भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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एकविंशस्तरङ्गः ५५१ मृद्दारशृङ्गस्य शोधनम् मृद्दारशृङ्गं पीताभं सदलं निर्दलं तथा । सीसगर्भं खरस्पर्शं गुरु चैव प्रकीर्तितम् ॥ १६६ ॥ सिन्दूरसजातीयं मृद्दारशृङ्गमिति तस्येदं वर्णनम्— पीताभमिति तस्य परि- चयः। सदलं निर्दलं तथेति द्विविधम्। सीसगर्भमिति सत्त्वमस्य सीसकमेव। स्पष्टमन्यत् ॥ १६६ ॥ भा.टी.—मुरदासँग कुछ पीली चमकवाला, पत्रयुक्त तथा पत्र रहित होता है। इसमें से सीसा निकाला जा सकता है और स्पर्श में यह खुरदरा तथा भार में गुरु होता है ॥ १६६ ॥ मृद्दारशृङ्गस्य शोधनम् मृद्दारशृङ्गमानीय कुट्टयेत् खल्वमध्यगम् । प्रस्तरांशं परित्यज्य पेषयेदतियत्नतः ॥ १६७ ॥ वस्त्रपूतं ततः कृत्वा पुनः सुविमलाम्भसा । पेषयेत्पक्षमेकं तु ततो घर्मे विशोषयेत् ॥ १६८ ॥ मृद्दारशृङ्गकं काममेतद्विधिविशोधितम् । क्षतेऽवचूर्णनाद्यर्थं युञ्जीत भिषजां वरः ॥ १६६ ॥ भा.टी.—मुरदासँग के टुकड़ों को खरल में डालकर खूब कूटें। इसमें जो पत्थर का अंश हो उसे हटाकर अन्य द्रव्य को अच्छी तरह खरल में पीस लें। अब इस पीसे हुए चूर्ण को कपड़े में छान लें। फिर इस छाने हुए बारीक चूर्ण को खरल में स्वच्छ जल से पन्द्रह दिन तक मर्दन करें और धूप में रखकर सुखा लें। इस विधि से शुद्ध किया हुआ मुरदासँग घावों (व्रणों) में छिड़कने के काम में लाना चाहिए ॥ १६७-१६६ ॥ मृद्दारशृङ्गस्य गुणाः मृद्दारशृङ्गं शिशिरं परं वातकफापहम् । फिरङ्गव्रणहृत् केश्यं व्रणरोपणमुत्तमम् ॥१७०॥ भग्नसन्धानजननं पामाकण्डूतिकादिनुत् । सङ्कोचकं विशेषेण त्वग्दोषशमनं मतम् ॥१७१॥ अथास्य गुणाः—शिशिरं बाह्यप्रयोगेषु, आभ्यन्तरप्रयोगस्य व्यापत्तिमत्त्वाद- नुक्तचर एवेति ॥ १७०, १७१ ॥