भी एक द्रव्यांश के साथ ७ बार भावन देकर सुखा लेने पर तुत्थ शुद्ध हो जाता है ॥ ११२ ॥ शोधिततुत्थकस्य आमयिकः प्रयोगः । तुत्थामृता वटी तोलकैकंमितं तुत्थं विधिना परिशोधितम् । पलद्वयमितां बालपथ्यामादाय चूर्णिताम् ॥११३॥ खल्वे निम्बूक्तोयेन पेषयेद्दिनसप्तकम् । वटिकाः कारयेद्वैद्यो गुञ्जाद्वितयसंमिताः ॥११४॥ ततः काचपिधानायां काचकुप्यां निधापयेत् । वटिकेयं समाख्याता बुधैस्तुत्थामृताभिधा ॥११५॥ भा.टी.—उत्तम रूप से शुद्ध तूतिया एक तोला, छोटी हरड़न्चूर्णं दो पल अर्थात् १६ तोला लेकर एकत्र खरल में नींबूस्वरस से सात दिन तक अच्छी तरह मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी दो रत्ती की गोली बना लें । इन गोलियों को वैद्य लोग तुत्थामृत वटी कहते हैं ॥११३-११५॥ अस्य गुणाः एकैका वटिका नित्यं शीलिता शीतलाम्भसा । विनिहन्ति त्रिसप्ताहात् फिरङ्गमतिदारुणम् ॥११६॥ पूर्वोक्तरसपुष्पादिसूतयोगाद्यपेक्षया । क्वचित्क्वचिद्विशेषेण मताधिकफलप्रदा ॥११७॥ स्फीतता दन्तवेष्टेषु प्रयोगेऽस्य न जायते । शालिगोधूममुद्गाज्यपथ्यमत्र प्रकीर्तितम् ॥११८॥ शोधिततुत्थस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—तुत्थामृता वटी-क्वचिदिति यत्रामयी सूतवीर्यं न सहत इति यावत् । स्फीतता शोथः यथा रसपुष्पादिसेवने न तथास्य सेवने मुखपाकादिभयम् ॥ ११६-११८ ॥ भा.टी.—एक एक तुत्थामृतवटी को प्रतिदिन निरन्तर इक्कीस दिन तक ठंडे जल से सेवन करने पर भयंकर फिरङ्गरोग नष्ट हो जाता है । यह वटी पूर्वोक्त रस- पुष्प (रसकर्पूर) चन्दनादि वटी आदि फिरङ्गहर पारद योगों की अपेक्षा कहीं कहीं