भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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एकविंशस्तरङ्गः ५५३ भा.टी.—यह मृद्दारशृंग मलहर त्वच्य, भग्नसन्धानक, पामा-कण्डू-नाशक, विवाई में अत्यन्त लाभदायक और व्रणों का शोधक तथा रोपक है। बवासीर में गुदाव्रण-शोथ और मस्सों के लिए विशेष रूप से लाभदायक होता है ॥१७५, १७६॥ द्वितीयो मृद्दारशृङ्गाद्यो मलहरः पलैकप्रमितं तैलमतसीबीजसम्भवम् । प्रदीप्तचुलिकासंस्थे न्यसेत्तलभाजने ॥१७७॥ मृद्दारशृङ्गजं चूर्णं तोलकैकमितं क्षिपेत् । पचेत्तावत् प्रयत्नेन यावन्नैति प्रगाढताम् ॥१७८॥ ततो दृढपिधानायां काचकुप्यां निधापयेत् । अयं मृद्दारशृङ्गाद्यो नाम्ना मलहरः स्मृतः ॥१७९॥ भा.टी.—एक पल अलसी के तेल को एक पीतल के पात्र में डालकर उसे जलते हुए चूल्हे के ऊपर रख दें। अब इसमें एक तोला मृद्दारशृंगचूर्ण डाल कर तब तक पकायें जब तक कि तेल का गाढ़ा लेप सा न हो जाय। गाढ़ा हो जाने पर इसे उतारकर मजबूत ढक्कनवाली काँच की शीशी में रख लें। इसको भी मृद्दारशृंग मलहर (मलहम) कहते हैं ॥ १७७-१७९ ॥ अस्य गुणाः मृद्दारशृङ्गकाद्योऽयं त्वच्या मलहरः परम् । समाख्यातो विशेषेण विविधव्रणरोपणः ॥१८०॥ भा.टी.—यह मृद्दारशृंग मलहर भी उत्तम त्वच्य (त्वक्-विकार शामक) है। और विशेषकर सब प्रकार के व्रणों को भरने के लिए काम में लाया जाता है ॥१८०॥ अथ खर्परस्य नामानि खर्परः खर्परञ्चैव तदेव खर्परीयकम् । रसको रमकञ्चैव मतं यशदकारणम् ॥१८१॥ अथ क्रमप्राप्तं खर्परं यशदोपधातुत्वादुच्यते—यशदकारणम् यशदगर्भत्वात् इति भावः ॥ १८१ ॥ भा.टी.--खर्पर, खर्परीयक, रसक तथा यशदकारण, ये सब नाम खपरिया के कहे जाते हैं ॥ १८१ ॥ खर्परस्य स्वरूपम् खर्परोऽतिखरश्चैव सदलो निर्दलस्तथा । मृत्तिकाभश्च पीताभो भाराढ्यश्चेह शस्यते ॥१८२॥