भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५५८. रसतरङ्गिणी धातुज्वरं वह्निमान्द्यं तथा जीर्णज्वरादिकम् । विनाशयत्याशु यथा तिमिरं तु प्रभाकरः ॥२०३॥ भा.टी.—खर्परभस्म को गोखरुक्वाथ के साथ सेवन करने से शीघ्र ही मूत्र- कृच्छ्र रोग में आराम आता है । पुराने कास श्वास अथवा क्षयकास में खर्पर- भस्म वंशलोचन के चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करने से शीघ्र लाभ होने लगता है । पाण्डु, श्वयथु तथा प्रदर आदि रोगों में खर्परभस्म में समभाग कांत- लोहभस्म मिलाकर उचित अनुपान के साथ सेवन कराया जाता है। खर्परभस्म में रससिन्दूर मिलाकर कुछ दिन तक निरन्तर सेवन करने से जीर्णज्वर नष्ट होता है। खर्परभस्म में प्रवालभस्म, कालीमिर्चचूर्ण, रससिन्दूर तथा जीराचूर्ण मिला कर नींबू के स्वरस के साथ कुछ दिन सेवन कराने से धातुगतज्वर, अग्निमान्द्य तथा जीर्णज्वर आदि रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं ॥ १६८–२०३ ॥ खर्परस्य प्रथमः सत्त्वपातनप्रकारः लाक्षाभयाहरिद्रोमागुंडरालकटङ्कणैः । चूर्णीकृतं खर्परन्तु गव्यदुग्धाज्यतः पचेत् ॥२०४॥ विधाय गोलकं घर्मे शोषयेद्रसकोविदः । वृन्ताकमूषानिहितं ध्मापयेत् प्रखराग्निना ॥२०५॥ विद्रुतं परितो ज्ञात्वा ढालयेत् क्षितिगतिके । यशदप्रभमत्यच्छं सत्त्वं पतति शोभनम् ॥२०६॥ सत्त्वपातनप्रकारः—उमा अतसी, सुगममन्यत् । यशदप्रभं सत्त्वमिति खर्प- रस्य सत्वं यशदमेव भवति ॥ २०४–२०६ ॥ भा.टी.—खर्परचूर्ण में लाख, हरीतकी, हरिद्रा, अलसी, गुड़, राल तथा सुहागा चूर्ण मिला कर घोटें। जब खूब बारीक हो जाय तो इसको गोदुग्ध तथा गोधृत में मिलाकर अग्नि में पका लें। जब यह गोला-सा हो जाय तो इसे तीव्र धूप में सुखा लें और इस गोलक को वृन्ताक (पूर्वोक्त) मूषा में रखकर तीव्र अग्नि से तपायें। जब खर्पर पिघलने को होता है तो अग्नि की ज्वाला नीले वर्ण की होने लगती है और जब पिघल जाता है तो अग्नि की ज्वाला सफेद वर्ण की हो जाती है। इस अग्नि परीक्षा से जब खर्पर का पिघलना निश्चित हो जाय तो इस (खर्पर मूषा) को जमीन में बनाये हुए एक छोटे से गढ़े में उलट दें। इस विधि से यशद के सदृश वर्ण भारयुक्त स्वच्छ खर्परसत्व निकल आता है ॥ २०४–२०६ ॥