भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५४६ | रसतरङ्गिणी

जलं निक्षिप्य पत्राधःप्रदेशे खलु सञ्चितम्। इन्द्रगोपसमाकारं तुत्थसत्त्वं समाहरेत् ॥१४३॥ भा.टी.-दस तोला शुद्ध तुत्थकचूर्ण लेकर उसको पाँच तोले अत्यन्त गरम जल में डाल दें, जब तुत्थ जल में अच्छी तरह घुल जाय तो इसमें कुछ छोटे- छोटे लोहे के टुकड़े डाल दें। इनके डालने से तुत्थ का सत्वरूप शुद्ध ताम्रचूर्ण पात्रतल में बैठ जायगा। अब ऊपर के जल को सावधानी से गिराकर पात्रतल प्रदेश में सञ्चित वीरबहूटी सदृश वर्ण की तुत्थ को ले लें ॥१४१-१४३॥ तुत्थसत्त्वस्य मारणं गुणाः प्रयोगश्च तुत्थसत्त्वं सुविमलं मारयेद्द्रविलोहवत्। तद्वदेव गुणास्तस्य प्रयोगश्चापि तादृशः ॥१४४॥ भा.टी.-तुत्थ से प्राप्त सत्व की भस्मविधि, उसके गुण और प्रयोगविधि ताम्र धातु के समान ही समझने चाहिए ॥ १४४ ॥ अथ कृत्रिमतुत्थस्य निर्माणप्रकारः विशुद्धे ताम्रचूर्णे तु गन्धकाम्लं शनैः क्षिपेत्। विज्ञाय विद्रुतं ताम्रं शोषयेन्मृदुवह्निना ॥१४५॥ विमर्द्यात्युष्णनीरेऽल्पे द्रवीकुर्याद्विधानवित्। जले शीतत्वमापन्ने कणत्वं समुपागतम् ॥१४६॥ शिखिकण्ठसमच्छायं तुत्थकं तु समाहरेत्। इत्थं विनिर्मितं तुत्थं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥१४७॥ कृत्रिमतुत्थस्य निर्माणविधिः-गन्धकाम्लं तावदेव शनैः शनैः क्षेप्यं यावत् ताम्रं द्रुतं स्यात्। वीतशङ्कः, शुद्धताम्रद्वारा निर्मितत्वादित्यर्थः ॥१४५-१४७॥ भा.टी.-शुद्ध ताम्रचूर्ण को एक काँच के पात्र में डालकर उसमें थोड़ा- थोड़ा करके तब तक गन्धकाम्ल डालें जब तक सम्पूर्ण ताम्रचूर्ण उसमें घुल न जाय। पूर्ण रूप से ताम्रचूर्ण के घुल जाने पर पात्र को चूल्हे पर रखकर मन्द- मन्द अग्नि से पकाकर द्रवांश को सुखा दें। अब इस शुष्कचूर्ण को बहुत थोड़े से अत्यन्त गरम जल में डालकर खूब मर्दन करके घोल लें और स्फटिकी- करण के लिए पात्र को एक पात्र में रख दें। जल के शीतल होने पर नील वर्ण के कणरूप में तुत्थ प्राप्त होगा ॥ १४५-१४७ ॥ अथ सिन्दूरस्य नामानि सिन्दूरं गिरिसिन्दूरं महिलाभालभूषणम्।