रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४२ रसतरङ्गिणी तो अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होती है । इस वटी के सेवन करने में दाँतों के मसूड़े नहीं फूलते हैं । इस वटी के प्रयोगकाल में रोगी को शालि चावलों का भात, गेहूँ की रोटी, दलिया, मूँग की दाल, घी यह पथ्य देना चाहिये ॥११६-११८॥ अथ तुत्थकमारणस्य प्रथमः प्रकारः [ गीतिका ] नवनिम्बूकोत्थवारा परिशोधितं तु तुत्थम् । कृतचक्रिकं निदध्यात् परिशोषयेन्निदाघे ॥ ११९ ॥ लघुना पुटेन विज्ञः पुटयेत्तु सम्पुटस्थम् । अथ भावयेत्प्रयत्नाद् दधिमस्तुना त्रिघस्रम् ॥ १२० ॥ विधिना ह्यनेन तुत्थं वमनादिदोषहीनम् । अविलम्बितं प्रयत्नान्मृतिमेति निर्विशेषाम् ॥ १२१ ॥ भा.टी.—नींबू के ताजे स्वरस से शुद्ध किया हुआ तूतिया लेकर उसको फिर नीबूरस अथवा जल से घोटकर टिकिया बना लें और धूप में सुखा लें । इन टिकियाओं को सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक देवें, स्वांगशीत होने पर सम्पुट में से तुत्थ को निकालकर इसको तीन दिन तक दही के जल की भावना देकर धूप में सूखालें । इस विधि से मारित तुत्थभस्म वान्ति, भ्रान्ति आदि दोषरहित हो जाती है । इसको अन्तः प्रयोग में निःशंक होकर काम में ला सकते हैं ॥ ११९-१२१ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः सुनिर्मलं तुत्थकं तु पञ्चतोलकसंमितम् । टङ्कणं गन्धकञ्चैव सममेव समाहरेत् ॥१२२॥ पाषाणखल्वे विन्यस्य पेषयेल्लकुचाम्भसा । मूषिकायां निरुद्ध्याथ कौक्कुटे तु पुटे पुटेत् ॥१२३॥ पुटद्वयं प्रदातव्यं बलिनेव प्रयत्नतः । तुत्थकं जायते नूनं वान्तिभ्रान्त्यादिवर्जितम् ॥१२४॥ भा.टी.—शुद्ध तुत्थक पाँच तोला, सुहागा पाँच तोला, शुद्ध गन्धक पाँच तोला लेकर सब को एकत्र खरल में बड़हल के स्वरस से अच्छी तरह मर्दन कर धूप में सुखा लें । अब इसको मूषा में बन्द करके कुक्कुटपुट में फूंक दें । स्वांग- शीत होने पर तुत्थ को निकाल उसमें केवल शुद्ध गंधक समभाग मिला बड़हल के स्वरस से मर्दन कर फिर कुक्कुटपुट में फूंक दें । इस तरह दो पुट केवल