भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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एकविंशस्तरङ्गः ५४६ सम्मेल्य मसृणे खल्वे काचकुप्यां निधापयेत् । सिन्दूराद्यो मलहरो नाम्नायं परिकीर्तितः ॥ १५७ ॥ भा.टी.—तीन कर्ष (छः तोला), स्वच्छ सिक्यतैल, सुहागा आधा तोला, सिन्दूर आधा तोला लेकर तीनों को एकत्र खरल में अच्छी तरह मिला कांच की शीशी में रख लें। इसको सिन्दूराद्यमरहम कहा जाता है ॥ १५६, १५७ ॥ अस्य गुणाः सिन्दूराद्यो मलहरः पूयनिर्हरणः परम् । भूतसङ्घप्रशमनो व्रणशोधनरोपणः ॥ १५८ ॥ भा.टी.—यह सिन्दूराद्यमलहर व्रणों में से पूय निकालने में उत्तम है। यह जीवाणुनाशक और व्रणों का शोधन तथा रोपण भी करता है ॥ १५८ ॥ द्वितीयः सिन्दूराद्यो मलहरः अत्रैव टङ्कणस्थाने रालकं यदि दीयते । सिन्दूराद्यो मलहरस्तदायमपि कथ्यते ॥ १५६ ॥ भा.टी.—यदि उक्त सिन्दूरादिमलहर में टंकण (सुहागा) के स्थान पर राल का चूर्ण मिलाया जाय तो यह द्वितीय प्रकार का सिन्दूराद्यमलहर हो जाता है ॥ १५६ ॥ अस्य गुणाः सिन्दूराद्यो मलहरः पामाकण्डूतिनाशनः । भग्नसन्धानजननो भूतघ्नो व्रणरोपणः ॥ १६० ॥ त्वग्दोषशमनः कामं स्फुटिताङ्गविरोपणः । गुदामयस्फोटकुष्ठवीसपर्पादिविकारनुत् ॥ १६१ ॥ भा.टी.—यह सिन्दूरादिमलहम पामा कण्डूति (खुजली) नाशक है। इसको टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने के काम में लाया जाता है और यह कृमिनाशक तथा व्रणों को भरता है। त्वचा की विकृतियों को दूर करता है और फटे हुए अंग, जैसे पैर हाथ आदि को रोपण करता है। इसको बवासीर, फोड़ा, कुष्ठ तथा वीसर्प आदि विकारों में प्रयोग किया जाता है ॥ १६०, १६१ ॥ सिन्दूराद्यतैलम् तैलं सर्षपसम्भूतं शुभं दशपलोन्मितम् । निशार्कपत्रकल्कन्तु दद्याद्विंशतितोलकम् ॥ १६२ ॥ पलोन्मितञ्च सिन्दूरं तुत्थं रक्तिचतुष्टयम् ।