रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशस्तरङ्गः ५४३ गन्धक के साथ देने से तुत्थ की वान्ति-भ्रान्ति आदि दोष रहित भस्म हो जाती है ॥ १२२-१२४ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः पलोन्मितं तुत्थकं तु गन्धकन्तु पलार्द्धकम् । शरावसम्पुटे न्यस्य मृदा च परिलेपयेत् ॥१२५॥ पुटत्रयं प्रदातव्यं स्वल्पैरैव वनोत्पलैः । तुत्थकं मृतिमाप्नोति वान्तिभ्रान्त्यादिवर्जितम् ॥१२६॥ भा.टी.-एक पल शुद्ध तुत्थ और आधा पल शुद्ध गन्धक दोनों को एकत्र पीसकर शरावसम्पुट में बन्द करके अच्छी तरह मिट्टी से सन्धिलेप कर सुखा लें। अब इस सम्पुट को थोड़े से जंगली उपलों की अग्नि में फूँक देवें। इस विधि से तीन पुट गन्धक के साथ देने से तुत्थ की वान्ति भ्रान्ति आदि दोषरहित भस्म हो जाती है ॥ १२५, १२६ ॥ सुमृततुत्थकस्य गुणाः तुत्थकं लेखनं भेदि कषायं मधुरं लघु । कृमिघ्नमथ चक्षुष्यं मेहमेदोहरं परम् ॥१२७॥ कफपित्तहरं बल्यं शूलहत्कुष्ठनाशनम् । श्वित्रापहं त्वम्लपित्तहरं चैव रसायनम् ॥ १२८ ॥ तुत्थं सङ्कोचनकरं नाडीनां बलकृत् परम् । त्वग्दोषशमनं कामं विशेषाद्रुचिरं मतम् ॥ १२९॥ भा.टो.-तुत्थभस्म लेखन-भेदनकर्म करनेवाली, कषाय, मधुररस और लघुगुण होती है। यह उत्तम कृमिनाशक, नेत्ररोगों में लाभदायक, कफप्रमेह तथा मेदोविकारों को मिटानेवाली होती है। इसके सेवन से कफ-पित्तप्रकोप शान्त हो जाता है। शरीर में बल की वृद्धि होती है। इसके प्रयोग से शूल और कुष्ठ रोग दूर हो जाते हैं। श्वेतकुष्ठ तथा अम्लपित्त रोग में यह लाभदायक होता है। विधिपूर्वक कुछ काल पथ्य के साथ तुत्थभस्म सेवन करने से रसायन गुण करती है। तुत्थभस्म संकोचक और नाड़ी मण्डल के लिये बल्य होती है। इसके सेवन या बाह्य प्रयोग से त्वक्रोग नष्ट हो जाते हैं और इसके सेवन से भोजन में रुचि उत्पन्न होती है ॥ १२७-१२६ ॥ मृततुत्थकस्य मात्रानिरूपणम् गुञ्जाष्टमांशतो गुञ्जापादिकं तुत्थकं मृतम् । तत्तद्दोषत्रयोगेन वातशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ १३० ॥