भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५५० रसतरङ्गिणी तैलपाकविधानेन पाचयेत्तैलपाकवित् ॥ १६३ ॥ सिन्दूराद्यमिदं तैलं भिषग्भिः परिकीर्तितम् । पामाविचर्चिकास्फोटक्षतकण्डूतिकापहम् ॥ १६४ ॥ भा.टी.—स्वच्छ सरसों का तेल दस पल (एक सेर), हरदी तथा आक के पत्तों का मिलित कल्क (पीसकर लुगदी) बीस तोला, सिन्दूर एक पल (आठ तोला), तूतिया चार रत्ती लेकर सब को एकत्र करके तेल बनाने की विधि से तेल पका लेवें । इस तेल को सिन्दूरादितैल कहते हैं । यह तैल बाह्य प्रयोग में पामा, विचर्चिका, स्फोट, क्षत तथा कण्डू को नष्ट करता है ॥ १६२-१६४ ॥ वक्तव्य—यहाँ पर तैल पकाने के लिये जल आदि कोई द्रव द्रव्य का उल्लेख नहीं किया, अतः “अनुक्ते द्रवकार्ये तु सर्वत्र सलिलं मतम्” इस परिभाषा के अनुसार वहाँ पर तैलपाकार्थ अनुक्त जल भी चार सेर डाल देना चाहिए। स्नेह अथवा तैलपाक विधान की संक्षिप्त परिभाषा इस प्रकार समझनी चाहिए—कल्क एक भाग, स्नेह या तेल चार भाग, द्रव सोलह भाग लेकर द्रवांश सूखने तक मन्द-मन्द अग्नि से तेल पका लेना चाहिए। जब तैल या स्नेह पक जाता है तो उसकी परीक्षा के लिये पकते हुए कल्क को अग्नि में डालना चाहिए। यदि कल्क डालने से अग्नि में कोई शब्द न हो तो समझें कि तैल सिद्ध हो गया है। जब तक जल का अंश होगा उसे अग्नि में डालने से अवश्य चट-चट शब्द होगा। अथ मृदारशृङ्गस्य नामानि मृद्दारशृङ्गकञ्चैव मतं बोदारशृङ्गकम् । मुर्दाशङ्गं तथा मुद्रशङ्खकञ्च निगद्यते ॥ १६५ ॥ भा.टी.—मृद्दारशृंगक, बोदारशृंगक, मुर्दाशंख मुर्दाशंखक, ये सब नाम मुर्दासंग के कहे जाते हैं ॥ १६५ ॥ वक्तव्य—मुर्दासिंग को अंग्रेजी में लिथोरि ( Lithory ) कहते हैं । यह नैसर्गिक तौर पर प्राप्त होता है और कृत्रिम विधि से भी बनाया जाता है। कृत्रिम- विधि—पिघले हुए सीसे में धौकनी द्वारा हवा देकर पकाया जाय तो यह चूर्ण रूप में हो जाता है। फिर इसे अधिक गर्मी देकर पकाया जाय तो चूर्ण भी पिघल जाता है । अब इसको जमा दिया जाय तो इसके चमकीले पीतवर्ण के पत्र से बन जाते हैं। इसी को मुर्दासंख कहते हैं। यह हल्के गरम गन्धकाम्ल में भी घुल जाता है जिससे सीसकगन्धित् बनता है। यह सिरकाम्ल में भी घुल जाता है जिससे सीसकसिरकित् बनता है । परन्तु यह जल में नहीं घुलता है ।