रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशस्तरङ्गः ५४७ गणेशभूषणञ्चैव तथा शृङ्गारभूषणम् ॥१४८॥ नागजं नागगर्भञ्च तथैव नागरेणुकम् । मङ्गल्यं भालसौभाग्यं तदेव परिकीर्तितम् ॥१४९॥ नागोपधातुत्वात् क्रमप्राप्तं सिन्दूरवर्णनं सिन्दूरमित्यादिना ॥१४८-१४६॥ भा.टी.—सिन्दूर, गिरिसिन्दूर, महिलाभालभूषण, गणेशभूषण, शृङ्गार- भूषण, नागज, नागगर्भ, नागरेणुक, मङ्गल्य, भालसौभाग्य, ये सब नाम सिन्दूर के कहे जाते हैं ॥ १४८, १४६ ॥ वक्तव्य—गिरिसिन्दूर को Lead proxide नाम से लिया गया है जिसे आम भाषा में सिन्दूर कहते हैं । यह मूर्तियों के ऊपर रंगने के लिये लगाया जाता है । यह सिन्दूर नैसर्गिक रूप से तथा कृत्रिम विधि से भी प्राप्त किया जाता है । कृत्रिम विधि से प्राप्त करने में मुर्दासंग को ४०० से ४५० डिग्री ताप में रख वायु पहुँचाते हुए गरम किया जाय तो यह अधिक ओषजन लेकर लाल हो जाता है जो सिन्दूर कहा जाता है । यदि इसे ५२५ डिग्री से ऊपर गरम किया जाय तो वह फिर ओषजन छोड़ देता है जिससे फिर मुर्दासंग बन जाता है । आयुर्वेद में इसका बाह्य प्रयोग ही अधिक किया जाता है । वर्तमान अन्वेषक चिकित्सक इसे सिंगरफ मानते हैं और इसे मर्करी ओक्साइड नाम से ग्रहण करने को कहते हैं । उनका विचार है कि पारद का अंश पर्वतीय शिलाओं के मध्यस्थ रस के साथ मिलकर लाल रंग का हो जाता है जैसा कि पिसा हुआ रससिन्दूर अथवा हिंगुल । पर्वत के मध्य स्वभावतः पारद का रससिन्दूर वर्ण होने से वे इनको गिरि में स्वतः उत्पन्न (बना हुआ) सिन्दूर ( Oxide ) कहते हैं । साथ ही यह भी विचार करते हैं कि सिन्दूर ( नागसिन्दूर ) में देहलोहकर आदि गुण नहीं हो सकते हैं । परन्तु व्यवहार नागसिन्दूर से ही होता है । यदि पूर्ण ऊहापोह के साथ इसका व्यवहार किया जाय तो कोई हानि नहीं है । संक्षेपतः सिन्दूर को नाग धातु का समास या उपधातु समझना चाहिये । ग्राह्यसिन्दूरस्य लक्षणम् अतिसूक्ष्मकणं स्निग्धं गुरु वर्णसमुज्ज्वलम् । मृदुलं विमलञ्चैव सिन्दूरं जात्यमुच्यते ॥१५०॥ भा.टी.—अति सूक्ष्मकणवाला, स्निग्ध, गुरुभार चमकीले रंग का, कोमल स्पर्श और स्वच्छ सिन्दूर जात्य [ उत्तम ] कहा जाता है ॥१५०॥