रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५४ रसतरङ्गिणी भा.टी.-खर्पर (खपरिया) के खण्ड बाहर से स्पर्श में खुरदरे, पत्र युक्त या पत्र रहित मिट्टी के खण्ड जैसे पीले और गुरुभार होते हैं ॥१८२॥ वक्तव्य-खपरिया यशद का उपधातु है, जिसे जिंक-कार्बोनेट (Zinc- Carbonate) कहते हैं । आजकल बाजार में केवल एक मिट्टी के ढेले के रूप में प्राप्त होनेवाला खर्पर असली नहीं होता है। अमेरिका की खानों से प्राप्त होनेवाले स्मिथ सोनाइट (Smith Sonile) और केलेमाइट (Calamite) आजकल क्रमशः कारवेल्ल खर्पर तथा दर्दुरखर्पर के नाम से लेने के लिए नवीन वैद्यों का आग्रह है । भारतीय रसायनशास्त्र में भी इन्हीं द्रव्यों को खर्पर सिद्ध किया है । यूनानी वैद्यक संगबसरी को खर्पर सिद्ध करती है। बंगाली वैद्य वंगसेनोक्त "खर्पररसायन" को खर्पर मानते हैं । परन्तु जब तक ठीक निर्णय न हो जाय तब तक कारवेल्ल और दर्दुरखर्पर के स्थान पर Smith Sonite और Calamite नामक द्रव्यों को शुद्ध करके व्यवहार में लाने से कोई हानि नहीं है । खर्परस्य द्वौ भेदौ खर्परो द्विविधः प्रोक्तः सदलो निर्दलस्तथा । सदलो दर्दुराख्यः स्यात्कारवेल्लाभिधोऽपरः ॥१८३॥ खर्परं दर्दुराख्यन्तु योजयेत्सत्त्वपातने । औषधेषु च सर्वत्र कारवेल्लं प्रयोजयेत् ॥१८४॥ सदलो निर्दलश्चेति द्विविधः खर्परः । तौ च क्रमेण दर्दुराख्यया कारवेल्ला- ख्यया च कथ्येते इह रसतन्त्रे औषधप्रयोगेषु ॥१८३, १८४॥ भा.टी.-खपरिया सदल (मोटे-मोटे वर्कोंवाला) तथा निर्दल (खाली पिण्ड रूप) भेद से दो प्रकार का होता है। इनमें से सदल खर्पर 'दर्दुर' और निर्दल खर्पर 'कारवेल्लक' कहा जाता है । सत्वपातनार्थ इनमें से दर्दुरसंज्ञक खर्पर लेना चाहिए । परन्तु बसन्तमालती आदि औषधियोगों में सर्वत्र कार- वेल्लक खर्पर लेना चाहिए ॥१८३, १८४॥ वक्तव्य-१-मृत्तिका खर्पर, २-गुड़खर्पर तथा ३-पाषाणखर्पर भेद से यह तीन प्रकार का होता है। इनमें जो पर्याप्त पीतवर्ण और मिट्टी जैसा होता है.वह मृत्तिकाखर्पर कहा जाता है और जो गुड़ाभमृत्तिका आकार का होता है वह गुड़खर्पर कहा जाता है पाषाणखर्पर अत्यन्त कठोर पत्थर की भाँति होता है। यह चिकित्सा में सबसे निकृष्ट माना जाता है।