रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—मुरदासंग शीत गुण और उत्तम वातकफ-कोप का शामक है। इसको फिरंगव्रणों पर छिड़कने से वे अच्छे हो जाते हैं। शिर के बालों के लिए लाभदायक और व्रणरोपक है। टूटी हुई अस्थि को जोड़ने में इसके लेप लगाये जाते हैं। और पामाकण्डू आदि त्वग्रोगों पर इसके अनेकविधि मलहम लगाये जाते हैं। इसके लगाने से स्थानीय त्वचा तथा कला-रक्तवाहिनियाँ संकुचित हो जाती हैं और त्वचा की खराबी दूर हो जाती है ॥ १७०, १७१ ॥ मृद्दारशृङ्गस्य आमयिकः प्रयोगः पलं मृद्दारशृङ्गं तु टङ्काम्लञ्च द्वितोलकम् । फिरङ्गं विनिहन्त्याशु व्रणेषु त्ववचूर्णितम् ॥ १७२ ॥ अस्य च रोगयोग्यः प्रयोगः—टङ्काम्लं टङ्कणाम्लः, निर्माणप्रकारश्चास्य त्रयोदशे तरङ्गे द्रष्टव्यः ॥ १७२ ॥ भा.टी.—मुरदासंग को एक पल और टंकणाम्ल (Boric acid) दो तोला लेकर दोनों को एकत्र पीसकर चूर्ण कर लें। इस चूर्ण को फिरंगव्रणों पर छिड़कने से वे शीघ्र अच्छे हो जाते हैं ॥ १७२ ॥ वक्तव्य—मुरदासंग भी सीसकस्मास होने से आभ्यन्तर प्रयोग में बहुत ही कम आता है, क्योंकि इसमें सीसकविष विद्यमान रहता है। मृद्दारशृङ्गाद्यमलहरः पलैकं सिक्थतैलन्तु पूर्वोक्तविधिसाधितम् । मृद्दारशृङ्गजं चूर्णं शुद्धं तोलकसंमितम् ॥ १७३ ॥ सम्मेल्य काचफलके काचकुप्यां निधापयेत् । अयं मृद्दारशृङ्गाद्यो नाम्ना मलहरः स्मृतः । १७४ ॥ भा.टी.—पूर्वोक्त विधि से बनाया हुआ सिक्थतैल एक पल, शुद्ध मुरदा- संग चूर्ण एक तोला लेकर दोनों को एकत्र अच्छी तरह काँच के फलक में मिलाकर काँच की शीशी में रख लें। इसको मृद्दारशृंगाद्य मलहर कहा जाता है ॥ १७३, १७४ ॥ अस्य गुणाः मृद्दारशृङ्गाद्योऽयं त्वच्या मलहरः परम् । भग्नसन्धानजननः पामाकण्डूतनाशनः ॥ १७५ ॥ विपादिकाप्रशमनो व्रणशोधनरोपणः । गुदामयहरोऽयं विशेषेण प्रकीर्तितः ॥ १७६ ॥