रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—काँसे की भस्म का प्रयोग ताम्रभस्म के समान ही समझना चाहिये। इसकी भस्म आधी रत्ती से लेकर आवश्यकतानुसार एक रत्ती तक प्रयोग की जाती है ॥ ३४ ॥ अथ अञ्जनस्य नामानि अञ्जनस्य द्वौ भेदौ अञ्जनं तु समाख्यातं सेचकं लोचकं तथा। अञ्जनं द्विविधं ज्ञेयं स्रोतोऽञ्जञ्च सुवीरजम् ॥ ३५ ॥ भा.टी.—अञ्जन को मेचक तथा लोचक नाम से कहा जाता है। अञ्जन के दो भेद माने गये हैं। १–स्रोतोञ्जन, २ सौवीराञ्जन ॥ ३५ ॥ वक्तव्य—उक्त दो अञ्जनों में स्रोतोञ्जन (काला सुरमा) नागधातु का मूल खनिज है। इसमें गन्धक का योग होता है और स्वभावतः प्राप्त होने- वाला खनिज द्रव्य है। अफगानिस्तान, फारस तथा ईरान की बड़ी-बड़ी पर्वत- मालाओं में इसकी खानें पायी जाती हैं। इसके अतिरिक्त झेलम नदी के निकट कटासराज के पास अनेक पर्वतमय प्रदेशों में भी इसकी खानें पायी जाती हैं। यह काले चमकीले स्फटिकों के रूप में प्राप्त होता है और रासायनिक दृष्टि से सीसकगन्धिद् (Lead sulphite) माना जाता है। इसको “गैलीना” (Galena) कहते हैं और आधुनिक वैज्ञानिक इसको “अन्टीमनी सल्फाइड” (Antimony sulphide) कहते हैं। सौवीराञ्जन—यह स्रोतोञ्जन का ही एक भेद है। यह भी सुवीरा नदी के किनारे पाये जाने के कारण सौवीराञ्जन नाम से कहा जाता है। यह स्रोतोञ्जन की अपेक्षा गंधक आदि की न्यूनाधिकता के कारण कृष्ण वर्ण के स्थान पर धूम्रवर्ण या पाण्डुवर्ण का होता है—“स्रोतोञ्ज- नसमं ज्ञेयं सौवीरं तत्तु पांडुरम्”। यह सुरमा वैली आसाम से अधिक रूप में आता है। आधुनिक वैज्ञानिक इसको “स्टिबनाइटिस” (Stybnitis) मानते हैं। तत्र स्रोतोऽञ्जनस्य नामानि स्रोतोऽञ्जनं तु स्रोतोऽजं यामुनेयञ्च यामुनम् । नीलांजनं तद्देवोक्तं कपोतांजनकाह्वयम् ॥३६॥ भा.टी.—स्रोतोञ्जन, स्रोतोऽज, यामुनेय, यामुन, नीलाञ्जन और कपोताञ्जनः ये सब नाम नीले सुरमे के माने जाते हैं ॥ ३६ ॥