भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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एकविंशस्तरङ्गः ५५६ वक्तव्य—खर्परसत्त्व यशद ही होती है, क्योंकि खर्पर यशद धातु का ही Oxide है । खर्परस्य द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः लाक्षाभयाहरिद्रोमागुडगलकटङ्कणैः । यशदप्रभवः पिष्ट एतैस्तु समभागिकैः ॥२०७॥ मूकमूषागतो ध्मातः सततं प्रखराग्निना । यशदप्रभमत्यच्छं सत्त्वमाशु प्रमुञ्चति ॥२०८॥ भा.टी.—खर्पर, लाक्षा, हरीतकी, हरिद्रा, अलसी, गुड़, राल तथा सुहागा; इन सब को समभाग में लेकर अच्छी तरह एकत्र पीसकर अंधमूषा में रखकर तीव्र अग्नि से तपायें तो स्वच्छ यशद के सदृश सत्त्व निकल आता है ॥२०७-२०८॥ खर्परसत्त्वस्य मारणम् [ गीतिका ] सत्त्वं पलप्रमाणं खलु खर्परीयकोत्थम् । विनिधापयेत्कटाहे परिदीप्तचुल्लिकास्थे ॥२०६॥ विद्रुतं विलोक्य सत्त्वं परिघट्टयंस्तु दर्व्या । अधिनिक्षिपेद्विशुद्धं भृशमल्पमल्पमालम् ।२१०॥ विधिना ह्यनेन सत्त्वं मृतिमेति निर्विशेषाद् । सुमृतं तु सत्त्वमेवं विनियोजयेद्विशङ्कः ॥२११॥ सत्त्वमारणम्—अल्पमल्पं आलं हरितालं विनिक्षिपेदिति ॥२०६-२११॥ भा.टी.—खर्परसत्त्व एक पल प्रमाण में लेकर एक लोहे की कड़ाही में डालकर चूल्हे में अग्नि पर तपायें । जब सत्त्व पिघल जाय तो उसको करछी से चलाते हुए उसमें थोड़ा-थोड़ा करके शुद्ध हरतालचूर्ण डालते जायँ और करछी से चलाते जायँ । इस विधि से खर्परसत्त्व की उत्तम भस्म बन जाती है । इसको निःशंक होकर योगों में प्रयोग कर सकते हैं ॥ २०६-२११ ॥ मृतखर्परसत्त्वस्य गुणाः सत्त्वं खर्परसम्भूतं पाण्डुश्वयथुगुल्मनुत् । कासश्वासक्षयहरं विषमज्वरनाशनम् ॥२१२॥ रजःशूलं रक्तगुल्मं श्वेतप्रदरमुल्बणम् । मधुमेहं तथा हिक्कां विशेषेण विनाशयेत् ॥२१३॥ भा.टी.—खर्परसत्त्व की भस्म पाण्डुरोग, शोथ, गुल्म, कास, श्वास, क्षय