रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
एकविंशस्तरङ्गः ५४६ सम्मेल्य मसृणे खल्वे काचकुप्यां निधापयेत् । सिन्दूराद्यो मलहरो नाम्नायं परिकीर्तितः ॥ १५७ ॥ भा.टी.—तीन कर्ष (छः तोला), स्वच्छ सिक्यतैल, सुहागा आधा तोला, सिन्दूर आधा तोला लेकर तीनों को एकत्र खरल में अच्छी तरह मिला कांच की शीशी में रख लें। इसको सिन्दूराद्यमरहम कहा जाता है ॥ १५६, १५७ ॥ अस्य गुणाः सिन्दूराद्यो मलहरः पूयनिर्हरणः परम् । भूतसङ्घप्रशमनो व्रणशोधनरोपणः ॥ १५८ ॥ भा.टी.—यह सिन्दूराद्यमलहर व्रणों में से पूय निकालने में उत्तम है। यह जीवाणुनाशक और व्रणों का शोधन तथा रोपण भी करता है ॥ १५८ ॥ द्वितीयः सिन्दूराद्यो मलहरः अत्रैव टङ्कणस्थाने रालकं यदि दीयते । सिन्दूराद्यो मलहरस्तदायमपि कथ्यते ॥ १५६ ॥ भा.टी.—यदि उक्त सिन्दूरादिमलहर में टंकण (सुहागा) के स्थान पर राल का चूर्ण मिलाया जाय तो यह द्वितीय प्रकार का सिन्दूराद्यमलहर हो जाता है ॥ १५६ ॥ अस्य गुणाः सिन्दूराद्यो मलहरः पामाकण्डूतिनाशनः । भग्नसन्धानजननो भूतघ्नो व्रणरोपणः ॥ १६० ॥ त्वग्दोषशमनः कामं स्फुटिताङ्गविरोपणः । गुदामयस्फोटकुष्ठवीसपर्पादिविकारनुत् ॥ १६१ ॥ भा.टी.—यह सिन्दूरादिमलहम पामा कण्डूति (खुजली) नाशक है। इसको टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने के काम में लाया जाता है और यह कृमिनाशक तथा व्रणों को भरता है। त्वचा की विकृतियों को दूर करता है और फटे हुए अंग, जैसे पैर हाथ आदि को रोपण करता है। इसको बवासीर, फोड़ा, कुष्ठ तथा वीसर्प आदि विकारों में प्रयोग किया जाता है ॥ १६०, १६१ ॥ सिन्दूराद्यतैलम् तैलं सर्षपसम्भूतं शुभं दशपलोन्मितम् । निशार्कपत्रकल्कन्तु दद्याद्विंशतितोलकम् ॥ १६२ ॥ पलोन्मितञ्च सिन्दूरं तुत्थं रक्तिचतुष्टयम् ।
५५० रसतरङ्गिणी तैलपाकविधानेन पाचयेत्तैलपाकवित् ॥ १६३ ॥ सिन्दूराद्यमिदं तैलं भिषग्भिः परिकीर्तितम् । पामाविचर्चिकास्फोटक्षतकण्डूतिकापहम् ॥ १६४ ॥ भा.टी.—स्वच्छ सरसों का तेल दस पल (एक सेर), हरदी तथा आक के पत्तों का मिलित कल्क (पीसकर लुगदी) बीस तोला, सिन्दूर एक पल (आठ तोला), तूतिया चार रत्ती लेकर सब को एकत्र करके तेल बनाने की विधि से तेल पका लेवें । इस तेल को सिन्दूरादितैल कहते हैं । यह तैल बाह्य प्रयोग में पामा, विचर्चिका, स्फोट, क्षत तथा कण्डू को नष्ट करता है ॥ १६२-१६४ ॥ वक्तव्य—यहाँ पर तैल पकाने के लिये जल आदि कोई द्रव द्रव्य का उल्लेख नहीं किया, अतः “अनुक्ते द्रवकार्ये तु सर्वत्र सलिलं मतम्” इस परिभाषा के अनुसार वहाँ पर तैलपाकार्थ अनुक्त जल भी चार सेर डाल देना चाहिए। स्नेह अथवा तैलपाक विधान की संक्षिप्त परिभाषा इस प्रकार समझनी चाहिए—कल्क एक भाग, स्नेह या तेल चार भाग, द्रव सोलह भाग लेकर द्रवांश सूखने तक मन्द-मन्द अग्नि से तेल पका लेना चाहिए। जब तैल या स्नेह पक जाता है तो उसकी परीक्षा के लिये पकते हुए कल्क को अग्नि में डालना चाहिए। यदि कल्क डालने से अग्नि में कोई शब्द न हो तो समझें कि तैल सिद्ध हो गया है। जब तक जल का अंश होगा उसे अग्नि में डालने से अवश्य चट-चट शब्द होगा। अथ मृदारशृङ्गस्य नामानि मृद्दारशृङ्गकञ्चैव मतं बोदारशृङ्गकम् । मुर्दाशङ्गं तथा मुद्रशङ्खकञ्च निगद्यते ॥ १६५ ॥ भा.टी.—मृद्दारशृंगक, बोदारशृंगक, मुर्दाशंख मुर्दाशंखक, ये सब नाम मुर्दासंग के कहे जाते हैं ॥ १६५ ॥ वक्तव्य—मुर्दासिंग को अंग्रेजी में लिथोरि ( Lithory ) कहते हैं । यह नैसर्गिक तौर पर प्राप्त होता है और कृत्रिम विधि से भी बनाया जाता है। कृत्रिम- विधि—पिघले हुए सीसे में धौकनी द्वारा हवा देकर पकाया जाय तो यह चूर्ण रूप में हो जाता है। फिर इसे अधिक गर्मी देकर पकाया जाय तो चूर्ण भी पिघल जाता है । अब इसको जमा दिया जाय तो इसके चमकीले पीतवर्ण के पत्र से बन जाते हैं। इसी को मुर्दासंख कहते हैं। यह हल्के गरम गन्धकाम्ल में भी घुल जाता है जिससे सीसकगन्धित् बनता है। यह सिरकाम्ल में भी घुल जाता है जिससे सीसकसिरकित् बनता है । परन्तु यह जल में नहीं घुलता है ।
एकविंशस्तरङ्गः ५५१ मृद्दारशृङ्गस्य शोधनम् मृद्दारशृङ्गं पीताभं सदलं निर्दलं तथा । सीसगर्भं खरस्पर्शं गुरु चैव प्रकीर्तितम् ॥ १६६ ॥ सिन्दूरसजातीयं मृद्दारशृङ्गमिति तस्येदं वर्णनम्— पीताभमिति तस्य परि- चयः। सदलं निर्दलं तथेति द्विविधम्। सीसगर्भमिति सत्त्वमस्य सीसकमेव। स्पष्टमन्यत् ॥ १६६ ॥ भा.टी.—मुरदासँग कुछ पीली चमकवाला, पत्रयुक्त तथा पत्र रहित होता है। इसमें से सीसा निकाला जा सकता है और स्पर्श में यह खुरदरा तथा भार में गुरु होता है ॥ १६६ ॥ मृद्दारशृङ्गस्य शोधनम् मृद्दारशृङ्गमानीय कुट्टयेत् खल्वमध्यगम् । प्रस्तरांशं परित्यज्य पेषयेदतियत्नतः ॥ १६७ ॥ वस्त्रपूतं ततः कृत्वा पुनः सुविमलाम्भसा । पेषयेत्पक्षमेकं तु ततो घर्मे विशोषयेत् ॥ १६८ ॥ मृद्दारशृङ्गकं काममेतद्विधिविशोधितम् । क्षतेऽवचूर्णनाद्यर्थं युञ्जीत भिषजां वरः ॥ १६६ ॥ भा.टी.—मुरदासँग के टुकड़ों को खरल में डालकर खूब कूटें। इसमें जो पत्थर का अंश हो उसे हटाकर अन्य द्रव्य को अच्छी तरह खरल में पीस लें। अब इस पीसे हुए चूर्ण को कपड़े में छान लें। फिर इस छाने हुए बारीक चूर्ण को खरल में स्वच्छ जल से पन्द्रह दिन तक मर्दन करें और धूप में रखकर सुखा लें। इस विधि से शुद्ध किया हुआ मुरदासँग घावों (व्रणों) में छिड़कने के काम में लाना चाहिए ॥ १६७-१६६ ॥ मृद्दारशृङ्गस्य गुणाः मृद्दारशृङ्गं शिशिरं परं वातकफापहम् । फिरङ्गव्रणहृत् केश्यं व्रणरोपणमुत्तमम् ॥१७०॥ भग्नसन्धानजननं पामाकण्डूतिकादिनुत् । सङ्कोचकं विशेषेण त्वग्दोषशमनं मतम् ॥१७१॥ अथास्य गुणाः—शिशिरं बाह्यप्रयोगेषु, आभ्यन्तरप्रयोगस्य व्यापत्तिमत्त्वाद- नुक्तचर एवेति ॥ १७०, १७१ ॥
५५२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—मुरदासंग शीत गुण और उत्तम वातकफ-कोप का शामक है। इसको फिरंगव्रणों पर छिड़कने से वे अच्छे हो जाते हैं। शिर के बालों के लिए लाभदायक और व्रणरोपक है। टूटी हुई अस्थि को जोड़ने में इसके लेप लगाये जाते हैं। और पामाकण्डू आदि त्वग्रोगों पर इसके अनेकविधि मलहम लगाये जाते हैं। इसके लगाने से स्थानीय त्वचा तथा कला-रक्तवाहिनियाँ संकुचित हो जाती हैं और त्वचा की खराबी दूर हो जाती है ॥ १७०, १७१ ॥ मृद्दारशृङ्गस्य आमयिकः प्रयोगः पलं मृद्दारशृङ्गं तु टङ्काम्लञ्च द्वितोलकम् । फिरङ्गं विनिहन्त्याशु व्रणेषु त्ववचूर्णितम् ॥ १७२ ॥ अस्य च रोगयोग्यः प्रयोगः—टङ्काम्लं टङ्कणाम्लः, निर्माणप्रकारश्चास्य त्रयोदशे तरङ्गे द्रष्टव्यः ॥ १७२ ॥ भा.टी.—मुरदासंग को एक पल और टंकणाम्ल (Boric acid) दो तोला लेकर दोनों को एकत्र पीसकर चूर्ण कर लें। इस चूर्ण को फिरंगव्रणों पर छिड़कने से वे शीघ्र अच्छे हो जाते हैं ॥ १७२ ॥ वक्तव्य—मुरदासंग भी सीसकस्मास होने से आभ्यन्तर प्रयोग में बहुत ही कम आता है, क्योंकि इसमें सीसकविष विद्यमान रहता है। मृद्दारशृङ्गाद्यमलहरः पलैकं सिक्थतैलन्तु पूर्वोक्तविधिसाधितम् । मृद्दारशृङ्गजं चूर्णं शुद्धं तोलकसंमितम् ॥ १७३ ॥ सम्मेल्य काचफलके काचकुप्यां निधापयेत् । अयं मृद्दारशृङ्गाद्यो नाम्ना मलहरः स्मृतः । १७४ ॥ भा.टी.—पूर्वोक्त विधि से बनाया हुआ सिक्थतैल एक पल, शुद्ध मुरदा- संग चूर्ण एक तोला लेकर दोनों को एकत्र अच्छी तरह काँच के फलक में मिलाकर काँच की शीशी में रख लें। इसको मृद्दारशृंगाद्य मलहर कहा जाता है ॥ १७३, १७४ ॥ अस्य गुणाः मृद्दारशृङ्गाद्योऽयं त्वच्या मलहरः परम् । भग्नसन्धानजननः पामाकण्डूतनाशनः ॥ १७५ ॥ विपादिकाप्रशमनो व्रणशोधनरोपणः । गुदामयहरोऽयं विशेषेण प्रकीर्तितः ॥ १७६ ॥
एकविंशस्तरङ्गः ५५३ भा.टी.—यह मृद्दारशृंग मलहर त्वच्य, भग्नसन्धानक, पामा-कण्डू-नाशक, विवाई में अत्यन्त लाभदायक और व्रणों का शोधक तथा रोपक है। बवासीर में गुदाव्रण-शोथ और मस्सों के लिए विशेष रूप से लाभदायक होता है ॥१७५, १७६॥ द्वितीयो मृद्दारशृङ्गाद्यो मलहरः पलैकप्रमितं तैलमतसीबीजसम्भवम् । प्रदीप्तचुलिकासंस्थे न्यसेत्तलभाजने ॥१७७॥ मृद्दारशृङ्गजं चूर्णं तोलकैकमितं क्षिपेत् । पचेत्तावत् प्रयत्नेन यावन्नैति प्रगाढताम् ॥१७८॥ ततो दृढपिधानायां काचकुप्यां निधापयेत् । अयं मृद्दारशृङ्गाद्यो नाम्ना मलहरः स्मृतः ॥१७९॥ भा.टी.—एक पल अलसी के तेल को एक पीतल के पात्र में डालकर उसे जलते हुए चूल्हे के ऊपर रख दें। अब इसमें एक तोला मृद्दारशृंगचूर्ण डाल कर तब तक पकायें जब तक कि तेल का गाढ़ा लेप सा न हो जाय। गाढ़ा हो जाने पर इसे उतारकर मजबूत ढक्कनवाली काँच की शीशी में रख लें। इसको भी मृद्दारशृंग मलहर (मलहम) कहते हैं ॥ १७७-१७९ ॥ अस्य गुणाः मृद्दारशृङ्गकाद्योऽयं त्वच्या मलहरः परम् । समाख्यातो विशेषेण विविधव्रणरोपणः ॥१८०॥ भा.टी.—यह मृद्दारशृंग मलहर भी उत्तम त्वच्य (त्वक्-विकार शामक) है। और विशेषकर सब प्रकार के व्रणों को भरने के लिए काम में लाया जाता है ॥१८०॥ अथ खर्परस्य नामानि खर्परः खर्परञ्चैव तदेव खर्परीयकम् । रसको रमकञ्चैव मतं यशदकारणम् ॥१८१॥ अथ क्रमप्राप्तं खर्परं यशदोपधातुत्वादुच्यते—यशदकारणम् यशदगर्भत्वात् इति भावः ॥ १८१ ॥ भा.टी.--खर्पर, खर्परीयक, रसक तथा यशदकारण, ये सब नाम खपरिया के कहे जाते हैं ॥ १८१ ॥ खर्परस्य स्वरूपम् खर्परोऽतिखरश्चैव सदलो निर्दलस्तथा । मृत्तिकाभश्च पीताभो भाराढ्यश्चेह शस्यते ॥१८२॥
५५४ रसतरङ्गिणी भा.टी.-खर्पर (खपरिया) के खण्ड बाहर से स्पर्श में खुरदरे, पत्र युक्त या पत्र रहित मिट्टी के खण्ड जैसे पीले और गुरुभार होते हैं ॥१८२॥ वक्तव्य-खपरिया यशद का उपधातु है, जिसे जिंक-कार्बोनेट (Zinc- Carbonate) कहते हैं । आजकल बाजार में केवल एक मिट्टी के ढेले के रूप में प्राप्त होनेवाला खर्पर असली नहीं होता है। अमेरिका की खानों से प्राप्त होनेवाले स्मिथ सोनाइट (Smith Sonile) और केलेमाइट (Calamite) आजकल क्रमशः कारवेल्ल खर्पर तथा दर्दुरखर्पर के नाम से लेने के लिए नवीन वैद्यों का आग्रह है । भारतीय रसायनशास्त्र में भी इन्हीं द्रव्यों को खर्पर सिद्ध किया है । यूनानी वैद्यक संगबसरी को खर्पर सिद्ध करती है। बंगाली वैद्य वंगसेनोक्त "खर्पररसायन" को खर्पर मानते हैं । परन्तु जब तक ठीक निर्णय न हो जाय तब तक कारवेल्ल और दर्दुरखर्पर के स्थान पर Smith Sonite और Calamite नामक द्रव्यों को शुद्ध करके व्यवहार में लाने से कोई हानि नहीं है । खर्परस्य द्वौ भेदौ खर्परो द्विविधः प्रोक्तः सदलो निर्दलस्तथा । सदलो दर्दुराख्यः स्यात्कारवेल्लाभिधोऽपरः ॥१८३॥ खर्परं दर्दुराख्यन्तु योजयेत्सत्त्वपातने । औषधेषु च सर्वत्र कारवेल्लं प्रयोजयेत् ॥१८४॥ सदलो निर्दलश्चेति द्विविधः खर्परः । तौ च क्रमेण दर्दुराख्यया कारवेल्ला- ख्यया च कथ्येते इह रसतन्त्रे औषधप्रयोगेषु ॥१८३, १८४॥ भा.टी.-खपरिया सदल (मोटे-मोटे वर्कोंवाला) तथा निर्दल (खाली पिण्ड रूप) भेद से दो प्रकार का होता है। इनमें से सदल खर्पर 'दर्दुर' और निर्दल खर्पर 'कारवेल्लक' कहा जाता है । सत्वपातनार्थ इनमें से दर्दुरसंज्ञक खर्पर लेना चाहिए । परन्तु बसन्तमालती आदि औषधियोगों में सर्वत्र कार- वेल्लक खर्पर लेना चाहिए ॥१८३, १८४॥ वक्तव्य-१-मृत्तिका खर्पर, २-गुड़खर्पर तथा ३-पाषाणखर्पर भेद से यह तीन प्रकार का होता है। इनमें जो पर्याप्त पीतवर्ण और मिट्टी जैसा होता है.वह मृत्तिकाखर्पर कहा जाता है और जो गुड़ाभमृत्तिका आकार का होता है वह गुड़खर्पर कहा जाता है पाषाणखर्पर अत्यन्त कठोर पत्थर की भाँति होता है। यह चिकित्सा में सबसे निकृष्ट माना जाता है।
एकविंशस्तरङ्गः ५५५ खर्परस्य प्रथमो मारणप्रकारः खर्परं खल्वगं लोहमुद्गरेण विघातयेत् । पतितं प्रस्तरांशञ्च यत्नतः परिवर्जयेत् ॥ १८५ ॥ प्रस्तरांशपरित्यक्तं खर्परं त्वथ खल्वगम् । निम्बूकस्वरसोपेतं पेषयेत्सप्तवासरम् ॥ १८६ ॥ विशोषितं तु पीताभं श्लक्ष्णचूर्णं प्रजायते । एवं नातिचिरादेव खर्परः परिशुध्यति ॥ १८७ ॥ खर्परशोधनं निम्बुनीरेण मर्दनम्—सप्तधा निम्बूनीरे निर्वापणाद्वा काञ्जिके तक्रे वा निर्वापणात् । उक्तं हि-“खर्परः परिसन्तप्तः सप्तवारान् निमज्जितः । निम्बू- नीरद्रवस्यान्तर्निर्मलत्वमवाप्नुयात् ॥” इति ॥ १८५–१८७ ॥ भा.टी.—खपरिया के टुकड़ों को लेकर उनको लोहे के खरल या इमाम- दस्ते में डाल लोहे की मूसली से खूब अच्छी तरह कूटें । कूटने पर जो पत्थर के टुकड़े पृथक् हो जाँय उन्हें अलग करके पत्थर रहित भाग को खरल में डालें और उसमें नींबू का स्वरस मिलाकर घोटें । जब नींबू का रस सूख जाय तो पुनः स्वरस डालकर घोटें । इस प्रकार सात बार समभाग नीबूरस डालकर घोटने के बाद सुखा लें । इसका सूक्ष्मचूर्ण हो जायेगा । इस विधि से खर्पर शीघ्र ही अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है । नींबू के रस में घोटने के बाद उसमें जल डालकर थोड़ी देर रखकर ऊपर का स्वच्छ जल निकालकर फेंक दें । इस तरह उसमें खटाई का अंश नहीं रहता है ॥ १८५–१८७ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः खर्परः प्रखरे वह्नौ सप्तधा परितापितः । निषिक्तो निम्बुकद्रावे शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १८८ ॥ भा.टी.—खपरिया के खण्डों को तीव्र अग्नि में गरम करके नींबू के रस में बुझा दें । इस प्रकार सात बार नींबू के रस में बुझा देने से खर्पर की शुद्धि हो जाती है ॥ १८८ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः खर्परः परिसन्तप्तस्तके वा गृहवारिणि । निषिक्तः सप्तवारं तु विमलत्वमवाप्नुयात ॥ १८६ ॥ भा.टी.—खर्पर को तीव्र अग्नि में तपाकर सात बार तक्र में अथवा काञ्जी में बुझा देने से भी वह शुद्ध हो जाता है ॥ १८६ ॥
५५६ रसतरङ्गिणी विशोधितं खर्परन्तु पलद्वितयसंमितम् । तुल्येन चातिशुद्धेन रसेन्द्रेण विमर्दयेत् ॥ १६० ॥ श्लक्ष्णचूर्णं ततः कृत्वा सम्पुटस्थं तु कारयेत् । पुटयेदृतियतनेन शुष्कवन्योपलानले ॥ १६१ ॥ त्रिधैवं पुटितोऽप्यन्तु निर्विशेषां मृतिं व्रजेत् । इत्थं सुमृदुलं रम्यं पीताभं भस्म जायते ॥ १६२ ॥ खर्परस्य प्रथमो मारणप्रकारः—तुल्येन खर्परसमानेन अतिशुद्धेन इति भक्ष- णयोग्यतासम्पत्त्यै कथितम्। पीताभमिति यथादृष्टमुक्तम्। प्राञ्चस्तु—"खर्परं पारदेनैव चूर्णयित्वा दिनं पचेत्। वालुकायन्त्रमध्यस्थं शोणं भस्म प्रजायते" इत्याहुः ॥ १६०-१६२ ॥ भा.टी.—उक्तविधि से शुद्ध किये हुए खर्पर को दो पल प्रमाण मात्रा में लेकर खरल में डालें और इसमें दो पल शुद्ध पारद भी डाल दें। अब इनको खूब मर्दन करके बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके जङ्गली सूखे हुए उपलों की अग्नि (पुट) में फूँक दें। इस प्रकार सावधानी के साथ तीन बार पारद के साथ खर्पर को पुट देने से वह भस्म हो जाता है। इसकी भस्म अत्यन्त सुन्दर, कोमल और पीताभ वर्ण की होती है ॥ १६०–१६२ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः खर्परो विमलः शुद्धस्तुल्यतालकपेषितः । सम्पुटस्थस्त्रिपुटितः सर्वथा मृतिमाप्नुयात् ॥ १६३ ॥ भा.टी.--शुद्ध खर्परचूर्ण में समभाग शुद्ध हरतालचूर्ण मिलाकर जल से घोटकर सुखा लें। अब इसे सम्पुट में बन्द करके साधारण पुट में फूँक दें। इसी विधि को तीन बार दुहराने से खर्पर की उत्तम भस्म हो जाती है ॥१६३॥ मृतखर्परस्य गुणाः सुमृतः खर्परः शीतः कफपित्तापहः परम् । चक्षुष्यः सर्वमेहघ्नो रक्तप्रदरनाशनः ॥ १६४ ॥ रक्तपीत्ताश्मरीश्वासगुदामयनिषूदनः । जीर्णज्वरहरः कामं त्वतीसारनिबर्हणः ॥ १६५ ॥ योगवाही विशेषेण त्रिदोषघ्नो विषापहः ।
एकविंशस्तरङ्गः ५५७ विचर्चिकाकुष्ठहरो बलवीर्यविवृद्धिकृत् ॥१६६॥ मृतखर्परगुणाः—शीतः शीतवीर्य्यः । उक्तं हि—“खर्परं कटुकं क्षारं कषायं वामकं लघु । लेखनं भेदनं शीतं चक्षुष्यं कफपित्तनुत् । विपाशमकुष्ठकण्डूनां नाशनं परमं मतम् ॥” इति । क्वचित्तु भ्रान्त्या खर्परस्तुत्थस्यैव भेद इत्युक्तं कैश्चित् ; तन्न सम्यक् , तुत्थस्य ताम्रोपधातुत्वात् , खर्परस्य च यशदोपधातुत्वात् । यत्तु “रसश्च रसकश्चोभौ येनाग्निसहनौ कृतौ ।” इत्याभाणकं तदपि यशदस्य बहायुड्डयनशीलत्वात्संगतमेवेति ॥ १६४, १६५ ॥ भा.टी.—खर्परभस्म शीतवीर्य, उत्तम कफपित्तप्रकोपहर होती है । इसके योग नेत्रों में लगाने से नेत्रों को लाभ पहुँचाते हैं । इसके सेवन से प्रमेहों में होनेवाले स्राव कम हो जाते हैं और रक्तप्रदर का स्राव भी कम हो जाता है । इसकी भस्म रक्तपित्त, अश्मरी, श्वास, बवासीर, जीर्णज्वर और पुरातन त्रिदोष प्रकोप जैसे राजयक्ष्म और विषों को भी नष्ट करती है । बाह्यप्रयोग में इसके प्रयोग से विचर्चिका तथा त्वक्-रोगों में आराम आता है । इसको विधिपूर्वक सेवन करने से शरीर में बल-वीर्य की वृद्धि होती है ॥ १६४–१६६ ॥ खर्परस्य मात्रानिरूपणम् गुञ्जाद्धैर्त्तः समारभ्य गुञ्जाद्वितयसंमिता । खर्परस्य मता मात्रा रोगापनयनक्षमा ॥ १६७ ॥ भा.टी.—खर्परभस्म की मात्रा आधी रत्ती से लेकर दो रत्ती तक भिन्न- भिन्न रोगों में प्रयोग की जा सकती है ॥ १६७ ॥ खर्परस्य आमयिकः प्रयोगः गोक्षुरक्वाथसंयुक्तः खर्परः परिशीलितः । विनिहन्त्यचिरादेव मूत्रकृच्छ्रभवां रुजम् ॥ १६८ ॥ वंशलोचनचूर्णेन खर्परः परिशीलितः । चिरोत्थितं क्षयोत्थं वा कासं श्वासं समुद्धरेत् ॥ १६६ ॥ खर्परः शीलितस्तुल्यकान्तलोहस्य भस्मना । विनिहन्ति गदान् पाण्डुश्वयथुप्रदरादिजान् ॥२००॥ रससिन्दूररजसा खर्परः परिशीलितः । निरन्तरप्रयोगेण हन्ति जीर्णज्वरं परम् ॥ २०१ ॥ प्रवालमरिचोपेतो रससिन्दूरसंयुतः । सजीरको निम्बूवारा खर्परस्तु निषेवितः ॥ २०२ ॥
५५८. रसतरङ्गिणी धातुज्वरं वह्निमान्द्यं तथा जीर्णज्वरादिकम् । विनाशयत्याशु यथा तिमिरं तु प्रभाकरः ॥२०३॥ भा.टी.—खर्परभस्म को गोखरुक्वाथ के साथ सेवन करने से शीघ्र ही मूत्र- कृच्छ्र रोग में आराम आता है । पुराने कास श्वास अथवा क्षयकास में खर्पर- भस्म वंशलोचन के चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करने से शीघ्र लाभ होने लगता है । पाण्डु, श्वयथु तथा प्रदर आदि रोगों में खर्परभस्म में समभाग कांत- लोहभस्म मिलाकर उचित अनुपान के साथ सेवन कराया जाता है। खर्परभस्म में रससिन्दूर मिलाकर कुछ दिन तक निरन्तर सेवन करने से जीर्णज्वर नष्ट होता है। खर्परभस्म में प्रवालभस्म, कालीमिर्चचूर्ण, रससिन्दूर तथा जीराचूर्ण मिला कर नींबू के स्वरस के साथ कुछ दिन सेवन कराने से धातुगतज्वर, अग्निमान्द्य तथा जीर्णज्वर आदि रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं ॥ १६८–२०३ ॥ खर्परस्य प्रथमः सत्त्वपातनप्रकारः लाक्षाभयाहरिद्रोमागुंडरालकटङ्कणैः । चूर्णीकृतं खर्परन्तु गव्यदुग्धाज्यतः पचेत् ॥२०४॥ विधाय गोलकं घर्मे शोषयेद्रसकोविदः । वृन्ताकमूषानिहितं ध्मापयेत् प्रखराग्निना ॥२०५॥ विद्रुतं परितो ज्ञात्वा ढालयेत् क्षितिगतिके । यशदप्रभमत्यच्छं सत्त्वं पतति शोभनम् ॥२०६॥ सत्त्वपातनप्रकारः—उमा अतसी, सुगममन्यत् । यशदप्रभं सत्त्वमिति खर्प- रस्य सत्वं यशदमेव भवति ॥ २०४–२०६ ॥ भा.टी.—खर्परचूर्ण में लाख, हरीतकी, हरिद्रा, अलसी, गुड़, राल तथा सुहागा चूर्ण मिला कर घोटें। जब खूब बारीक हो जाय तो इसको गोदुग्ध तथा गोधृत में मिलाकर अग्नि में पका लें। जब यह गोला-सा हो जाय तो इसे तीव्र धूप में सुखा लें और इस गोलक को वृन्ताक (पूर्वोक्त) मूषा में रखकर तीव्र अग्नि से तपायें। जब खर्पर पिघलने को होता है तो अग्नि की ज्वाला नीले वर्ण की होने लगती है और जब पिघल जाता है तो अग्नि की ज्वाला सफेद वर्ण की हो जाती है। इस अग्नि परीक्षा से जब खर्पर का पिघलना निश्चित हो जाय तो इस (खर्पर मूषा) को जमीन में बनाये हुए एक छोटे से गढ़े में उलट दें। इस विधि से यशद के सदृश वर्ण भारयुक्त स्वच्छ खर्परसत्व निकल आता है ॥ २०४–२०६ ॥
एकविंशस्तरङ्गः ५५६ वक्तव्य—खर्परसत्त्व यशद ही होती है, क्योंकि खर्पर यशद धातु का ही Oxide है । खर्परस्य द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः लाक्षाभयाहरिद्रोमागुडगलकटङ्कणैः । यशदप्रभवः पिष्ट एतैस्तु समभागिकैः ॥२०७॥ मूकमूषागतो ध्मातः सततं प्रखराग्निना । यशदप्रभमत्यच्छं सत्त्वमाशु प्रमुञ्चति ॥२०८॥ भा.टी.—खर्पर, लाक्षा, हरीतकी, हरिद्रा, अलसी, गुड़, राल तथा सुहागा; इन सब को समभाग में लेकर अच्छी तरह एकत्र पीसकर अंधमूषा में रखकर तीव्र अग्नि से तपायें तो स्वच्छ यशद के सदृश सत्त्व निकल आता है ॥२०७-२०८॥ खर्परसत्त्वस्य मारणम् [ गीतिका ] सत्त्वं पलप्रमाणं खलु खर्परीयकोत्थम् । विनिधापयेत्कटाहे परिदीप्तचुल्लिकास्थे ॥२०६॥ विद्रुतं विलोक्य सत्त्वं परिघट्टयंस्तु दर्व्या । अधिनिक्षिपेद्विशुद्धं भृशमल्पमल्पमालम् ।२१०॥ विधिना ह्यनेन सत्त्वं मृतिमेति निर्विशेषाद् । सुमृतं तु सत्त्वमेवं विनियोजयेद्विशङ्कः ॥२११॥ सत्त्वमारणम्—अल्पमल्पं आलं हरितालं विनिक्षिपेदिति ॥२०६-२११॥ भा.टी.—खर्परसत्त्व एक पल प्रमाण में लेकर एक लोहे की कड़ाही में डालकर चूल्हे में अग्नि पर तपायें । जब सत्त्व पिघल जाय तो उसको करछी से चलाते हुए उसमें थोड़ा-थोड़ा करके शुद्ध हरतालचूर्ण डालते जायँ और करछी से चलाते जायँ । इस विधि से खर्परसत्त्व की उत्तम भस्म बन जाती है । इसको निःशंक होकर योगों में प्रयोग कर सकते हैं ॥ २०६-२११ ॥ मृतखर्परसत्त्वस्य गुणाः सत्त्वं खर्परसम्भूतं पाण्डुश्वयथुगुल्मनुत् । कासश्वासक्षयहरं विषमज्वरनाशनम् ॥२१२॥ रजःशूलं रक्तगुल्मं श्वेतप्रदरमुल्बणम् । मधुमेहं तथा हिक्कां विशेषेण विनाशयेत् ॥२१३॥ भा.टी.—खर्परसत्त्व की भस्म पाण्डुरोग, शोथ, गुल्म, कास, श्वास, क्षय
५६० रसतरङ्गिणी रोगों को नष्ट करती है । इसके सेवन से विषमज्वर दूर हो जाता है । वात- प्रकोप, रजःशूल, रक्तगुल्म तथा भयंकर श्वेतप्रदर, मधुमेह और हिक्कारोग को नष्ट करती है ॥ २१२, २१३ ॥ वक्तव्य—खर्परभस्म राजयक्ष्मा तथा जीर्णज्वर के लिए तथा अधिक स्वेद और रात्रिस्वेद के लिए उत्तम मानी जाती है, परन्तु खर्परसत्वभस्म इससे भी अधिक गुणकारी होती है । मृतखर्परसत्त्वस्य मात्रादिनिरूपणम् मृतखर्परसत्त्वस्य मात्रा यशदवन्मता । आमयेषु च सर्वत्र प्रयोगश्चापि तादृशः ॥२१४॥ भा.टी.—खर्परसत्वभस्म की मात्रा यशदभस्म के समान ही समझनी चाहिए । इसी तरह रोगों में भी सब जगह यशद की भाँति इसका प्रयोग करना चाहिए ॥ २१४ ॥ अथ कान्तपाषाणस्य नामानि कान्तपाषाणकः ख्यातः चुम्बको लोहकर्षकः । कान्तोपलः कान्तदृषत् स एव परिकीर्तितः ॥२१५। लौहस्योपधातुत्वात् क्रमप्राप्तकान्तपाषाणस्योपक्रमः कान्तपाषाणकः ख्यात इति ॥ २१५ ॥ भा.टी.—कान्तपाषाण, चुम्बक, लोहकर्षक, कान्तोपल, कान्तदृषत्, ये सब नाम चुम्बक पत्थर के कहे जाते हैं ॥ २१५ ॥ वक्तव्य—चुम्बक पत्थर को मैगनिटिक औक्साइड आफ आइरन— ( Magnitic oxide of Iron ) या Feroso Ferric oxide कहते हैं । इसमें एक विद्युत् शक्ति होती है जिसको Magnetism कहते हैं जिससे यह दूसरे लोह को अपनी तरफ खींचता है । यह भी खनिज द्रव्य है । इसको आयुर्वेद में चुम्बक लोह माना गया है जैसा कि लोहभेदों में पहले बताया जा चुका है । इसी पत्थर से प्राप्त किए हुए लोह को कान्तलोह कहा जाता है । कान्तपाषाणस्य शोधनम् चूर्णितं कान्तपाषाणं निम्बूकद्रवसंयुतम् । शोभाञ्जनरसेनैव दोलायन्त्रगतं पचेत् ॥२१६॥ चतुर्यामं पचेद्धीमान् सततं प्रखराग्निना । एवं नातिचिरादेव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२१७॥ कान्तपाषाणशोधनं निम्बूकरसेन भावयित्वा शोभाञ्जनरसे दोलया परि-
३६ एकविंशस्तरङ्गः ५६१ पाचनात् अथवा निम्बूकरसमिश्रिते शोभाञ्जनरसे दोलया कान्तपाषाणस्य पाचनं विधेयम् । उक्तं हि—“शोभाञ्जनरसे साम्लवर्गे दोलागतो दिनम् । पाचितः शुद्धयते कान्तपाषाणः पारदोषकृत् ॥” द्वितीये प्रकारे स्वेदितमिति दोलया ॥२१६, २१७॥ भा.टी.—कान्तपाषाण को चूर्ण करके नींबूरस की भावना देकर फिर इसको दोलायन्त्र में सहजनास्वरस भरकर उसमें चार पहर तक तीव्र अग्नि से पकाने पर शीघ्र ही कान्तपाषाण की उत्तम शुद्धि हो जाती है ॥ २१६, २१७ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः चूर्णितं कान्तपाषाणमगस्त्यद्रवभावितम् । स्वेदितं तु वराक्वाथे शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२१८॥ भा.टी.—कान्तपाषाण के चूर्ण को अगस्त्य के रस में दो-तीन भावना देकर सुखा लें, फिर इसको कपड़े में पोटली बनाकर त्रिफलाक्वाथ में दोलायन्त्र में चार पहर तक स्वेदन करें तो कान्तपाषाण की शुद्धि हो जाती है ॥ २१८ ॥ कान्तपाषाणस्य मारणप्रकारः विशुद्धं कान्तपाषाणं गोमूत्रेण विमर्दयेत् । त्रिफलाक्वथितेनापि विमर्द्य कृतचक्रिकम् ॥२१९॥ सम्पुटस्थं पुटेद्धीमान् सप्तवारं प्रयत्नतः । एवन्तु कान्तपाषाणो म्रियते नात्र संशयः ॥२२०॥ एतस्य मारणं गोमूत्रत्रिफलाक्वाथाभ्यां विमर्द्य साध्यम् ॥ २१६, २२० ॥ भा.टी.—उक्त विधि से शुद्ध किये हुए कान्तपाषाण को गोमूत्र के साथ मर्दन करें । फिर इसको त्रिफलाक्वाथ के साथ मर्दन करके टिकिया बनाकर धूप में सुखा लें, अब इन टिकियाओं को सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके पुट में फूँक दें । स्वांगशीतल होने पर सम्पुट में से कान्तपाषाण को निकाल खरल में पुनः गोमूत्र और त्रिफलाकपाय के साथ मर्दन करके टिकिया बना फिर सम्पुट बन्द करके पुट में फूँक दें । इस विधि को सात बार दुहराने से निःसन्देह कांत- पाषाण की भस्म हो जाती है ॥ २१६, २२० ॥ मृतकान्तपाषाणस्य गुणाः सुमृतः कान्तपाषाणः शिशिरो बृंहणस्तथा । बल्यो वृष्यस्तथा त्वच्यो मूर्च्छामोहनिबर्हणः ॥ २२१ ॥ ज्वरघ्नश्च विषघ्नश्च तथा वार्द्धक्यनाशनः । रक्तसञ्जननः कामं हृद्रेपननिषूदनः ॥ २२२ ॥
५६२ रसतरङ्गिणी रजोदोषं शुक्रदोषं रक्तपित्तं सुदारुणम् । क्लैब्यं कण्डूं कामलाञ्च क्षयं पित्तं त्वगाश्रितम् ॥२२३॥ कासं श्वासं महाघोरं प्रमेहं चाचिरोत्थितम् । विनाशयेद्विशेषेण न सन्देहोऽत्र कश्चन ॥२२४॥ मृतकान्तपाषाणगुणाः—कान्तपाषाणः शिशिरस्तथा मूर्च्छादिरोगनाशनश्च । न सन्देहोऽत्र कश्चन इति अनुभवप्रत्ययः ॥ २२१-२२४ ॥ भा.टी.—कान्तपाषाण की भस्म शीतगुण और शीतवीर्य होती है । इसके सेवन से शरीर मोटा ( बृंहण ) होता है और उसमें बलवृद्धि तथा उत्पादक अंगों में उत्तेजना ( वृष्य ) उत्पन्न होती है । यह त्वच्य तथा मूर्च्छा और मोह को दूर करती है । यह ज्वरनाशक, विषनाशक तथा वार्द्धक्यनाशक होती है । इसके सेवन से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है और हृदय की घबड़ाहट ( पल- पिटेशन) दूर होती है । यह मासिकधर्म की खराबी, शुक्रदोष, भयंकर रक्तपित्त, नपुंसकता, कण्डू, कामला और क्षय रोगों को नष्ट करती है । इसके सेवन से त्वगाश्रित पित्त ( रक्त में पित्त का प्रकोप मिश्रण ), कास, श्वास तथा पुरातन प्रमेह रोग विशेष रूप से निःसन्देह दूर होते हैं ॥ २२१-२२४ ॥ अस्य मात्रा कान्तपाषाणकस्येह रक्तिकाद्वितयोन्मिता । पूर्णमात्रा मता विज्ञैर्गदापनयनक्षमा ॥२२५॥ कान्तपाषाणभस्म की पूर्णमात्रा दो रत्ती तक प्रयोग की जा सकती है॥२२५॥ कान्तपाषाणस्य प्रयोगः कान्तपाषाणकः कामं लोहवद् गुणकारकः । आमयेषु च सर्वेषु प्रयोगश्चापि तादृशः ॥ २२६ ॥ भा.टी.—कान्तपाषाण की भस्म प्रायः लोह अथवा कान्तलोह के समान गुणकारक होती है । अतः सब रोगों में लोहभस्म के समान ही प्रयोग करना चाहिए ॥ २२६ ॥ अथ काशीसस्य नामानि काशीशकञ्च कासीसं पुष्पकासीसकन्तथा । पांशुकं पांशुकासीसं खगाख्यञ्च प्रकीर्तितम् ॥ २२७ ॥ भा.टी.—काशीशक, कासीस, पुष्पकासीसक, पांशुक, पांशुकासीस और खग ( पछी ) के नाम कसीस के कहे जाते हैं ॥ २२७ ॥
वक्तव्य—कसीस भी लोह का समास है और यह प्रायः कृत्रिम विधि से ही निर्मित प्राप्त होता है। इसका निर्माण-प्रकार आगे दिया गया है। आज- कल कसीस हरे-हरे क्रिस्टल के रूप में प्राप्त होता है। इसे अंग्रेजी में फेरीसल्फ (Ferrisulph) अथवा फेरस सल्फेट (Ferrous Sulphate) कहते हैं। इसको अग्नि पर गरम करने से इसमें से जल निकलता है। इस जल को वाटर आफ क्रिस्टलाइजेशन (Water of Crystallisation) कहते हैं। इसी के कारण यह कण रूप में प्राप्त होता है। जब तपाने पर इसमें से जल निकल जाता है तो यह कसीस सफेद रंग का हो जाता है। अतः कणरूप में होने का कारण इसमें जल ही है। यदि इसको अधिक गरम किया जाय तो इसमें से प्रथम जल निकलता है, फिर सफेद रंग का धुँआ निकलता है, जिसे यदि द्रवीभूत करके परीक्षा करें तो ज्ञात होता है कि यह तेल सा गाढ़ा पदार्थ है। इसकी कुछ बूँदों को जल में डालकर चखने से खट्टा स्वाद मालूम होता है और कसीस के द्रवीभूत धुएँ को लकड़ी या कपड़े पर डालें तो वे झुलस जायेंगे। परीक्षा करने पर यह गन्धकाम्ल सिद्ध हुआ है। पहिले इसी को गंधक- तैल कहते थे। क्रिस्टल के स्वरूप में प्राप्त होनेवाले कसीस को पुष्पकासीस समझना चाहिये और जो ओक्साई के रूप में हो जाता है उसे बालुकासीस समझा जाता है। कहीं कहीं कसीस के हीरा कसीस, पुष्पकासीस और लोह- कासीस, इस तरह तीन भेद लिखे हैं, परन्तु दो भेद ही अधिक प्रचलित हैं। कासीसस्य द्वौ भेदौ चूर्णकासीसकञ्चैव पुष्पकासीसकन्तथा। कासीसं द्विविधं ख्यातं रसत्तन्त्रप्रयोक्तृभिः ॥२२८॥ भा.टी.—चूर्णकासीस और पुष्पकासीस भेद से कसीस दो प्रकार की मानी गयी है ॥ २२८ ॥ अनयोः स्वरूपम् चूर्णकासीसकं श्वेतमीषत्पीतञ्च कीर्तितम्। पुष्पकासीसकं स्वच्छहरिद्वर्णं प्रकीर्तितम् ॥२२६॥ भा.टी.—इन द्विविध कासीसों में से चूर्णकासीस सफेद और कुछ पीले रंग की होती है। परन्तु पुष्पकासीस (हीरा कसीस) स्वच्छ हरित् वर्ण की होती है ॥ २२६ ॥ वक्तव्य—कसीस की पोटली बाँधकर भांगरे के स्वरस में स्वेदन करने से वह उसमें घुलकर नीचे आ जाती है। अतः इसको थोड़ी देर अर्थात् करीब
५६४ रसतरङ्गिणी
सवा घंटे तक ही स्वेदन करना चाहिये और इसका चूर्ण बनाकर पोटली में नहीं बाँधना चाहिये, किन्तु मोटे-मोटे खण्डों को ही पोटली में बाँधना चाहिये। कासीसस्य शोधनम् कासीसं भृङ्गराजोत्थवारिणि घटिकात्रयम् । सकृत् स्विन्नं प्रयत्नेन् शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२३०॥ भा.टी.—कसीस को एक बार भांगरे के रस में दोलायन्त्र द्वारा तीन घड़ी तक स्वेदन करने से वह उत्तमरूप से शुद्ध हो जाती है ॥२३०॥ कासीसस्य गुणाः कासीसं तुवरं ग्राहि विपाकोष्णन्तु शीतलम् । श्वित्रघ्नं नेत्र्यमतुलं विषघ्नं कचरञ्जनम् ॥२३१॥ वातश्लेष्मामयहरं मूत्रकृच्छ्रप्रणाशनम् । कण्डूपाण्डुकृमिघ्नञ्च रक्तसञ्जननं परम् ॥२३२॥ रजःप्रवर्तकं बल्यं ज्वरघ्नं प्लीहनाशनम् । बाह्यप्रयोगे विज्ञेयं सङ्कोचनकरं परम् ॥२३३॥ लोहमलत्वात् कान्तपाषाणसजातीयं कासीसं क्रमप्राप्तवर्णनम् । कासीसं द्विविधं चूर्णकासीसं पुष्पकासीसञ्चेति । कासीसं विपाके उष्णं स्पर्शतः, प्रथमा- वस्थायांतु शीतलम्, कचानां केशानां रञ्जनं कृष्णताकरम् । तथा बाह्यप्रयोगे लेपादिना सङ्कोचनकरम् । उक्तञ्च “कासीसद्वयमप्युष्णं तिक्तञ्च तुवरं तथा । वातश्लेष्महरं केश्यं नेत्र्यं कंडूविषप्रणुत् ॥ मूत्रकृच्छ्राश्मरीश्वित्रनाशनं परिकीर्ति- तम् । सकृद् भृङ्गाम्बुना स्विन्नं कासीसं निर्मलं भवेत्” इति ॥२३१–२३३॥ भा.टी.—कसीस कषैली (रस में), ग्राही गुण में, विपाक में कटु, उष्ण गुण और बाह्यस्पर्श में शीतल गुणयुक्त होती है। इसको सफेद कोढ़ पर बाहर से लगाया जाता है, नेत्रों के लिये लाभदायक होता। इसके लेप से अथवा अन्तः प्रयोग से वमन द्वारा शरीरगत विष नष्ट हो जाते हैं। कसीस के द्वारा बालों को काला करनेवाले खिजाब बनाये जाते हैं। यह वातश्लेष्महर, मूत्रकृच्छ्रनाशक, कंडूरोग उदरकृमि रोगों को नष्ट करता है। इसके कुछ काल सेवन से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है। यह रजःप्रवर्तक, बल देनेवाला, जीर्णज्वरहर और प्लीहा- रोग नाशक है। बाह्य प्रयोग में कसीस अत्यन्त संकोचक होती है ॥२३१-२३३॥ विशुद्धं लोहचूर्णन्तु काचपात्रे पिंधापयेत् ।
एकविंशस्तरङ्गः ५६५ सजलं गन्धकद्रावं शनैस्तस्मिन् विनिक्षिपेत् ॥ २३४ ॥ तावन्तं द्रावकं दद्याद्यावता द्रुतिमाप्नुयात् । क्षणेनैवोष्णतां याति फेनञ्चोत्तिष्ठते परम् ॥ २३५ ॥ ततः सारकपत्रेण सारयेद् रसकोविदः । मलं सारकपत्रस्थं हित्वा द्रवमिहाहरेत् ॥ २३६ ॥ द्रवोन्मितां क्षिपेत्तीव्रां निर्जलां विमलां सुराम् । सुरानिक्षेपणाद् याति कासीसं तु तलस्थताम् ॥ २३७ ॥ ततो द्रवमिमं हित्वा चूर्णं घर्मे निधापयेत् । भानुभानुत्रिशुष्कन्तु कासीसं जायतेऽमलम् ॥ २३८ ॥ द्विभागिकन्तु कासीसं सलिले तु त्रिभागिके । निक्षिप्तं द्रवतां यातीत्याहू रसविशारदाः ॥ २३६ ॥ अथ कासीसनिर्माणप्रकारो विशुद्धं लोहचूर्णमित्यादिना । गन्धकद्रावकक्षे- पञ्च लोहचूर्णद्रुतिसाधनापर्य्यन्तम् । भानोः सूर्य्यस्य, भानवः किरणाः, तैः शुष्कम् । निर्जलं विमला सुरा “Absolute Alcohol” इति नाम्ना प्रसिद्धा । स्पष्टमन्यत् ॥ २३४-२३६ ॥ भा.टी.—एक काँच के पात्र में शुद्ध लोहचूर्ण लेकर उसमें थोड़ा-थोड़ा करके सजल गन्धकद्राव तब तक डालें जब तक कि वह सम्पूर्ण लोहचूर्ण अच्छी तरह से घुल न जाय । गन्धक का तेजाब डालने पर लोहचूर्ण एकदम गरम होता है और पात्र में से झाग निकलने लगता है । जब झाग निकलना बन्द हो जाय और लोहचूर्ण घुल जाय तो इसे सारकपत्र (Filter paper) में छान लें । सारकपत्र में जो मैल रह जाय तो उसे अलग करके फेंक दें और द्रव को ले लें । अब द्रव में समभाग स्वच्छ और शुद्ध सुरा (Absolute Alcohol) डाल दें । सुरा डालने से कासीस पात्र के तलप्रदेश में बैठ जायगा । ऊपर के द्रव को किसी पात्र में ले लें और नीचे के कासीस को धूप में रखकर सुखा लें । इस प्रकार सूर्यकिरणों से सूखा हुआ कासीस स्वच्छ हो जाता है । इस प्रकार से बनाया हुआ कासीस दो भाग को तीन भाग जल में डालें तो वह उसमें अच्छी तरह घुल जाता है ॥२३४-२३६॥ कासीसद्रवस्य निर्माणप्रकारः सार्द्धद्वितोलकमिते सलिले तु परिस्रुते । पञ्चगुञ्जोन्मितं शुद्धं कासीसं निक्षिपेद् बुधः ॥ २४० ॥
५६६ रसतरङ्गिणी विद्रुतं जायते शीघ्रं कासीसद्रव उत्तमः । गुदभ्रंशविसर्पादिविविधामयनाशनः ॥ २४१ ॥ भा.टी.—ढाई तोले शुद्ध परिस्रुत जल में पाँच रत्ती उक्त विधि से प्राप्त कासीस चूर्ण डालकर उसको गलायें । जब कासीस उस जल में अच्छी तरह घुल जाय तो कासीसद्रव ( लोशन ) तैयार समझना चाहिये । यह कासीसजल गुदभ्रंश ( काँच का निकलना ), वीसर्प आदि विविध रोगों में बाह्य रूप से प्रयोग किया जाता है ॥ २४०, २४१ ॥ कासीसस्य मात्रानिरूपणम् गुञ्जार्द्धतः समारभ्य रक्तिकाद्वितयोन्मिता । कासीसकस्य कथिता पूर्णमात्रा भिषग्वरैः ॥२४२॥ कासीसमात्रां गुञ्जार्धतो गुञ्जाद्वयपर्यन्ता । मात्राधिक्येन सेवितं दाहभ्रान्ति- वान्तिकारकमिति ॥ २४२ ॥ भा.टी.—आधी रत्ती से लेकर दो रत्ती तक कासीस की मात्रा पूर्ण मात्रा कही जाती है ॥ २४२ ॥ कासीसस्य आमयिकः प्रयोगः प्लीहशत्रुसहासारयुतं कासीसमुत्तमम् । निषेवितं निहन्त्याशु प्लीहानमतिदारुणम् ॥ २४३ ॥ सौभाग्यं कन्यकासारयुत तु परिशीलितम् । कासीसं विनिहन्त्याशु रजोरोधभवां रुजम् ॥ २४४ ॥ खगो दारुसिताकन्यासारोत्थरजसान्वितः । शीलितो हन्ति रक्ताल्पजातां हृद्वेपनव्यथाम् ॥ २४५ ॥ कासीसद्रवसंसिक्तवसनाच्छादितो भृशम् । विसर्पशोथः प्रशमं याति नास्तीह संशयः ॥ २४६ ॥ कासीसं त्रिफलायुक्तं वारिणा परिपेषितम् । विलिप्तं व्रणशोथानां सवर्णकरणं परम् ॥ २४७ ॥ खगः सुराष्ट्रजाहिङ्गुसुरदारुयुतोऽम्भसा । न्यस्तः संवृत्तगुटिको दन्ते कृमिगदापहः ॥ २४८ ॥ एरण्डनिम्बबीजाढ्यं कासीसं सरसाञ्जनम् । निषेवितं हरत्याशु विसर्पमचिरोत्थितम् ॥ २४६ ॥ कासीसं रक्तिकैकन्तु कपित्थफलमज्जया ।
एकविंशस्तरङ्गः ५६७ शीलितं नाशयेत्येष हिक्कामिहसमुत्थिताम् ॥ २५० ॥ सर्जिकाक्षारसंयुक्तं कासीसं परिशीलितम् । मासमात्रप्रयोगेण रक्तसञ्जननं परम् ॥ २५१ ॥ धत्तूरगुञ्जाबीजाढ्यः खगस्तु परिलेपितः । मासद्वयप्रयोगेण श्वित्रं हन्ति चिरोत्थितम् ॥ २५२ ॥ वाकुचीबीजरजसा खगः खलु सगैरिकः । मासद्वयं प्रलेपेन श्वित्रं हन्यात्सुदारुणम् ॥ २५३ ॥ कासीसस्य द्रवो बस्तियोगेन विनियोजितः । विनिहन्ति गुदभ्रंशमर्शांसि च विशेषतः ॥ २५४ ॥ अस्य च रोगयोग्यः प्रयोगः—प्लीहशत्रुः शरपुङ्खा, सहासारः कुमारीक्षारः “मुसम्बर” इति ख्यातः, दारुसिता त्वक्, सुराष्ट्राजा स्फटिकी। दन्तकृमिषु स्फुटि- क्यादिभिः सहकासीसं जलेन सम्मर्द्य क्षुद्राः गुटिका कार्याः । एकां गुटिकां च सन्दंशेन गृहीत्वा छिद्रे स्थापयेत् । शिष्टं सुबोधम् ॥ २४३-२५४ ॥ भा.टी.—कासीसचूर्ण को शरपोंखाक्षार में मिलाकर गरम जल अथवा कुमारीस्वरस (मुसम्बर) के साथ सेवन करने से भयंकर प्लीहावृद्धि में आराम आ जाता है। स्त्रियों के मासिक का कष्ट अर्थात् माहवारी रुकने के कारण कष्ट होने पर कासीस को सुहागा और मुसम्बर चूर्ण में मिलाकर सेवन करने से शीघ्र आराम आता है। रक्त की कमी के कारण होनेवाली हृदय की घबराहट (पल- पिटेशन) में कासीसचूर्ण को दालचीनी और एलुआचूर्ण में मिलाकर प्रयोग करने पर आराम आता है। वीसर्पशोथ को रोकने के लिए या कम करने के लिए कासीसजल में कपड़े को भिगोकर वीसर्प के शोथयुक्त प्रदेश पर रखने से आराम आता है। व्रण अच्छा होने पर उस स्थान पर की त्वचा को एक-सा वर्ण देने के लिए कासीस को त्रिफलाक्वाथ में घोलकर इस जल से दिन में कई बार लेप किया जाता है। दाँत में कीड़ा लगने पर कासीस को फिटकरी, हींग और देवदारुचूर्ण के साथ एकत्र पीसकर गोली-सी बना कर दाँत में रखने से कृमिदन्त रोग में आराम आता है। शुद्ध कासीसचूर्ण को एरण्डबीज, निम्ब- बीज और रसौंतचूर्ण के साथ एकत्र पीसकर चार-चार रत्ती की गोली बना लें। इन गोलियों को प्रतिदिन दिन में तीन बार जल से कुछ दिन सेवन करने से पुराना वीसर्प भी शान्त हो जाता है। हिक्का को बन्द करने के लिए एक रत्ती कासीस को चार रत्ती कैथ के गूदे में मिलाकर सेवन कराया जाता है। शरीर
५६८ रसततरङ्गिणी में रक्तवृद्धि के लिए शुद्ध कासीसचूर्ण में सज्जीक्षारचूर्ण मिलाकर सेवन कराया जाता है । पुराने सफेद कोढ़ के दागों (निसान) पर कासीसचूर्ण में धतूराबीज और गुञ्जाबीज ( रत्ती ) चूर्ण मिला जल से पीस लेप किया जाता है । इस लेप को दो मास तक बराबर लगाते रहने से श्वित्रकुष्ठ के निशान मिट जाते हैं। कासीसचूर्ण को बाकुचीबीजचूर्ण और शुद्ध गेरूचूर्ण के साथ मिलाकर जल से पीसकर दो मास तक लेप करने से चिह्न मिट जाते हैं। गुदभ्रंश ( काँच निक- लना ) तथा बवासीर के मस्सों में कासीसद्रव की गुदबस्ति कुछ दिन देते रहने से बवासीर के मस्से सूख जाते हैं और गुदभ्रंश भी गुद बन्धनियों के दृढ हो जाने से ठीक हो जाता है ॥ २४३-२५४ ॥ कासीसस्य प्रथमो मारणप्रकारः काञ्जिकेन तु विभाव्य सप्तधा शोषयेत्खगमनांशुभिर्बुधः । सम्पुटेच्च लघुना पुटेन तत् स्याद्धि भस्म खलु लोहितप्रभम् ॥२५५॥ समादायाथ तद्भस्म पेषयेन्निम्बुकद्रवैः । चक्रिकाः कारयित्वा च पुटेल्लघुपुटे पुनः ॥२५६॥ यावन्निरम्लं तद्भस्म तावदेवं पुनः पुनः । निम्बूकोत्थै रसैर्वाचः पिष्ट्वा संशोष्य सम्पुटेत् ॥२५७॥ सुश्लक्ष्णं जायते भस्म सर्वदोषविवर्जितम् । तत्साध्येषु विकारेषु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २५८ ॥ कासीसस्य मारणप्रकारः—अम्लराहित्यं प्रायः चत्वारिंशत्पुटैर्निष्पाद्यते । कासीसभस्म लौहवत् पाण्डुकामलाद्यामयनाशनं विशेषतः श्वित्रघ्नञ्च ॥ २५५-२५८॥ भा.टी.—शुद्ध कासीसचूर्ण को खरल में डाल उसमें काञ्जी मिलाकर घोटें और सुखा लें । इस प्रकार काञ्जी की सात भावना देकर सुखा लें । अब इस चूर्ण को सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक दें तो इसकी रक्तवर्ण की भस्म हो जाती है । अब इस भस्म को लेकर खरल में डालें और नींबू के रस से पीस कर टिकिया बना लें और धूप में सुखाकर सम्पुट में फूँक देवें । इस तरह नींबू रस की तब तक भावना देकर पुट देते रहें जब तक कि भस्म को चखने पर उसमें खट्टापन मालूम न हो। इस विधि से कसीस की सर्वदोषरहित कोमल चिकनी भस्म हो जाती है ॥ २५५-२५८ ॥