भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५६० रसतरङ्गिणी रोगों को नष्ट करती है । इसके सेवन से विषमज्वर दूर हो जाता है । वात- प्रकोप, रजःशूल, रक्तगुल्म तथा भयंकर श्वेतप्रदर, मधुमेह और हिक्कारोग को नष्ट करती है ॥ २१२, २१३ ॥ वक्तव्य—खर्परभस्म राजयक्ष्मा तथा जीर्णज्वर के लिए तथा अधिक स्वेद और रात्रिस्वेद के लिए उत्तम मानी जाती है, परन्तु खर्परसत्वभस्म इससे भी अधिक गुणकारी होती है । मृतखर्परसत्त्वस्य मात्रादिनिरूपणम् मृतखर्परसत्त्वस्य मात्रा यशदवन्मता । आमयेषु च सर्वत्र प्रयोगश्चापि तादृशः ॥२१४॥ भा.टी.—खर्परसत्वभस्म की मात्रा यशदभस्म के समान ही समझनी चाहिए । इसी तरह रोगों में भी सब जगह यशद की भाँति इसका प्रयोग करना चाहिए ॥ २१४ ॥ अथ कान्तपाषाणस्य नामानि कान्तपाषाणकः ख्यातः चुम्बको लोहकर्षकः । कान्तोपलः कान्तदृषत् स एव परिकीर्तितः ॥२१५। लौहस्योपधातुत्वात् क्रमप्राप्तकान्तपाषाणस्योपक्रमः कान्तपाषाणकः ख्यात इति ॥ २१५ ॥ भा.टी.—कान्तपाषाण, चुम्बक, लोहकर्षक, कान्तोपल, कान्तदृषत्, ये सब नाम चुम्बक पत्थर के कहे जाते हैं ॥ २१५ ॥ वक्तव्य—चुम्बक पत्थर को मैगनिटिक औक्साइड आफ आइरन— ( Magnitic oxide of Iron ) या Feroso Ferric oxide कहते हैं । इसमें एक विद्युत् शक्ति होती है जिसको Magnetism कहते हैं जिससे यह दूसरे लोह को अपनी तरफ खींचता है । यह भी खनिज द्रव्य है । इसको आयुर्वेद में चुम्बक लोह माना गया है जैसा कि लोहभेदों में पहले बताया जा चुका है । इसी पत्थर से प्राप्त किए हुए लोह को कान्तलोह कहा जाता है । कान्तपाषाणस्य शोधनम् चूर्णितं कान्तपाषाणं निम्बूकद्रवसंयुतम् । शोभाञ्जनरसेनैव दोलायन्त्रगतं पचेत् ॥२१६॥ चतुर्यामं पचेद्धीमान् सततं प्रखराग्निना । एवं नातिचिरादेव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२१७॥ कान्तपाषाणशोधनं निम्बूकरसेन भावयित्वा शोभाञ्जनरसे दोलया परि-