रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
५५८. रसतरङ्गिणी धातुज्वरं वह्निमान्द्यं तथा जीर्णज्वरादिकम् । विनाशयत्याशु यथा तिमिरं तु प्रभाकरः ॥२०३॥ भा.टी.—खर्परभस्म को गोखरुक्वाथ के साथ सेवन करने से शीघ्र ही मूत्र- कृच्छ्र रोग में आराम आता है । पुराने कास श्वास अथवा क्षयकास में खर्पर- भस्म वंशलोचन के चूर्ण के साथ मिलाकर सेवन करने से शीघ्र लाभ होने लगता है । पाण्डु, श्वयथु तथा प्रदर आदि रोगों में खर्परभस्म में समभाग कांत- लोहभस्म मिलाकर उचित अनुपान के साथ सेवन कराया जाता है। खर्परभस्म में रससिन्दूर मिलाकर कुछ दिन तक निरन्तर सेवन करने से जीर्णज्वर नष्ट होता है। खर्परभस्म में प्रवालभस्म, कालीमिर्चचूर्ण, रससिन्दूर तथा जीराचूर्ण मिला कर नींबू के स्वरस के साथ कुछ दिन सेवन कराने से धातुगतज्वर, अग्निमान्द्य तथा जीर्णज्वर आदि रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं ॥ १६८–२०३ ॥ खर्परस्य प्रथमः सत्त्वपातनप्रकारः लाक्षाभयाहरिद्रोमागुंडरालकटङ्कणैः । चूर्णीकृतं खर्परन्तु गव्यदुग्धाज्यतः पचेत् ॥२०४॥ विधाय गोलकं घर्मे शोषयेद्रसकोविदः । वृन्ताकमूषानिहितं ध्मापयेत् प्रखराग्निना ॥२०५॥ विद्रुतं परितो ज्ञात्वा ढालयेत् क्षितिगतिके । यशदप्रभमत्यच्छं सत्त्वं पतति शोभनम् ॥२०६॥ सत्त्वपातनप्रकारः—उमा अतसी, सुगममन्यत् । यशदप्रभं सत्त्वमिति खर्प- रस्य सत्वं यशदमेव भवति ॥ २०४–२०६ ॥ भा.टी.—खर्परचूर्ण में लाख, हरीतकी, हरिद्रा, अलसी, गुड़, राल तथा सुहागा चूर्ण मिला कर घोटें। जब खूब बारीक हो जाय तो इसको गोदुग्ध तथा गोधृत में मिलाकर अग्नि में पका लें। जब यह गोला-सा हो जाय तो इसे तीव्र धूप में सुखा लें और इस गोलक को वृन्ताक (पूर्वोक्त) मूषा में रखकर तीव्र अग्नि से तपायें। जब खर्पर पिघलने को होता है तो अग्नि की ज्वाला नीले वर्ण की होने लगती है और जब पिघल जाता है तो अग्नि की ज्वाला सफेद वर्ण की हो जाती है। इस अग्नि परीक्षा से जब खर्पर का पिघलना निश्चित हो जाय तो इस (खर्पर मूषा) को जमीन में बनाये हुए एक छोटे से गढ़े में उलट दें। इस विधि से यशद के सदृश वर्ण भारयुक्त स्वच्छ खर्परसत्व निकल आता है ॥ २०४–२०६ ॥
एकविंशस्तरङ्गः ५५६ वक्तव्य—खर्परसत्त्व यशद ही होती है, क्योंकि खर्पर यशद धातु का ही Oxide है । खर्परस्य द्वितीयः सत्त्वपातनप्रकारः लाक्षाभयाहरिद्रोमागुडगलकटङ्कणैः । यशदप्रभवः पिष्ट एतैस्तु समभागिकैः ॥२०७॥ मूकमूषागतो ध्मातः सततं प्रखराग्निना । यशदप्रभमत्यच्छं सत्त्वमाशु प्रमुञ्चति ॥२०८॥ भा.टी.—खर्पर, लाक्षा, हरीतकी, हरिद्रा, अलसी, गुड़, राल तथा सुहागा; इन सब को समभाग में लेकर अच्छी तरह एकत्र पीसकर अंधमूषा में रखकर तीव्र अग्नि से तपायें तो स्वच्छ यशद के सदृश सत्त्व निकल आता है ॥२०७-२०८॥ खर्परसत्त्वस्य मारणम् [ गीतिका ] सत्त्वं पलप्रमाणं खलु खर्परीयकोत्थम् । विनिधापयेत्कटाहे परिदीप्तचुल्लिकास्थे ॥२०६॥ विद्रुतं विलोक्य सत्त्वं परिघट्टयंस्तु दर्व्या । अधिनिक्षिपेद्विशुद्धं भृशमल्पमल्पमालम् ।२१०॥ विधिना ह्यनेन सत्त्वं मृतिमेति निर्विशेषाद् । सुमृतं तु सत्त्वमेवं विनियोजयेद्विशङ्कः ॥२११॥ सत्त्वमारणम्—अल्पमल्पं आलं हरितालं विनिक्षिपेदिति ॥२०६-२११॥ भा.टी.—खर्परसत्त्व एक पल प्रमाण में लेकर एक लोहे की कड़ाही में डालकर चूल्हे में अग्नि पर तपायें । जब सत्त्व पिघल जाय तो उसको करछी से चलाते हुए उसमें थोड़ा-थोड़ा करके शुद्ध हरतालचूर्ण डालते जायँ और करछी से चलाते जायँ । इस विधि से खर्परसत्त्व की उत्तम भस्म बन जाती है । इसको निःशंक होकर योगों में प्रयोग कर सकते हैं ॥ २०६-२११ ॥ मृतखर्परसत्त्वस्य गुणाः सत्त्वं खर्परसम्भूतं पाण्डुश्वयथुगुल्मनुत् । कासश्वासक्षयहरं विषमज्वरनाशनम् ॥२१२॥ रजःशूलं रक्तगुल्मं श्वेतप्रदरमुल्बणम् । मधुमेहं तथा हिक्कां विशेषेण विनाशयेत् ॥२१३॥ भा.टी.—खर्परसत्त्व की भस्म पाण्डुरोग, शोथ, गुल्म, कास, श्वास, क्षय
५६० रसतरङ्गिणी रोगों को नष्ट करती है । इसके सेवन से विषमज्वर दूर हो जाता है । वात- प्रकोप, रजःशूल, रक्तगुल्म तथा भयंकर श्वेतप्रदर, मधुमेह और हिक्कारोग को नष्ट करती है ॥ २१२, २१३ ॥ वक्तव्य—खर्परभस्म राजयक्ष्मा तथा जीर्णज्वर के लिए तथा अधिक स्वेद और रात्रिस्वेद के लिए उत्तम मानी जाती है, परन्तु खर्परसत्वभस्म इससे भी अधिक गुणकारी होती है । मृतखर्परसत्त्वस्य मात्रादिनिरूपणम् मृतखर्परसत्त्वस्य मात्रा यशदवन्मता । आमयेषु च सर्वत्र प्रयोगश्चापि तादृशः ॥२१४॥ भा.टी.—खर्परसत्वभस्म की मात्रा यशदभस्म के समान ही समझनी चाहिए । इसी तरह रोगों में भी सब जगह यशद की भाँति इसका प्रयोग करना चाहिए ॥ २१४ ॥ अथ कान्तपाषाणस्य नामानि कान्तपाषाणकः ख्यातः चुम्बको लोहकर्षकः । कान्तोपलः कान्तदृषत् स एव परिकीर्तितः ॥२१५। लौहस्योपधातुत्वात् क्रमप्राप्तकान्तपाषाणस्योपक्रमः कान्तपाषाणकः ख्यात इति ॥ २१५ ॥ भा.टी.—कान्तपाषाण, चुम्बक, लोहकर्षक, कान्तोपल, कान्तदृषत्, ये सब नाम चुम्बक पत्थर के कहे जाते हैं ॥ २१५ ॥ वक्तव्य—चुम्बक पत्थर को मैगनिटिक औक्साइड आफ आइरन— ( Magnitic oxide of Iron ) या Feroso Ferric oxide कहते हैं । इसमें एक विद्युत् शक्ति होती है जिसको Magnetism कहते हैं जिससे यह दूसरे लोह को अपनी तरफ खींचता है । यह भी खनिज द्रव्य है । इसको आयुर्वेद में चुम्बक लोह माना गया है जैसा कि लोहभेदों में पहले बताया जा चुका है । इसी पत्थर से प्राप्त किए हुए लोह को कान्तलोह कहा जाता है । कान्तपाषाणस्य शोधनम् चूर्णितं कान्तपाषाणं निम्बूकद्रवसंयुतम् । शोभाञ्जनरसेनैव दोलायन्त्रगतं पचेत् ॥२१६॥ चतुर्यामं पचेद्धीमान् सततं प्रखराग्निना । एवं नातिचिरादेव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२१७॥ कान्तपाषाणशोधनं निम्बूकरसेन भावयित्वा शोभाञ्जनरसे दोलया परि-
३६ एकविंशस्तरङ्गः ५६१ पाचनात् अथवा निम्बूकरसमिश्रिते शोभाञ्जनरसे दोलया कान्तपाषाणस्य पाचनं विधेयम् । उक्तं हि—“शोभाञ्जनरसे साम्लवर्गे दोलागतो दिनम् । पाचितः शुद्धयते कान्तपाषाणः पारदोषकृत् ॥” द्वितीये प्रकारे स्वेदितमिति दोलया ॥२१६, २१७॥ भा.टी.—कान्तपाषाण को चूर्ण करके नींबूरस की भावना देकर फिर इसको दोलायन्त्र में सहजनास्वरस भरकर उसमें चार पहर तक तीव्र अग्नि से पकाने पर शीघ्र ही कान्तपाषाण की उत्तम शुद्धि हो जाती है ॥ २१६, २१७ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः चूर्णितं कान्तपाषाणमगस्त्यद्रवभावितम् । स्वेदितं तु वराक्वाथे शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२१८॥ भा.टी.—कान्तपाषाण के चूर्ण को अगस्त्य के रस में दो-तीन भावना देकर सुखा लें, फिर इसको कपड़े में पोटली बनाकर त्रिफलाक्वाथ में दोलायन्त्र में चार पहर तक स्वेदन करें तो कान्तपाषाण की शुद्धि हो जाती है ॥ २१८ ॥ कान्तपाषाणस्य मारणप्रकारः विशुद्धं कान्तपाषाणं गोमूत्रेण विमर्दयेत् । त्रिफलाक्वथितेनापि विमर्द्य कृतचक्रिकम् ॥२१९॥ सम्पुटस्थं पुटेद्धीमान् सप्तवारं प्रयत्नतः । एवन्तु कान्तपाषाणो म्रियते नात्र संशयः ॥२२०॥ एतस्य मारणं गोमूत्रत्रिफलाक्वाथाभ्यां विमर्द्य साध्यम् ॥ २१६, २२० ॥ भा.टी.—उक्त विधि से शुद्ध किये हुए कान्तपाषाण को गोमूत्र के साथ मर्दन करें । फिर इसको त्रिफलाक्वाथ के साथ मर्दन करके टिकिया बनाकर धूप में सुखा लें, अब इन टिकियाओं को सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके पुट में फूँक दें । स्वांगशीतल होने पर सम्पुट में से कान्तपाषाण को निकाल खरल में पुनः गोमूत्र और त्रिफलाकपाय के साथ मर्दन करके टिकिया बना फिर सम्पुट बन्द करके पुट में फूँक दें । इस विधि को सात बार दुहराने से निःसन्देह कांत- पाषाण की भस्म हो जाती है ॥ २१६, २२० ॥ मृतकान्तपाषाणस्य गुणाः सुमृतः कान्तपाषाणः शिशिरो बृंहणस्तथा । बल्यो वृष्यस्तथा त्वच्यो मूर्च्छामोहनिबर्हणः ॥ २२१ ॥ ज्वरघ्नश्च विषघ्नश्च तथा वार्द्धक्यनाशनः । रक्तसञ्जननः कामं हृद्रेपननिषूदनः ॥ २२२ ॥
५६२ रसतरङ्गिणी रजोदोषं शुक्रदोषं रक्तपित्तं सुदारुणम् । क्लैब्यं कण्डूं कामलाञ्च क्षयं पित्तं त्वगाश्रितम् ॥२२३॥ कासं श्वासं महाघोरं प्रमेहं चाचिरोत्थितम् । विनाशयेद्विशेषेण न सन्देहोऽत्र कश्चन ॥२२४॥ मृतकान्तपाषाणगुणाः—कान्तपाषाणः शिशिरस्तथा मूर्च्छादिरोगनाशनश्च । न सन्देहोऽत्र कश्चन इति अनुभवप्रत्ययः ॥ २२१-२२४ ॥ भा.टी.—कान्तपाषाण की भस्म शीतगुण और शीतवीर्य होती है । इसके सेवन से शरीर मोटा ( बृंहण ) होता है और उसमें बलवृद्धि तथा उत्पादक अंगों में उत्तेजना ( वृष्य ) उत्पन्न होती है । यह त्वच्य तथा मूर्च्छा और मोह को दूर करती है । यह ज्वरनाशक, विषनाशक तथा वार्द्धक्यनाशक होती है । इसके सेवन से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है और हृदय की घबड़ाहट ( पल- पिटेशन) दूर होती है । यह मासिकधर्म की खराबी, शुक्रदोष, भयंकर रक्तपित्त, नपुंसकता, कण्डू, कामला और क्षय रोगों को नष्ट करती है । इसके सेवन से त्वगाश्रित पित्त ( रक्त में पित्त का प्रकोप मिश्रण ), कास, श्वास तथा पुरातन प्रमेह रोग विशेष रूप से निःसन्देह दूर होते हैं ॥ २२१-२२४ ॥ अस्य मात्रा कान्तपाषाणकस्येह रक्तिकाद्वितयोन्मिता । पूर्णमात्रा मता विज्ञैर्गदापनयनक्षमा ॥२२५॥ कान्तपाषाणभस्म की पूर्णमात्रा दो रत्ती तक प्रयोग की जा सकती है॥२२५॥ कान्तपाषाणस्य प्रयोगः कान्तपाषाणकः कामं लोहवद् गुणकारकः । आमयेषु च सर्वेषु प्रयोगश्चापि तादृशः ॥ २२६ ॥ भा.टी.—कान्तपाषाण की भस्म प्रायः लोह अथवा कान्तलोह के समान गुणकारक होती है । अतः सब रोगों में लोहभस्म के समान ही प्रयोग करना चाहिए ॥ २२६ ॥ अथ काशीसस्य नामानि काशीशकञ्च कासीसं पुष्पकासीसकन्तथा । पांशुकं पांशुकासीसं खगाख्यञ्च प्रकीर्तितम् ॥ २२७ ॥ भा.टी.—काशीशक, कासीस, पुष्पकासीसक, पांशुक, पांशुकासीस और खग ( पछी ) के नाम कसीस के कहे जाते हैं ॥ २२७ ॥
वक्तव्य—कसीस भी लोह का समास है और यह प्रायः कृत्रिम विधि से ही निर्मित प्राप्त होता है। इसका निर्माण-प्रकार आगे दिया गया है। आज- कल कसीस हरे-हरे क्रिस्टल के रूप में प्राप्त होता है। इसे अंग्रेजी में फेरीसल्फ (Ferrisulph) अथवा फेरस सल्फेट (Ferrous Sulphate) कहते हैं। इसको अग्नि पर गरम करने से इसमें से जल निकलता है। इस जल को वाटर आफ क्रिस्टलाइजेशन (Water of Crystallisation) कहते हैं। इसी के कारण यह कण रूप में प्राप्त होता है। जब तपाने पर इसमें से जल निकल जाता है तो यह कसीस सफेद रंग का हो जाता है। अतः कणरूप में होने का कारण इसमें जल ही है। यदि इसको अधिक गरम किया जाय तो इसमें से प्रथम जल निकलता है, फिर सफेद रंग का धुँआ निकलता है, जिसे यदि द्रवीभूत करके परीक्षा करें तो ज्ञात होता है कि यह तेल सा गाढ़ा पदार्थ है। इसकी कुछ बूँदों को जल में डालकर चखने से खट्टा स्वाद मालूम होता है और कसीस के द्रवीभूत धुएँ को लकड़ी या कपड़े पर डालें तो वे झुलस जायेंगे। परीक्षा करने पर यह गन्धकाम्ल सिद्ध हुआ है। पहिले इसी को गंधक- तैल कहते थे। क्रिस्टल के स्वरूप में प्राप्त होनेवाले कसीस को पुष्पकासीस समझना चाहिये और जो ओक्साई के रूप में हो जाता है उसे बालुकासीस समझा जाता है। कहीं कहीं कसीस के हीरा कसीस, पुष्पकासीस और लोह- कासीस, इस तरह तीन भेद लिखे हैं, परन्तु दो भेद ही अधिक प्रचलित हैं। कासीसस्य द्वौ भेदौ चूर्णकासीसकञ्चैव पुष्पकासीसकन्तथा। कासीसं द्विविधं ख्यातं रसत्तन्त्रप्रयोक्तृभिः ॥२२८॥ भा.टी.—चूर्णकासीस और पुष्पकासीस भेद से कसीस दो प्रकार की मानी गयी है ॥ २२८ ॥ अनयोः स्वरूपम् चूर्णकासीसकं श्वेतमीषत्पीतञ्च कीर्तितम्। पुष्पकासीसकं स्वच्छहरिद्वर्णं प्रकीर्तितम् ॥२२६॥ भा.टी.—इन द्विविध कासीसों में से चूर्णकासीस सफेद और कुछ पीले रंग की होती है। परन्तु पुष्पकासीस (हीरा कसीस) स्वच्छ हरित् वर्ण की होती है ॥ २२६ ॥ वक्तव्य—कसीस की पोटली बाँधकर भांगरे के स्वरस में स्वेदन करने से वह उसमें घुलकर नीचे आ जाती है। अतः इसको थोड़ी देर अर्थात् करीब
५६४ रसतरङ्गिणी
सवा घंटे तक ही स्वेदन करना चाहिये और इसका चूर्ण बनाकर पोटली में नहीं बाँधना चाहिये, किन्तु मोटे-मोटे खण्डों को ही पोटली में बाँधना चाहिये। कासीसस्य शोधनम् कासीसं भृङ्गराजोत्थवारिणि घटिकात्रयम् । सकृत् स्विन्नं प्रयत्नेन् शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२३०॥ भा.टी.—कसीस को एक बार भांगरे के रस में दोलायन्त्र द्वारा तीन घड़ी तक स्वेदन करने से वह उत्तमरूप से शुद्ध हो जाती है ॥२३०॥ कासीसस्य गुणाः कासीसं तुवरं ग्राहि विपाकोष्णन्तु शीतलम् । श्वित्रघ्नं नेत्र्यमतुलं विषघ्नं कचरञ्जनम् ॥२३१॥ वातश्लेष्मामयहरं मूत्रकृच्छ्रप्रणाशनम् । कण्डूपाण्डुकृमिघ्नञ्च रक्तसञ्जननं परम् ॥२३२॥ रजःप्रवर्तकं बल्यं ज्वरघ्नं प्लीहनाशनम् । बाह्यप्रयोगे विज्ञेयं सङ्कोचनकरं परम् ॥२३३॥ लोहमलत्वात् कान्तपाषाणसजातीयं कासीसं क्रमप्राप्तवर्णनम् । कासीसं द्विविधं चूर्णकासीसं पुष्पकासीसञ्चेति । कासीसं विपाके उष्णं स्पर्शतः, प्रथमा- वस्थायांतु शीतलम्, कचानां केशानां रञ्जनं कृष्णताकरम् । तथा बाह्यप्रयोगे लेपादिना सङ्कोचनकरम् । उक्तञ्च “कासीसद्वयमप्युष्णं तिक्तञ्च तुवरं तथा । वातश्लेष्महरं केश्यं नेत्र्यं कंडूविषप्रणुत् ॥ मूत्रकृच्छ्राश्मरीश्वित्रनाशनं परिकीर्ति- तम् । सकृद् भृङ्गाम्बुना स्विन्नं कासीसं निर्मलं भवेत्” इति ॥२३१–२३३॥ भा.टी.—कसीस कषैली (रस में), ग्राही गुण में, विपाक में कटु, उष्ण गुण और बाह्यस्पर्श में शीतल गुणयुक्त होती है। इसको सफेद कोढ़ पर बाहर से लगाया जाता है, नेत्रों के लिये लाभदायक होता। इसके लेप से अथवा अन्तः प्रयोग से वमन द्वारा शरीरगत विष नष्ट हो जाते हैं। कसीस के द्वारा बालों को काला करनेवाले खिजाब बनाये जाते हैं। यह वातश्लेष्महर, मूत्रकृच्छ्रनाशक, कंडूरोग उदरकृमि रोगों को नष्ट करता है। इसके कुछ काल सेवन से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है। यह रजःप्रवर्तक, बल देनेवाला, जीर्णज्वरहर और प्लीहा- रोग नाशक है। बाह्य प्रयोग में कसीस अत्यन्त संकोचक होती है ॥२३१-२३३॥ विशुद्धं लोहचूर्णन्तु काचपात्रे पिंधापयेत् ।
एकविंशस्तरङ्गः ५६५ सजलं गन्धकद्रावं शनैस्तस्मिन् विनिक्षिपेत् ॥ २३४ ॥ तावन्तं द्रावकं दद्याद्यावता द्रुतिमाप्नुयात् । क्षणेनैवोष्णतां याति फेनञ्चोत्तिष्ठते परम् ॥ २३५ ॥ ततः सारकपत्रेण सारयेद् रसकोविदः । मलं सारकपत्रस्थं हित्वा द्रवमिहाहरेत् ॥ २३६ ॥ द्रवोन्मितां क्षिपेत्तीव्रां निर्जलां विमलां सुराम् । सुरानिक्षेपणाद् याति कासीसं तु तलस्थताम् ॥ २३७ ॥ ततो द्रवमिमं हित्वा चूर्णं घर्मे निधापयेत् । भानुभानुत्रिशुष्कन्तु कासीसं जायतेऽमलम् ॥ २३८ ॥ द्विभागिकन्तु कासीसं सलिले तु त्रिभागिके । निक्षिप्तं द्रवतां यातीत्याहू रसविशारदाः ॥ २३६ ॥ अथ कासीसनिर्माणप्रकारो विशुद्धं लोहचूर्णमित्यादिना । गन्धकद्रावकक्षे- पञ्च लोहचूर्णद्रुतिसाधनापर्य्यन्तम् । भानोः सूर्य्यस्य, भानवः किरणाः, तैः शुष्कम् । निर्जलं विमला सुरा “Absolute Alcohol” इति नाम्ना प्रसिद्धा । स्पष्टमन्यत् ॥ २३४-२३६ ॥ भा.टी.—एक काँच के पात्र में शुद्ध लोहचूर्ण लेकर उसमें थोड़ा-थोड़ा करके सजल गन्धकद्राव तब तक डालें जब तक कि वह सम्पूर्ण लोहचूर्ण अच्छी तरह से घुल न जाय । गन्धक का तेजाब डालने पर लोहचूर्ण एकदम गरम होता है और पात्र में से झाग निकलने लगता है । जब झाग निकलना बन्द हो जाय और लोहचूर्ण घुल जाय तो इसे सारकपत्र (Filter paper) में छान लें । सारकपत्र में जो मैल रह जाय तो उसे अलग करके फेंक दें और द्रव को ले लें । अब द्रव में समभाग स्वच्छ और शुद्ध सुरा (Absolute Alcohol) डाल दें । सुरा डालने से कासीस पात्र के तलप्रदेश में बैठ जायगा । ऊपर के द्रव को किसी पात्र में ले लें और नीचे के कासीस को धूप में रखकर सुखा लें । इस प्रकार सूर्यकिरणों से सूखा हुआ कासीस स्वच्छ हो जाता है । इस प्रकार से बनाया हुआ कासीस दो भाग को तीन भाग जल में डालें तो वह उसमें अच्छी तरह घुल जाता है ॥२३४-२३६॥ कासीसद्रवस्य निर्माणप्रकारः सार्द्धद्वितोलकमिते सलिले तु परिस्रुते । पञ्चगुञ्जोन्मितं शुद्धं कासीसं निक्षिपेद् बुधः ॥ २४० ॥
५६६ रसतरङ्गिणी विद्रुतं जायते शीघ्रं कासीसद्रव उत्तमः । गुदभ्रंशविसर्पादिविविधामयनाशनः ॥ २४१ ॥ भा.टी.—ढाई तोले शुद्ध परिस्रुत जल में पाँच रत्ती उक्त विधि से प्राप्त कासीस चूर्ण डालकर उसको गलायें । जब कासीस उस जल में अच्छी तरह घुल जाय तो कासीसद्रव ( लोशन ) तैयार समझना चाहिये । यह कासीसजल गुदभ्रंश ( काँच का निकलना ), वीसर्प आदि विविध रोगों में बाह्य रूप से प्रयोग किया जाता है ॥ २४०, २४१ ॥ कासीसस्य मात्रानिरूपणम् गुञ्जार्द्धतः समारभ्य रक्तिकाद्वितयोन्मिता । कासीसकस्य कथिता पूर्णमात्रा भिषग्वरैः ॥२४२॥ कासीसमात्रां गुञ्जार्धतो गुञ्जाद्वयपर्यन्ता । मात्राधिक्येन सेवितं दाहभ्रान्ति- वान्तिकारकमिति ॥ २४२ ॥ भा.टी.—आधी रत्ती से लेकर दो रत्ती तक कासीस की मात्रा पूर्ण मात्रा कही जाती है ॥ २४२ ॥ कासीसस्य आमयिकः प्रयोगः प्लीहशत्रुसहासारयुतं कासीसमुत्तमम् । निषेवितं निहन्त्याशु प्लीहानमतिदारुणम् ॥ २४३ ॥ सौभाग्यं कन्यकासारयुत तु परिशीलितम् । कासीसं विनिहन्त्याशु रजोरोधभवां रुजम् ॥ २४४ ॥ खगो दारुसिताकन्यासारोत्थरजसान्वितः । शीलितो हन्ति रक्ताल्पजातां हृद्वेपनव्यथाम् ॥ २४५ ॥ कासीसद्रवसंसिक्तवसनाच्छादितो भृशम् । विसर्पशोथः प्रशमं याति नास्तीह संशयः ॥ २४६ ॥ कासीसं त्रिफलायुक्तं वारिणा परिपेषितम् । विलिप्तं व्रणशोथानां सवर्णकरणं परम् ॥ २४७ ॥ खगः सुराष्ट्रजाहिङ्गुसुरदारुयुतोऽम्भसा । न्यस्तः संवृत्तगुटिको दन्ते कृमिगदापहः ॥ २४८ ॥ एरण्डनिम्बबीजाढ्यं कासीसं सरसाञ्जनम् । निषेवितं हरत्याशु विसर्पमचिरोत्थितम् ॥ २४६ ॥ कासीसं रक्तिकैकन्तु कपित्थफलमज्जया ।
एकविंशस्तरङ्गः ५६७ शीलितं नाशयेत्येष हिक्कामिहसमुत्थिताम् ॥ २५० ॥ सर्जिकाक्षारसंयुक्तं कासीसं परिशीलितम् । मासमात्रप्रयोगेण रक्तसञ्जननं परम् ॥ २५१ ॥ धत्तूरगुञ्जाबीजाढ्यः खगस्तु परिलेपितः । मासद्वयप्रयोगेण श्वित्रं हन्ति चिरोत्थितम् ॥ २५२ ॥ वाकुचीबीजरजसा खगः खलु सगैरिकः । मासद्वयं प्रलेपेन श्वित्रं हन्यात्सुदारुणम् ॥ २५३ ॥ कासीसस्य द्रवो बस्तियोगेन विनियोजितः । विनिहन्ति गुदभ्रंशमर्शांसि च विशेषतः ॥ २५४ ॥ अस्य च रोगयोग्यः प्रयोगः—प्लीहशत्रुः शरपुङ्खा, सहासारः कुमारीक्षारः “मुसम्बर” इति ख्यातः, दारुसिता त्वक्, सुराष्ट्राजा स्फटिकी। दन्तकृमिषु स्फुटि- क्यादिभिः सहकासीसं जलेन सम्मर्द्य क्षुद्राः गुटिका कार्याः । एकां गुटिकां च सन्दंशेन गृहीत्वा छिद्रे स्थापयेत् । शिष्टं सुबोधम् ॥ २४३-२५४ ॥ भा.टी.—कासीसचूर्ण को शरपोंखाक्षार में मिलाकर गरम जल अथवा कुमारीस्वरस (मुसम्बर) के साथ सेवन करने से भयंकर प्लीहावृद्धि में आराम आ जाता है। स्त्रियों के मासिक का कष्ट अर्थात् माहवारी रुकने के कारण कष्ट होने पर कासीस को सुहागा और मुसम्बर चूर्ण में मिलाकर सेवन करने से शीघ्र आराम आता है। रक्त की कमी के कारण होनेवाली हृदय की घबराहट (पल- पिटेशन) में कासीसचूर्ण को दालचीनी और एलुआचूर्ण में मिलाकर प्रयोग करने पर आराम आता है। वीसर्पशोथ को रोकने के लिए या कम करने के लिए कासीसजल में कपड़े को भिगोकर वीसर्प के शोथयुक्त प्रदेश पर रखने से आराम आता है। व्रण अच्छा होने पर उस स्थान पर की त्वचा को एक-सा वर्ण देने के लिए कासीस को त्रिफलाक्वाथ में घोलकर इस जल से दिन में कई बार लेप किया जाता है। दाँत में कीड़ा लगने पर कासीस को फिटकरी, हींग और देवदारुचूर्ण के साथ एकत्र पीसकर गोली-सी बना कर दाँत में रखने से कृमिदन्त रोग में आराम आता है। शुद्ध कासीसचूर्ण को एरण्डबीज, निम्ब- बीज और रसौंतचूर्ण के साथ एकत्र पीसकर चार-चार रत्ती की गोली बना लें। इन गोलियों को प्रतिदिन दिन में तीन बार जल से कुछ दिन सेवन करने से पुराना वीसर्प भी शान्त हो जाता है। हिक्का को बन्द करने के लिए एक रत्ती कासीस को चार रत्ती कैथ के गूदे में मिलाकर सेवन कराया जाता है। शरीर
५६८ रसततरङ्गिणी में रक्तवृद्धि के लिए शुद्ध कासीसचूर्ण में सज्जीक्षारचूर्ण मिलाकर सेवन कराया जाता है । पुराने सफेद कोढ़ के दागों (निसान) पर कासीसचूर्ण में धतूराबीज और गुञ्जाबीज ( रत्ती ) चूर्ण मिला जल से पीस लेप किया जाता है । इस लेप को दो मास तक बराबर लगाते रहने से श्वित्रकुष्ठ के निशान मिट जाते हैं। कासीसचूर्ण को बाकुचीबीजचूर्ण और शुद्ध गेरूचूर्ण के साथ मिलाकर जल से पीसकर दो मास तक लेप करने से चिह्न मिट जाते हैं। गुदभ्रंश ( काँच निक- लना ) तथा बवासीर के मस्सों में कासीसद्रव की गुदबस्ति कुछ दिन देते रहने से बवासीर के मस्से सूख जाते हैं और गुदभ्रंश भी गुद बन्धनियों के दृढ हो जाने से ठीक हो जाता है ॥ २४३-२५४ ॥ कासीसस्य प्रथमो मारणप्रकारः काञ्जिकेन तु विभाव्य सप्तधा शोषयेत्खगमनांशुभिर्बुधः । सम्पुटेच्च लघुना पुटेन तत् स्याद्धि भस्म खलु लोहितप्रभम् ॥२५५॥ समादायाथ तद्भस्म पेषयेन्निम्बुकद्रवैः । चक्रिकाः कारयित्वा च पुटेल्लघुपुटे पुनः ॥२५६॥ यावन्निरम्लं तद्भस्म तावदेवं पुनः पुनः । निम्बूकोत्थै रसैर्वाचः पिष्ट्वा संशोष्य सम्पुटेत् ॥२५७॥ सुश्लक्ष्णं जायते भस्म सर्वदोषविवर्जितम् । तत्साध्येषु विकारेषु वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २५८ ॥ कासीसस्य मारणप्रकारः—अम्लराहित्यं प्रायः चत्वारिंशत्पुटैर्निष्पाद्यते । कासीसभस्म लौहवत् पाण्डुकामलाद्यामयनाशनं विशेषतः श्वित्रघ्नञ्च ॥ २५५-२५८॥ भा.टी.—शुद्ध कासीसचूर्ण को खरल में डाल उसमें काञ्जी मिलाकर घोटें और सुखा लें । इस प्रकार काञ्जी की सात भावना देकर सुखा लें । अब इस चूर्ण को सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक दें तो इसकी रक्तवर्ण की भस्म हो जाती है । अब इस भस्म को लेकर खरल में डालें और नींबू के रस से पीस कर टिकिया बना लें और धूप में सुखाकर सम्पुट में फूँक देवें । इस तरह नींबू रस की तब तक भावना देकर पुट देते रहें जब तक कि भस्म को चखने पर उसमें खट्टापन मालूम न हो। इस विधि से कसीस की सर्वदोषरहित कोमल चिकनी भस्म हो जाती है ॥ २५५-२५८ ॥
द्वाविंशस्तरङ्गः ५६६ द्वितीय मारणप्रकारः स्नुहीपत्ररसैर्यत्ना मर्दितं पुटितं मुहुः । निरम्लीभावपर्यन्तं कासीसं भस्मतामियात् ॥ २५९ ॥ आ.टी.—शुद्ध कासीसचूर्णं को थोहर के पत्रों के स्वरस में घोटकर टिकिया बनावें। टिकियाओं को धूप में सुखाकर सम्पुट में बन्द करके लघुपुट में फूँक देवें । इस प्रकार तब तक थोहरपत्र स्वरस के साथ घोटकर लघुपुट देते रहें जबतक कि भस्म में बिलकुल ही खट्टापन न रहे । इस विधि से भी कासीस की भस्म हो जाती है ॥ २५९ ॥ कासीसभस्मनो गुणादिनिरूपणम् गुणमात्राविनिर्देशो लौहवत्परिकीर्तितः । विशेषतः श्वित्रहरं भिषग्भिः समुदीरितम् ॥ २६० ॥ इति उपधात्वादिविज्ञानीयो नाम एकविंशस्तरङ्गः । भा.टी.—कासीसभस्म की मात्रा तथा गुण लोहभस्म के समान ही सम- झने चाहिये, किन्तु कासीसभस्म विशेष रूप से श्वित्रकुष्ठहर होती है ॥ २६० ॥ यह उपधात्वादिविज्ञानीय नाम इक्कीसवाँ तरङ्ग समाप्त हुआ । —:०:— अथ मिश्रलोहादिविज्ञानीयो नाम द्वाविंशस्तरङ्गः अथ पित्तलस्य नामानि पित्तलं पीतलोहञ्च कपिलोहञ्च रीतिका । आरं तथारकूटञ्च तदेव परिकीर्तितम् ॥ १ ॥ तत्रादौ पित्तलनामानि—पित्तलमिति ॥ १ ॥ भा.टी.—पित्तल, पीतलोह, कपिलोह, रीतिका, आर, आरकूट, ये सब नाम पीतल के कहे जाते हैं। यह दो धातुओं के मिश्रण से बनता है ॥ १ ॥ पित्तलस्य निर्माणप्रकारः द्विभागिकं सूर्यलोहं विधिना परिशोधितम् । भागैकिकं च यशदं विमलं तु समाहरेत् ॥ २ ॥ निधाय गारमूषायां प्रधमेत् प्रखराग्निना । द्रवीभूतं ततो ज्ञात्वा ढालयेद्रसकोविदः ॥ ३ ॥ रीत्याऽनया विशेषेण पित्तलं खलु निर्मितम् । भस्मीकृत्य प्रयुञ्जीत रसेषु रसकर्मवित् ॥ ४ ॥
५७० रसतरङ्गिणी तस्य निर्माणप्रकारो द्विभागिकमिति । सूर्यलोहं ताम्रम् ॥ २-४ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ ताम्र दो भाग और शुद्ध यशद एक भाग लेकर दोनों को एकत्र गारमूषा में रखकर मूषा को कोष्ठी में रखकर तेज अग्नि से तपायें। जब धमन करते हुए दोनों ही पिघलकर एक हो जायें तो इसे ढाल देवें। इस रीति से बनाये हुए पीतल धातु को भस्म करके रसों में काम लाना चाहिए ॥ २-४ ॥ ग्राह्यपित्तलस्य स्वरूपम् प्रखरानलसंतप्तं काञ्जिके परिषेचितम् । ताम्रप्रभं भवेद्यत्तु जात्यं तत्पित्तलं मतम् ॥ ५ ॥ मारणीयस्य ग्राह्यपित्तलस्वरूपं प्रखरानलसन्तप्तमित्यादि सुगमम् ॥ उक्तं हि—"मन्तप्ता काञ्जिके क्षिप्ता ताम्रा स्याद्राजरीतिका । काकतुण्डी तु कृष्णा स्यान्नासौ सेव्या विजानता" इति ॥ ५ ॥ भा.टी.—पित्तल को अति तीव्र कोयलों की अग्नि में तपाकर काञ्जी में बुझाने से यदि वह ताम्र सदृश दिखाई देता हो तो उसे जात्य (उत्तम) पित्तल समझना चाहिए ॥ ५ ॥ हेयपित्तलस्य स्वरूपम् तप्तं यत्पित्तलं वह्नौ निषिक्तं गृहवारिणि । लौहप्रभं भवेत्कामं तद्धेयमिह कीर्तितम् ॥ ६ ॥ भा.टी.—जिस पीतल को अग्नि में तपाकर काञ्जी में बुझा देने पर काले लोहे के सदृश हो जाय तो अग्राह्य पीतल समझना चाहिए ॥ ६ ॥ पित्तलशोधनस्य प्रथमः प्रकारः प्रतनूनि च पत्राणि पैत्तलानि समाहरेत् । स्थाल्यां वङ्गप्रलिप्तायां न्यस्य गोमूत्रसंयुतम् ॥ ७ ॥ प्रखरानलयोगेन पचेद्यामचतुष्टयम् । पित्तलं पक्वमेवन्तु शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ८ ॥ पित्तलशोधनं ताम्रवद् गोमूत्रे पाचनात् । अथवा हरिद्राचूर्णयुते निर्गुण्डी- कषाये निर्वापणात् ॥ ७-८ ॥ भा.टी.—पीतल के बहुत बारीक-बारीक पत्र बना लें। अब इनको रांगे की कलई किये हुए एक पात्र में डालकर उसमें गोमूत्र भी डाल दें। पात्र को चूल्हे पर चढ़ाकर चार पहर तक तेज अग्नि से पकावैं तो इस प्रकार पीतल उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ ७-८ ॥
द्वाविंशस्तरङ्गः ५७१ द्वितीयः शोधनप्रकारः तनुपत्रीकृतं तप्तं रजनीरजसा युते । क्षिप्तं निर्गुण्डिकातोये पित्तलं शुद्धिमाप्नुयात् ॥६॥ . भा.टी.—पीतल के पतले-पतले पत्र बनाकर अग्नि में गरम करे, जब अच्छी तरह लाल वर्ण के हो जायें तो उन्हें निर्गुण्डीस्वरस में हल्दी का चूर्ण डाल उसमें बुझा दें । इस प्रकार सात बार करने से पित्तल शुद्ध हो जाता है ॥६॥ अथ पित्तलमारणस्य प्रथमः प्रकारः सूक्ष्मपत्रीकृतं शोधितं पित्तलं तुल्यगन्धान्वितं खल्वयन्त्रे न्यसेत् । पेषयेद्भास्करक्षीरसंयोजितं शोषितञ्चातपे सम्पुटे विन्यसेत् ॥१०॥ लेपिते मृत्स्नया पङ्कपिण्डाभया त्वग्निवारं पुटेद्वारणाख्ये पुटे । मारितं पित्तलं त्वत्र रीत्यानया जायते सुन्दरं कज्जलाभं परम् ॥११॥ मारणप्रकारः सूक्ष्मेति । भास्करक्षीरं अर्कदुग्धम् । अग्निवारं त्रिवारम् । पङ्कपिण्डाभयेति घनपंकेनेति यावत् । वारणाख्ये गजपुटे ॥ १०, ११ ॥ भा.टी.—शुद्ध पीतल को रेती से रेत कर चूर्ण बना लें । इसको खरल में डालकर उसमें पीतल समभाग शुद्ध गन्धक मिलाकर उसको आक के दूध के साथ खूब अच्छी तरह मर्दन कर धूप में सुखा लें । अब इसे एक सम्पुट में बन्द कर दें और इसको गाढ़े-गाढ़े मिट्टी के कीचड़ से लेप करके सुखा लें । सूखने के बाद इस सम्पुट को गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार गन्धक के साथ तीन गजपुट देने से पीतल की काजल के सदृश काले रंग की उत्तम भस्म हो जाती है ॥ १०, ११ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः तनुपत्रीकृतं शोधितं पित्तलं पलपञ्चकम् । समहिङ्गुलतालाभ्यां मर्दितं कन्यकाम्भसा ॥१२॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा वारणाख्ये पुटे पुटेत् । त्रिधैवं पुटितं यत्नात् पित्तलं याति पञ्चताम् ॥१३॥ कज्जलाभं भवेद्भस्म रमणीयतरं शुभम् । इत्थं मृतं पित्तलं तु भवेद्-भ्रान्त्यादिवर्जितम् ॥१४॥ भा.टी—शुद्ध पीतल का चूर्ण पाँच पल लेकर खरल में डालें और इसमें पाँच पल शुद्ध हिंगुल और पाँच पल शुद्ध हरताल भी डाल दें । फिर इसको घीकुंआर के रस से खूब मर्दन करके सुखा लें । इस सूखे हुए चूर्ण को एक
५७२ रसतरङ्गिणी सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूँके देवें। इस प्रकार तीन बार गजपुट में फूँकने से पीतल की सुन्दर काजल के सदृश काले रंग की उत्तम भस्म हो जाती है। इस भस्म में वान्ति भ्रान्ति आदि ताम्र के आठ दोष नहीं रहते हैं ॥१२-१४॥ तृतीयो मारणप्रकारः पत्रीकृतं पित्तलं तु समगन्धशिलान्वितम्। कन्यानीरेण सम्पिष्टं शोषितं सम्पुटे न्यसेत् ॥१५॥ त्रिवारं पुटयेदेवं भस्म स्यात्कज्जलप्रभम्। एवं मृतं पित्तलं तु वीनशङ्कः प्रयोजयेत् ॥१६॥ तृतीये प्रकारे—समगन्धशिलान्वितमिति गन्धके शिलया च पृथक् सम- भागेन योजितम् ॥ १५, १६ ॥ भा.टी.—शुद्ध पीतल चूर्ण के समभाग शुद्ध गन्धक और शुद्ध मैनसिल मिलाकर घीकुआर के रस के साथ अच्छी तरह मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इस सूखे हुए चूर्ण को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें। इस प्रकार गन्धक और मैनसिल के साथ तीन गजपुट देने से पीतल की काजल के सदृश काली भस्म हो जाती है ॥ १५-१६ ॥ मृतपित्तलस्य गुणाः सुमृतं पित्तलं रूक्षं तिक्तं नातिविलेखनम्। कृमिघ्नं कुष्ठशमनं पाण्ड्वामयविनाशनम् ॥१७॥ पित्तलं सम्यङ्ग्मृतं रूक्षादिगुणम्। प्रयोगस्ताम्रवत्। मात्रा तु यशदयोगात् गुञ्जापर्यन्तमपि इति विशेषः ॥ १७ ॥ भा.टी.—उत्तम विधि से बनी हुई पीतल की भस्म रूक्षगुण, तिक्तरस और कुछ लेखन कर्म करनेवाली है। इसके सेवन से उदरकृमि, कुष्ठ रोग तथा पाण्डुरोग नष्ट होते हैं ॥ १७ ॥ पित्तलस्य प्रयोगमात्रानिरूपणम् पित्तलस्य योगस्तु रविलोहसमो मतः। गुञ्जार्धतस्तु गुञ्जैकमिता मात्रा च युज्यते ॥१८॥ भा.टी.—पीतल की भस्म की प्रयोगविधि ताम्रभस्म के समान ही सम- झनी चाहिये। और इसकी मात्रा आधी रत्ती से लेकर एक रत्ती तक प्रयोग की जाती है ॥ १८ ॥
द्वाबिंशस्तरङ्गः ५७३ पित्तलरसायनम् पित्तलं कान्तकं व्योमसत्त्वं मृतं कीटविद्वेषणं त्र्यूषणं तुल्यकम् । होमधान्याजमोदाग्निभल्लातकब्रह्मबीजोद्भवत्क्षोदसंयोजितम् ॥१६॥ रक्तिकाद्धोन्मितं मासमासेवितं नाशयेद् दारुणां श्वेतकुष्ठव्यथाम् । बह्निसन्दीपनं त्वामसम्पाचनं शूलनिर्मूलनं कीटकोत्सादनम् ॥२०॥ अथ पित्तलरसायनम्—व्योमसत्त्वमभ्रसत्त्वम्, कीटविद्वेषणं विडङ्गम्, होम- धान्यं तिलाः, अग्निः चित्रकः, ब्रह्मबीजम् पलाशबीजम् ॥ १६-२० ॥ भा.टी.-पित्तलभस्म, कान्तलौहभस्म, अभ्रकसत्वभस्म, विडङ्ग, सोंठ, पीपर, मरिच, तिल, अजमोदा, चित्रक, शुद्ध भेलावा और पलास का बीज, ये सब समान भाग लेकर आधी रत्ती की मात्रा से मास पर्यन्त खाने से भयंकर श्वेतकुष्ठ दूर होता है और अग्निवृद्धि, आमदोष का पाचन, शूल का नाश तथा कीटों का नाश करता है ॥ १६, २० ॥ अथ कांस्यस्य नामानि कंसोयं कांस्यक कास्यं घोषपुष्पञ्च घोषकम् । घोषो घोषं वह्निलोहं तदेव परिकीर्तितम् ॥ २१ ॥ भा.टी.-कंसीय, कांस्यक, कांस्य, घोषपुष्प, घोषक, वह्निलोह, घोष, ये सब नाम काँसे के कहे जाते हैं ॥ २१ ॥ कांस्यस्य निर्माणप्रकारः रविलोहं वेदभागमितं विधिविशोधितम् । आगिकं विमलं वङ्गं गाढं मूषागतं धमेत् ॥ २२ ॥ विद्रुतं जायते रम्यं वरघोषं तु कांस्यकम् । एवं विनिर्मितं कांस्यं मारणाय प्रयोजयेत् ॥ २३ ॥ भा.टी.-अच्छी तरह शुद्ध ताम्र चार भाग और शुद्ध वंग एक भाग लेकर दोनों को एक मूषा में रखकर तीव्र गति से तपायें। जब दोनों पिघलकर एक हो जायँ तो इसको ढाल लें। इस प्रकार करने से सुन्दर उत्तम काँसा बन जाता है। इसी काँसे को भस्म करने के काम में लाना चाहिए ॥२२, २३॥ ग्राह्यकांस्यस्य स्वरूपम् सुनादं भास्वरं स्निग्धं श्वेतं मृदु च निर्मलम् । घनाग्निसहमत्यन्तं कांस्यं ग्राह्यमिहोच्यते ॥ २४ ॥ ग्राह्यकांस्यं सुनादमिति। उक्तं हि-"श्वेतं दीप्तं मृदु ज्योतिः शब्दाढ्यं स्निग्धनिर्मलम् । घनाग्निसहसूत्राङ्गं कांस्यमुत्तममीरितम् ॥” इति ॥ २४ ॥
५७४ रसतरङ्गिणी भा.टी.—जो काँसा बजाने पर अच्छा शब्द करता हो, चमकीला, स्निग्ध (चिकना स्पर्श), श्वेतवर्ण, कोमल, स्वच्छ हो और तीव्र अग्नि तथा हथौड़े की चोट को सहन करनेवाला हो उसे औषधि कार्य में ग्रहण करना चाहिए ॥२४॥ हेयकांस्यस्य स्वरूपम् निरुज्ज्वलं खरं रूक्षं पीतं दहनतापितम् । आताम्रं मन्दनादञ्च कांस्यं हेयमुदीरितम् ॥ २५ ॥ भा.टी.—मैला (देखने में), खुरदरा, रूक्ष, पीतवर्ण, आग में तपाने पर ताँबे के सदृश हो जानेवाला, मन्द आवाज का काँसा औषधि कर्म में ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥ २५ ॥ कांस्यशोधनस्य प्रथमः प्रकारः तनुपत्रीकृतं कांस्यं वह्निसन्तापितं भृशम् । निर्वापितं गव्यमूत्रे सप्तधा शुद्धिमाप्नुयात् ॥ २६ ॥ भा.टी.—काँसे के पतले-पतले पत्र बनाकर उनको अग्नि में तपायें, जब लाल वर्ण के हो जायँ तो गोमूत्र में बुझा दें। इस प्रकार सात बार गोमूत्र में बुझाने से काँसे की शुद्धि हो जाती है ॥ २६ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः सूक्ष्मपत्रीकृतं घोषपुष्पाह्वयं मूत्रपट्वन्वितं स्थालिकायां न्यसेत् । यामसम्पाचितं तीक्ष्णतीक्ष्णाग्निना सर्वदोषोज्झितं जायते सत्वरम् ॥ भा.टी.—उत्तम काँसे को रेती से रेत कर सूक्ष्म चूर्ण बना लें। अब इस चूर्ण को एक हाँडी में डालकर उसमें गोमूत्र और सेन्धानमक भी डाल दें। इस हाँडी को चूल्हे पर रखकर एक पहर तक अग्नि से पकायें तो काँसा शीघ्र ही सर्व दोषरहित हो जाता है ॥२७॥ कांस्यमारणस्य प्रथमः प्रकारः तनुपत्रीकृतं कांस्यं समगन्धसमन्वितम् । अर्कक्षीरेण सम्पेष्य शोषयेदातपे दृढम् ॥२८॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा वारणाख्ये पुटे पुटेत् । एवं पुटत्रयात्कांस्यभस्म स्यात्सुमनोहरम् ॥ २९ ॥ भा.टी.—शुद्ध काँसे के अति सूक्ष्म पत्र बनाकर उसमें समभाग शुद्ध गंधक मिला आक के दूध के साथ अच्छी तरह घोंटकर धूप में सुखा लें। अब इसको सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें। इस प्रकार गन्धक के साथ के तीन गजपुट देने से काँसे की सुन्दर भस्म हो जाती है ॥ २८, २९ ॥
द्वाविंशस्तरङ्गः ५७५ द्वितीयो मारणप्रकारः तुल्यरक्तान्वितं निम्बूकस्याम्भसा सूक्ष्मपत्रीकृतं कांस्यकं पेषयेत् । शोषितं त्रिपुटैत् सम्पुटस्थं ततो घोषपुष्पं तदा पञ्चतां यात्यलम् ॥३०॥ भा.टी.—शुद्ध कांसे का चूर्ण और शुद्ध हिंगुल को समभाग में लेकर खरल में नींबू के रस से अच्छी तरह मर्दन कर धूप में सुखा लें । अब इसको एक सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार तीन गजपुट देने से कांसे की भस्म हो जाती है ॥ ३० ॥ तृतीयो मारणप्रकारः कांस्यं तुल्यं शिलागन्धयुतं कन्याम्बुपेषितम् । पुटेत् त्रिधैवं यत्नेन भस्म स्यात् कज्जलप्रभम् ॥ ३१ ॥ भा.टी.—उत्तम शुद्ध काँसे के सूक्ष्म पत्र अथवा चूर्ण में समभाग शुद्ध मैनसिल और शुद्ध गन्धक मिला घीकुआर के रस से अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें । अब इसको सम्पुट में बन्द कर गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार मैनसिल तथा गन्धक के साथ तीन गजपुट देने से काँसे की काजल के सदृश काले रंग की भस्म हो जाती है ॥ ३१ ॥ मृतकांस्यस्य गुणाः घोषपुष्पं तु तुवरं तिक्तोष्णं लेखने हितम् । नेत्रप्रसादनं रूक्षं सरं च विशदं परम् ॥३२॥ क्रिमिघ्नं कुष्ठशमनं कफपित्तप्रणाशनम् । वातघ्नं दीपनञ्चैव परमेतत्प्रकीर्तितम् ॥३३॥ कांस्यं तुवरादिगुणम् । प्रयोगादयश्चास्य ताम्रवदेवेति । अपि च—"घृतवर्जं बुधैः सर्वं पाच्यं कांस्यस्य पात्रके । भोजनन्तु प्रशस्तं स्याद् रीतिका मध्यमा स्मृता ॥" इत्यप्याहुः प्राज्ञाः ॥ ३२, ३३ ॥ भा.टी.—कांसे की भस्म तुवर (कषाय) और तिक्तरस, उष्ण और लेखन गुण युक्त होती है । इसके प्रयोग से नेत्र स्वच्छ होते हैं । यह रूक्ष, सर और विशद गुणयुक्त होती है । इसके सेवन से उदरक्रिमि और कुष्ठ रोग नष्ट होते हैं । यह कफ, पित्त तथा वातनाशक और उत्तम दीपक होती है ॥३२, ३३॥ मृतकांस्यस्य प्रयोगादयः कांस्यकस्य प्रयोगस्तु रविलोहसमो मतः । गुञ्जार्द्धतश्च गुञ्जैकमिता मात्रा प्रयुज्यते ॥३४॥
५७६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—काँसे की भस्म का प्रयोग ताम्रभस्म के समान ही समझना चाहिये। इसकी भस्म आधी रत्ती से लेकर आवश्यकतानुसार एक रत्ती तक प्रयोग की जाती है ॥ ३४ ॥ अथ अञ्जनस्य नामानि अञ्जनस्य द्वौ भेदौ अञ्जनं तु समाख्यातं सेचकं लोचकं तथा। अञ्जनं द्विविधं ज्ञेयं स्रोतोऽञ्जञ्च सुवीरजम् ॥ ३५ ॥ भा.टी.—अञ्जन को मेचक तथा लोचक नाम से कहा जाता है। अञ्जन के दो भेद माने गये हैं। १–स्रोतोञ्जन, २ सौवीराञ्जन ॥ ३५ ॥ वक्तव्य—उक्त दो अञ्जनों में स्रोतोञ्जन (काला सुरमा) नागधातु का मूल खनिज है। इसमें गन्धक का योग होता है और स्वभावतः प्राप्त होने- वाला खनिज द्रव्य है। अफगानिस्तान, फारस तथा ईरान की बड़ी-बड़ी पर्वत- मालाओं में इसकी खानें पायी जाती हैं। इसके अतिरिक्त झेलम नदी के निकट कटासराज के पास अनेक पर्वतमय प्रदेशों में भी इसकी खानें पायी जाती हैं। यह काले चमकीले स्फटिकों के रूप में प्राप्त होता है और रासायनिक दृष्टि से सीसकगन्धिद् (Lead sulphite) माना जाता है। इसको “गैलीना” (Galena) कहते हैं और आधुनिक वैज्ञानिक इसको “अन्टीमनी सल्फाइड” (Antimony sulphide) कहते हैं। सौवीराञ्जन—यह स्रोतोञ्जन का ही एक भेद है। यह भी सुवीरा नदी के किनारे पाये जाने के कारण सौवीराञ्जन नाम से कहा जाता है। यह स्रोतोञ्जन की अपेक्षा गंधक आदि की न्यूनाधिकता के कारण कृष्ण वर्ण के स्थान पर धूम्रवर्ण या पाण्डुवर्ण का होता है—“स्रोतोञ्ज- नसमं ज्ञेयं सौवीरं तत्तु पांडुरम्”। यह सुरमा वैली आसाम से अधिक रूप में आता है। आधुनिक वैज्ञानिक इसको “स्टिबनाइटिस” (Stybnitis) मानते हैं। तत्र स्रोतोऽञ्जनस्य नामानि स्रोतोऽञ्जनं तु स्रोतोऽजं यामुनेयञ्च यामुनम् । नीलांजनं तद्देवोक्तं कपोतांजनकाह्वयम् ॥३६॥ भा.टी.—स्रोतोञ्जन, स्रोतोऽज, यामुनेय, यामुन, नीलाञ्जन और कपोताञ्जनः ये सब नाम नीले सुरमे के माने जाते हैं ॥ ३६ ॥
३७ द्वाविंशस्तरङ्गः ५७७ सौवीराञ्जनस्य नामानि सौवीराञ्जनकं ख्यातं सौवीरं तु सुवीरजम् । कृष्णाञ्जनं तथा कालाञ्जनञ्चापि प्रकीर्तितम् ॥ ३७ ॥ भा.टी.—सौवीराञ्जन को सौवीर, सुवीरज, कृष्णांजन तथा कालांजन नाम से ग्रहण किया जाता है ॥ ३७ ॥ स्रोतोऽञ्जनस्य स्वरूपम् भंगे नीलोत्पलनिभं घर्षणे गैरिकप्रभम् । वल्मीकशर्षप्रतिमं मतं स्रोतोऽञ्जनं बुधैः ॥३८॥ तत्र स्रोतोऽञ्जनस्वरूपं भंगे नीलोत्पलनिभमिति । सौवीरंजनस्वरूपं बाह्यतः खलु धूमाभमिति । सुवीरदेशजातत्वात् सौवीरनाम्ना प्रसिद्धम् । सौवीरदेशश्च वितस्ता-( झेलम ) नदीनिकटवर्तिकटासराज्यसमीपे पर्वतमालामयो देशस्तत्र हि खनिः सौवीराञ्जनस्येति । यत्तु कैश्चित् श्वेतः सकोणः स्फटिकाकृतिः पाषाणः सौवीराञ्जननाम्ना ( श्वेत सुरमा ) व्यवह्रियते, तत्तु पाषाणविशेष एव. तन्त्रेषु कृष्णत्वस्यैवाञ्जने वर्णितत्वात् विचार्यमेवेति ॥ ३८ ॥ भा.टा.—जो सुरमा तोड़ने पर भीतर से नीलकमल वर्ण का, घिसने पर गेरू के सदृश, बेडौल खण्डोंवाला होता है उसे स्रोतोञ्जन कहते हैं ॥ ३८ ॥ सौवीराञ्जनस्य स्वरूपम् बाह्यतः खलु धूमाभं भंगे त्वतिसमुज्ज्वलम् । घर्षे खलु मषीवर्णं सौवीराञ्जनमुच्यते ॥ ३६ ॥ भा.टी.—काला सुरमा बाहर से देखने में कुछ धूम्र वर्ण का और तोड़ने पर भोतर अत्यन्त चमकीला, लिखने पर काला रंग देनेवाला होता है ॥३६॥ स्रोतोऽञ्जनसौवीराञ्जनयोः शोधनम् अञ्जनद्वितयं यत्नात् पेषितं त्रिफलाम्भसा । दिनसप्तकमात्रेण विशुध्यति न संशयः ॥ ४० ॥ भा.टां.—उक्त दोनों प्रकार के अञ्जनों को यदि शुद्ध करना हो तो उन्हें अलग-अलग खरल में डालकर त्रिफलाक्वाथ के साथ सात दिन तक खूब रगड़कर सुखा के रख लें । इस विधि से निःसन्देह अञ्जन शुद्ध हो जाते हैं॥४०। द्वितीयः शोधनप्रकारः भृङ्गराजरसेनेह पेषितं त्वञ्जनद्वयम् । दिनसप्तकमात्रेण शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ४१ ॥