रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरसायन की एक गोली तक्र के साथ दी जाती है। गुल्म तथा शूल में इसको नीम्बूरस के साथ प्रयोग करना चाहिए। प्लीहावृद्धि में एक-एक गोली प्रतिदिन दो बार हींग, सौंठ, इमली और निम्बूरस के साथ देनी चाहिए। शुक्रमेह में इन गोलियों को खाँड मिले हुए दूध के साथ सेवन कराना चाहिए। यदि इस तुत्थ- रसायन में अष्टमांश सुवर्णभस्म मिलाकर साठ दिन तक सेवन कराया जाय तो इससे कास तथा विड्ग्रह (कब्ज) युक्त क्षयरोग नष्ट हो जाता है ॥१३१-१३६॥ तुत्थकसत्त्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः पलद्वयोन्मितं तुत्थं यत्नतो विमलीकृतम् । टङ्कणं तत्समं दत्त्वा मर्दयेन्निम्बुकद्रवैः ॥ १३७ ॥ विन्यस्य चान्धमूषायां प्रधमेत्प्रखराग्निना । एव नातिचिरादेव सत्त्वं ताम्रमयं पतेत् ॥ १३८ ॥ भा.टी.-दो पल अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ तूतिया, दो पल सुहागा लेकर दोनों को एकत्र खरल में नीम्बूरस से खूब मर्दन कर सुखा लें। अब इसको अन्धमूषा में रखकर कोयलों की अग्नि में तपायें तो शीघ्र ही ताम्रधातु- रूप सत्त्व का पातन होता है ॥ १३७, १३८ ॥ द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः पादसौभाग्यसंयुक्तं तुत्थकं सुविचूर्णितम् । करञ्जतैले विन्यस्य रक्षेदेकदिनं ततः ॥१३६॥ विन्यस्य चान्धमूषायां प्रधमेत् कोकिलान्नना । एवं नातिचिरादेव सत्त्वं ताम्रमयं पतेत् ॥१४०॥ भा.टी.—शुद्ध तुत्थचूर्ण एक भाग, सुहागाचूर्ण चौथाई भाग लेकर दोनों को एकत्र पीसकर एक दिन तक करञ्जबीज तैल में भिगोकर रख दें। एक दिन बाद इसको तेल सहित ही अन्धमूषा में रखकर तीव्र कोयलों की अग्नि में तपावें तो शीघ्र ही ताम्र-रूप सत्त्व प्राप्त होता है ॥१३६, १४०॥ तृतीयः सत्त्वपातनप्रकारः चूर्णीकृत तुत्थक तु दशस्तोलकसमितम् । निक्षिपेत्सलिलेऽत्युष्णे पञ्चतालकसंमिते ॥१४१॥ द्रवीभूतं ततो ज्ञात्वा लौहखण्डान् विनिक्षिपेत् । चूर्णरूपं शुद्धताम्रं तुत्थसत्त्वं पतत्यधः ॥१४२॥