भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५४४ रसतरङ्गिणी भा.टी.—उत्तम विधि से बनी हुई तुत्थभस्म को रत्ती के आठवें भाग से लेकर चौथाई भाग तक की मात्रा में निःशंक होकर प्रयोग कर सकते हैं॥१३०॥ मृततुत्थकस्य आमयिकः प्रयोगः तुत्थकोदयरसायनम् तुल्यकज्जलिकया समन्वितं तुल्यगन्धकमृतं तु तुत्थकम् । मर्दितं सपदि निम्बुकाम्भसा पेषयेत्समकटुत्रिकाम्भसा ॥१३१॥ गुञ्जाद्वितयसंमितां वटीं कारयेद्रसविधानकोविदः । भाषितोऽयमिह सूतचिन्तकैस्तुत्थकोदयरसायनाह्वयः ॥१३२॥ निषेचयेद्वटीमेकां नागिनीदलजद्रवैः । दिनं वारद्वयं युक्ता नाशयेद्विषमज्वरम् ॥१३३॥ तक्रेण दापयेच्चैकां गर्भिणीशूलशान्तये । शीलितो निम्बुकद्रावैः शूलं गुल्मञ्च नाशयेत् ॥१३४॥ हिङ्गुवश्चाम्लिकानिम्बूद्रवेण प्लीहशान्तिकृत् । पयसा ससितेनेह शुक्रमेहं समुद्धरेत् ॥१३५॥ अष्टमांशकनोत्थभस्मना सार्द्धमण्डलकमेव शीलितम् । तुत्थकोदयरसायनं हरेत् कासविड्ग्रहयुतां क्षयव्यथाम् ॥१३६॥ तुत्थकोदयरसायनम्—तुल्यगन्धकमृतमिति यथोक्तेन द्वितीयेन प्रकारेण मृत- मित्यर्थः (सार्द्धमण्डलकं चत्वारिंशद्दिनानि मण्डलमिवि व्यवह्रियन्ते, तस्यार्द्धं विंशतिदिनानि, तेन च मिलित्वा षष्टिदिनानि मासद्वयमित्यर्थः तुत्थस्य तिमि- रापहः प्रयोगो वाग्भटोक्तोऽप्यनुसन्धेयः । तद् यथा—"गोमूत्रे छागणरसेऽम्लका- ञ्जिके च स्त्रीस्तन्ये हविषि विषे च माक्षिके च । यत्तुत्थं ज्वलितमनेकशो निषिक्तं तत्कुर्याद् गरुडसमं नरस्य चक्षुः ॥" इति ॥ १३१--१३६ ॥ भा.टी.—समभाग गन्धक के योग से बनायी हुई तुत्थभस्म एक भाग, पारद- गन्धक की (समभाग) कज्जली एक भाग लेकर दोनों को एकत्र खरल में डाल- कर पहिले नीम्बू रस से, फिर सोंठ, मिर्च तथा पिप्पलीकषाय के साथ मर्दन करें। जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो इसकी दो-दो रत्ती की गोलियाँ बना सुखा- कर रख लें । रसायनशास्त्री लोग इस योग को तुत्थक रसायन नाम से कहते हैं। इनमें से दिन में दो बार एक एक गोली को पान के रस के साथ सेवन करने से बिषमज्वर नष्ट हो जाता है । गर्भिणी स्त्री के शूल को नष्ट करने के लिये तुत्थक