रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६ एकविंशस्तरङ्गः ५६१ पाचनात् अथवा निम्बूकरसमिश्रिते शोभाञ्जनरसे दोलया कान्तपाषाणस्य पाचनं विधेयम् । उक्तं हि—“शोभाञ्जनरसे साम्लवर्गे दोलागतो दिनम् । पाचितः शुद्धयते कान्तपाषाणः पारदोषकृत् ॥” द्वितीये प्रकारे स्वेदितमिति दोलया ॥२१६, २१७॥ भा.टी.—कान्तपाषाण को चूर्ण करके नींबूरस की भावना देकर फिर इसको दोलायन्त्र में सहजनास्वरस भरकर उसमें चार पहर तक तीव्र अग्नि से पकाने पर शीघ्र ही कान्तपाषाण की उत्तम शुद्धि हो जाती है ॥ २१६, २१७ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः चूर्णितं कान्तपाषाणमगस्त्यद्रवभावितम् । स्वेदितं तु वराक्वाथे शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२१८॥ भा.टी.—कान्तपाषाण के चूर्ण को अगस्त्य के रस में दो-तीन भावना देकर सुखा लें, फिर इसको कपड़े में पोटली बनाकर त्रिफलाक्वाथ में दोलायन्त्र में चार पहर तक स्वेदन करें तो कान्तपाषाण की शुद्धि हो जाती है ॥ २१८ ॥ कान्तपाषाणस्य मारणप्रकारः विशुद्धं कान्तपाषाणं गोमूत्रेण विमर्दयेत् । त्रिफलाक्वथितेनापि विमर्द्य कृतचक्रिकम् ॥२१९॥ सम्पुटस्थं पुटेद्धीमान् सप्तवारं प्रयत्नतः । एवन्तु कान्तपाषाणो म्रियते नात्र संशयः ॥२२०॥ एतस्य मारणं गोमूत्रत्रिफलाक्वाथाभ्यां विमर्द्य साध्यम् ॥ २१६, २२० ॥ भा.टी.—उक्त विधि से शुद्ध किये हुए कान्तपाषाण को गोमूत्र के साथ मर्दन करें । फिर इसको त्रिफलाक्वाथ के साथ मर्दन करके टिकिया बनाकर धूप में सुखा लें, अब इन टिकियाओं को सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके पुट में फूँक दें । स्वांगशीतल होने पर सम्पुट में से कान्तपाषाण को निकाल खरल में पुनः गोमूत्र और त्रिफलाकपाय के साथ मर्दन करके टिकिया बना फिर सम्पुट बन्द करके पुट में फूँक दें । इस विधि को सात बार दुहराने से निःसन्देह कांत- पाषाण की भस्म हो जाती है ॥ २१६, २२० ॥ मृतकान्तपाषाणस्य गुणाः सुमृतः कान्तपाषाणः शिशिरो बृंहणस्तथा । बल्यो वृष्यस्तथा त्वच्यो मूर्च्छामोहनिबर्हणः ॥ २२१ ॥ ज्वरघ्नश्च विषघ्नश्च तथा वार्द्धक्यनाशनः । रक्तसञ्जननः कामं हृद्रेपननिषूदनः ॥ २२२ ॥