रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
५७६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—काँसे की भस्म का प्रयोग ताम्रभस्म के समान ही समझना चाहिये। इसकी भस्म आधी रत्ती से लेकर आवश्यकतानुसार एक रत्ती तक प्रयोग की जाती है ॥ ३४ ॥ अथ अञ्जनस्य नामानि अञ्जनस्य द्वौ भेदौ अञ्जनं तु समाख्यातं सेचकं लोचकं तथा। अञ्जनं द्विविधं ज्ञेयं स्रोतोऽञ्जञ्च सुवीरजम् ॥ ३५ ॥ भा.टी.—अञ्जन को मेचक तथा लोचक नाम से कहा जाता है। अञ्जन के दो भेद माने गये हैं। १–स्रोतोञ्जन, २ सौवीराञ्जन ॥ ३५ ॥ वक्तव्य—उक्त दो अञ्जनों में स्रोतोञ्जन (काला सुरमा) नागधातु का मूल खनिज है। इसमें गन्धक का योग होता है और स्वभावतः प्राप्त होने- वाला खनिज द्रव्य है। अफगानिस्तान, फारस तथा ईरान की बड़ी-बड़ी पर्वत- मालाओं में इसकी खानें पायी जाती हैं। इसके अतिरिक्त झेलम नदी के निकट कटासराज के पास अनेक पर्वतमय प्रदेशों में भी इसकी खानें पायी जाती हैं। यह काले चमकीले स्फटिकों के रूप में प्राप्त होता है और रासायनिक दृष्टि से सीसकगन्धिद् (Lead sulphite) माना जाता है। इसको “गैलीना” (Galena) कहते हैं और आधुनिक वैज्ञानिक इसको “अन्टीमनी सल्फाइड” (Antimony sulphide) कहते हैं। सौवीराञ्जन—यह स्रोतोञ्जन का ही एक भेद है। यह भी सुवीरा नदी के किनारे पाये जाने के कारण सौवीराञ्जन नाम से कहा जाता है। यह स्रोतोञ्जन की अपेक्षा गंधक आदि की न्यूनाधिकता के कारण कृष्ण वर्ण के स्थान पर धूम्रवर्ण या पाण्डुवर्ण का होता है—“स्रोतोञ्ज- नसमं ज्ञेयं सौवीरं तत्तु पांडुरम्”। यह सुरमा वैली आसाम से अधिक रूप में आता है। आधुनिक वैज्ञानिक इसको “स्टिबनाइटिस” (Stybnitis) मानते हैं। तत्र स्रोतोऽञ्जनस्य नामानि स्रोतोऽञ्जनं तु स्रोतोऽजं यामुनेयञ्च यामुनम् । नीलांजनं तद्देवोक्तं कपोतांजनकाह्वयम् ॥३६॥ भा.टी.—स्रोतोञ्जन, स्रोतोऽज, यामुनेय, यामुन, नीलाञ्जन और कपोताञ्जनः ये सब नाम नीले सुरमे के माने जाते हैं ॥ ३६ ॥
३७ द्वाविंशस्तरङ्गः ५७७ सौवीराञ्जनस्य नामानि सौवीराञ्जनकं ख्यातं सौवीरं तु सुवीरजम् । कृष्णाञ्जनं तथा कालाञ्जनञ्चापि प्रकीर्तितम् ॥ ३७ ॥ भा.टी.—सौवीराञ्जन को सौवीर, सुवीरज, कृष्णांजन तथा कालांजन नाम से ग्रहण किया जाता है ॥ ३७ ॥ स्रोतोऽञ्जनस्य स्वरूपम् भंगे नीलोत्पलनिभं घर्षणे गैरिकप्रभम् । वल्मीकशर्षप्रतिमं मतं स्रोतोऽञ्जनं बुधैः ॥३८॥ तत्र स्रोतोऽञ्जनस्वरूपं भंगे नीलोत्पलनिभमिति । सौवीरंजनस्वरूपं बाह्यतः खलु धूमाभमिति । सुवीरदेशजातत्वात् सौवीरनाम्ना प्रसिद्धम् । सौवीरदेशश्च वितस्ता-( झेलम ) नदीनिकटवर्तिकटासराज्यसमीपे पर्वतमालामयो देशस्तत्र हि खनिः सौवीराञ्जनस्येति । यत्तु कैश्चित् श्वेतः सकोणः स्फटिकाकृतिः पाषाणः सौवीराञ्जननाम्ना ( श्वेत सुरमा ) व्यवह्रियते, तत्तु पाषाणविशेष एव. तन्त्रेषु कृष्णत्वस्यैवाञ्जने वर्णितत्वात् विचार्यमेवेति ॥ ३८ ॥ भा.टा.—जो सुरमा तोड़ने पर भीतर से नीलकमल वर्ण का, घिसने पर गेरू के सदृश, बेडौल खण्डोंवाला होता है उसे स्रोतोञ्जन कहते हैं ॥ ३८ ॥ सौवीराञ्जनस्य स्वरूपम् बाह्यतः खलु धूमाभं भंगे त्वतिसमुज्ज्वलम् । घर्षे खलु मषीवर्णं सौवीराञ्जनमुच्यते ॥ ३६ ॥ भा.टी.—काला सुरमा बाहर से देखने में कुछ धूम्र वर्ण का और तोड़ने पर भोतर अत्यन्त चमकीला, लिखने पर काला रंग देनेवाला होता है ॥३६॥ स्रोतोऽञ्जनसौवीराञ्जनयोः शोधनम् अञ्जनद्वितयं यत्नात् पेषितं त्रिफलाम्भसा । दिनसप्तकमात्रेण विशुध्यति न संशयः ॥ ४० ॥ भा.टां.—उक्त दोनों प्रकार के अञ्जनों को यदि शुद्ध करना हो तो उन्हें अलग-अलग खरल में डालकर त्रिफलाक्वाथ के साथ सात दिन तक खूब रगड़कर सुखा के रख लें । इस विधि से निःसन्देह अञ्जन शुद्ध हो जाते हैं॥४०। द्वितीयः शोधनप्रकारः भृङ्गराजरसेनेह पेषितं त्वञ्जनद्वयम् । दिनसप्तकमात्रेण शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ४१ ॥
५७ रसतरङ्गिणी उभयोः शोधनप्रकारः सुगम एव । अपिच अञ्जनात् पञ्चामांशं ताम्रचूर्णं दत्वा भस्त्राध्मातं गालयेत् । शीते सति मुद्गरघातं कुट्टयेत् । तथा हि अञ्जन- तस्ताम्रयोगसंपत्त्या नागो विश्लिष्य पृथग्भवति ॥ ४१ ॥ भा.टी.—उक्त दोनों ही अञ्जनों को पृथक्-पृथक् खरल में डालकर भांगरे के स्वरस के साथ सात दिन मर्दनकर सुखा लेने से भी ये शुद्ध हो जाते हैं॥४१॥ तृतीयः शोधनप्रकारः फलत्रिकनिशायुग्मभृङ्गराजरसे भृशम् । अञ्जनद्वितयं स्विन्नं यामाच्छुद्धिमवाप्नुयात् ॥ ४२ ॥ भा.टी.—उक्त दोनों अञ्जनों की वस्त्र में पृथक्-पृथक् पोटली बनाकर इनको दोलायंत्र विधि से त्रिफला, हरिद्रा तथा भांगरे के स्वरस में छः घण्टे स्वेदन करने से भी ये शुद्ध हो जाते हैं ॥ ४२ ॥ स्रोतोऽञ्जनस्य गुणाः स्रोतोऽञ्जनं तु शिशिरं तुवरं लेखनं परम् । स्निग्धं स्वादु परं ग्राहि कफपित्तविषापहम् ॥ ४३ ॥ रक्तपित्तक्षयहरं नेत्रामयनिषूदनम् । हिक्काच्छर्दिप्रशमनं स्तन्यवृद्धिकरं परम् ॥ ४४ ॥ भा.टी.—स्रोतोञ्जन (नीला सुरमा) शिशिर (शीतगुणवीर्य), तुवर (कषायरस), उत्तम लेखन (नेत्रगत मल को पतला करके निकालनेवाला), स्निग्ध, स्वादु (मधुर), ग्राही तथा कफपित्त तथा विष-प्रभाव-नाशक होता है । इसके सेवन से रक्तपित्त तथा क्षय रोग नष्ट होते हैं । नेत्र रोगों को नष्ट करता है । स्रोतोञ्जन हिक्का, छर्दि (वमन) को शान्त करता है और स्त्री के स्तनों में दूध की वृद्धि करता है ॥ ४३, ४४ ॥ सौवीराञ्जनस्य गुणाः सौवीरमञ्जनं ग्राहि स्निग्धञ्च तुहिनोपमम् । रक्तपित्तप्रशमनं नेत्रामयहरं परम् ॥ ४५ ॥ विषहिक्कापहं कामं व्रणशोधनरोपणम् । परं रजोदोधकरं रक्तप्रदरनाशनम् ॥ ४६ ॥ भा.टी.—सौवीराञ्जन ग्राही, स्निग्ध और बर्फ के समान शीतगुण होता है । इसके सेवन से रक्तपित्त शान्त हो जाता है, नेत्र रोग मिट जाते हैं । यह बाह्याभ्यन्तर शरीरगत विष तथा हिक्का को नष्ट करता है और व्रणों को शुद्ध
द्वाविंशस्तरङ्गः ५७६ तथा रोपण करता है, इसके सेवन से मासिक धर्म रुक जाता है और रक्तप्रदर में होनेवाला रक्तस्राव भी बन्द हो जाता है ॥ ४५, ४६ ॥ आभ्यन्तरप्रयोगे स्रोतस्सौवीराञ्जनयोर्मात्रा गुञ्जार्धतः समारभ्य गुञ्जैकमितमञ्जनम् । दिनद्वयं त्रयं वापि प्रयुञ्जीत भिषग्वरः ॥४७॥ अञ्जनद्वितयं रक्तप्रदरे तु दिनत्रयात् । अधिकं नोपयुञ्जीत रसतन्त्रविशारदः ॥४८॥ अधिकं नोपयुञ्जीतेति अधिकोऽनयोः प्रयोगो वन्ध्यात्वव्यापत्कर इत्यवधेयम् । अञ्जनं ह्यवयवेषु सञ्चितं भवति नैरन्तर्येणोपयुक्तं नानांशसाहचर्याच्चामृतनागजां- श्चोपद्रवान् सञ्जनयति ॥ ४७, ४८ ॥ भा.टी.—उक्त दोनों प्रकार के अञ्जनों में से यदि किसी का आभ्यन्तर प्रयोग करना हो तो आधी रत्ती से लेकर एक रत्ती तक की मात्रा में प्रयोग कर सकते हैं । इन दोनों को यदि रक्तप्रदर के रक्तस्राव को बन्द करने के लिए देना हो तो तीन दिन से अधिक दिन तक इसका सेवन नहीं करना चाहिए ॥४७, ४८॥ वक्तव्य—यह पहिले बताया गया था कि अञ्जन नागधातु का मूल खनिज है । अतः इसमें सीसक का होना स्वाभाविक है । इस सीसक के कारण ही यह ग्राही प्रभाव रखता है । यदि इसको कुछ काल तक निरन्तर सेवन कराया जाय तो अञ्जनगत नाग शरीर में विशेषतः आँतों में सञ्चित हो जाता है, जिससे कालान्तर में अशुद्ध और अमृत नाग के उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं और स्त्री को प्रदर शान्ति के लिए अधिक दिन तक सेवन कराने से गर्भाशय संकोच और डिम्बग्रन्थि संकोच होने से उनमें गर्भधारण और उत्पादन की शक्ति नहीं रहती है । कथंचित् गर्भाशयप्राप्त शुक्र को और जीवाणु को भी यह गर्भाशय में जीवित नहीं रहने देता है, क्योंकि यह गर्भाशय में संचित होता है । अथ पुष्पाञ्जनस्य परिचयः रीतिकाद्रावणविधौ रीतिस्थं यशदं द्रुतम् । समेत्यम्बरपीयूषयोगेन सितचूर्णिताम् ॥४९॥ तदेव सितचूर्णन्तु पुष्पाञ्जनमुदीरितम् । भस्त्राध्मातं पुष्पितं तु यशदं वा तदाह्वयम् ॥५०॥ पुष्पाञ्जनपरिचयो गुणाश्च निगदव्याख्याताः, अग्नियोगात् पुष्पितस्य यश- दस्य पुष्पाञ्जनं नामेति । रीतिका पित्तलम् ॥ ४६, ५० ॥
५८० रस्तरङ्गिणी भा.टी.—पीतल धातु को पिघलाने पर जब पीतल में होनेवाला यशद ( जस्ता ) पिघल कर ओषजन से मिलकर श्वेत चूर्ण काला रूप धारण कर लेता है तो इसी यशद के श्वेत चूर्ण को पुष्पांजन कहा जाता है । अथवा केवल यशद को एक लोहपात्र अथवा मिट्टी के पात्र में रखकर तेज अग्नि से तपाने पर भी यह यशदपुष्प बन जाता है ॥ ४६, ५० ॥ वक्तव्य—उक्त विधि से प्राप्त यशदपुष्प केवल अञ्जनप्रयोग में विशेषरूप से व्यवहार में आने के कारण पुष्पांजन कहा जाता है । वास्तव में यह (.Zinc Oxide ) होता है । अञ्जन के अतिरिक्त यह बाह्य प्रयोग में काम आता है । पुष्पाञ्जनस्य गुणाः पुष्पाञ्जनं तु शिशिरं स्निग्धं पित्तव्रणाशनम् । अभिष्यन्दप्रशमनं परं दाहविनाशनम् ॥५१॥ विचर्चिकादित्वग्दोषशमनं व्रणरोपणम् । समाख्यातं विशेषेण हिक्कापञ्चकनाशनम् ॥५२॥ भा.टी.—पुष्पांजन—शिशिर, स्निग्ध और पित्तप्रकोपनाशक है । इसके बाह्य प्रयोग से अभिष्यन्द (नेत्ररोग ) तथा नेत्रपलकों की दाह शान्त हो जाती है । विचर्चिका आदि त्वक्रोगों में इसके योग लगाये जाते हैं। व्रणों को भरने के लिए इसके व्रणरोपक लेप लगाये जाते हैं। इसको प्राचीन पुस्तकों में विशेषरूप से हिक्कानाशक गुणवाला लिखा है ॥ ५१, ५२ ॥ अञ्जनत्रितयस्य बाह्यप्रयोगः अञ्जनद्वितयं पुष्पाञ्जनेन सहितं तु वा । यशदेनाग्निदग्धेन ह्यभिष्यन्दहरं परम् ॥५३॥ भा.टी.—स्रोतोञ्जन, सौवीराञ्जन के साथ यदि यशद को अग्नि पर रख कर बनाये हुए उसके फूले ( पुष्पांजन ) के साथ मिला दिया जाय तो इसे अञ्जनत्रितय कहा जाता है । यह अञ्जनत्रितय बाह्य प्रयोग में नेत्राभिष्यन्द रोगों में अत्यन्त लाभदायक है ॥ ५३ ॥ तिमिरहराञ्जनम् तोलकैककमितं सीसं विशुद्धं दर्विकागतम् । हसन्तिकायां विन्यस्य गालयेत्प्रखराग्निना ॥५४॥
द्वाविंशस्तरङ्गः ५८१ सीसोन्मितं सुविमलं सूतं सीसे तु विद्रुते । निक्षिप्य द्रुतमादाय खल्वे सम्पेपयेद् दृढम् ॥ ५५ ॥ श्लक्ष्णचूर्णं ततो ज्ञात्वा द्वयोर्द्विगुणमञ्जनम् । सौवीरं विमलं दत्त्वा पेषयेद्दिनसप्तकम् ॥ ५६ ॥ माषकत्रितयं चन्द्रं दत्त्वाथ परिपेषयेत् । कुप्यां न्यसेन्मतमिदं तिमिरापहमञ्जनम् ॥ ५७ ॥ तोलकैकमितं सीसकमिति शार्ङ्गधरादौ प्रत्यञ्जननाम्ना व्यवहृतम् । चन्द्रं कर्पूरम् ॥ ५४–५७ ॥ भा.टो.—एक तोला शुद्ध सीसे को एक लम्बे वेंटवाली लोहे की करछी में डालकर उस करछी को जलते हुए कोयलों की अँगेठी पर रखकर तीव्र अग्नि देते हुए पिघलावें । जब सीसा पिघल जाय तो उसमें एक तोला शुद्ध पारद डालकर शीघ्र ही करछी को खरल में उलट कर मूसली से खूब अच्छी तरह मर्दन करके बारीक चूर्ण बना लें । अब इस चूर्ण में चार तोला शुद्ध सौवीरा- ञ्जन ( काला सुरमा ) मिलाकर सात दिन की रगड़ाई करके अन्त में तीन मासे कपूर ( भीमसेनी ) डालकर अच्छी तरह मिलाकर शीशी में भरकर डाट बन्द करके रख लें । इस अञ्जन को कुछ काल निरन्तर नेत्रों में आँजने से तिमिर रोग नष्ट होता है ॥ ५४, ५७ ॥ तुहिनाञ्जनम् सोरकं तोलकार्द्धन्तु घनसारञ्च तन्मितम् । पलैकं खलु सौवीरं दत्त्वा सम्पेपयेद् भृशम् ॥ ५८ ॥ निदध्यात्काचकूप्यान्तु नाम्नेदं तुहिनाञ्जनम् । कण्डूदाहपरिस्रावहरं परमुदीरितम् ॥ ५६ ॥ भा.टी.—उत्तम सोरा आधा तोला, कपूर आधा तोला और शुद्ध सौवी- राञ्जन एक पल लेकर तीनों को एकत्र खरल में खूब अच्छी तरह घोटकर बारीक अञ्जन बनाकर काँच की शीशी में रख लें । इसको शीत अञ्जन कहते हैं, क्योंकि यह नेत्रों के लिए अत्यन्त ठंडा होने से बहुत लाभदायक होता है । इसके अतिरिक्त इस अञ्जन को कण्डू, दाह तथा स्रावयुक्त नेत्रों में भी पूर्ण रूप से व्यवहार करना चाहिए ॥ ५८–५६ ॥ अथ शिलाजतुनामानि शिलाजतु च शैलेयं शिलाजं शैलधातुजम् ।
५८२ रसतरङ्गिणी शिलामयः शिलास्वेदः शिलानिर्यास इत्यपि ॥ ६० ॥ अश्मजं त्वश्मजतु कं गिरिजं त्वद्रिजं तथा । अश्मोत्थमश्मलाक्षा च गैरेयञ्च मतन्तु तत् ॥ ६१ ॥ भा.टी.—शिलाजतु, शैलेय, शिलाज, शैलधातुज, शिलामय, शिला- स्वेद, शिलानिर्यास, अश्मज, अश्मजतु क, गिरिज, अद्रिज, अश्मोत्थ, अश्म- लाक्षा और गैरेय, ये नाम शिलाजीत के कहे जाते हैं ॥ ६०, ६१ ॥ शिलाजतुपरिचयः सूर्य्यसन्तापसन्तप्ताः शिलाः शैलाधिपस्य यद् । गोढं मुञ्चन्ति निर्यासं तच्छिलाजतु कीर्त्तितम् ॥६२॥ शैलाधिपशिलासारो निर्गतो रवितापतः । शुष्कः सन्मूर्त्ततां यातः शिलाजतु निगद्यते ॥६३॥ भा.टी.-जब ज्येष्ठ वैशाख की तीव्र सूर्य की किरणों से हिमालय की शिला (चट्टान) गरम हो जाती हैं और उनमें होनेवाला रस पिघलकर बाहर आकर जमने लगता है उसे शिलाजीत कहते हैं । अथवा हिमालय की शिलाओं का सार सूर्य के ताप से चू करके बाहर आ जाता है और सूख करके काला कोल- तार-सा हो जाता है उसे शिलाजीत कहते हैं ॥ ६२, ६३ ॥ वक्तव्य—यह देखने में कोलतार ( अलकतरा ) के समान काला और गाढ़ा-सा द्रव होता है । सूखने पर चमकीला और भङ्गुर हो जाता है। यह जल में घुल जाता है और तारों को छोड़ता है । अलकोहल, क्लोरोफार्म तथा ईथर में नहीं घुलता है । रासायनिक प्रतिक्रिया में उदासीन रहता है । शिलाजतु विश्लेषण—शुद्ध शिलाजतु के विश्लेषण करने से उसमें जल ६.५%, ऐन्द्रियिक द्रव्य ३६.२०%, पार्थिव द्रव्य ३४.६५%, ( Nitrogenous matters ) १.३%, चूना, ७.८०%, अभ्रक ( Mica ) १.३५%, मात्रा में पाये जाते हैं । सम्भवतः इन्हीं तत्वों की उपस्थिति के कारण शिलाजतु त्रिदोष- नाशक स्थिर किया गया हो । यह प्रायः सभी रोगों में लाभदायक होता है । कहा गया है—"न सोऽस्ति रोगों भुवि मानवानां शिलाजतु यन्न जयेत्प्रसह्य।" आज-कल शिलाजीत काश्मीर, गढ़वाल, बागेश्वर ( अल्मोड़ा ), भूटान, तिब्बत और गिलगित आदि पर्वतीय स्थानों से प्राप्त होता है । इसको वहाँ के लोग छोटे-छोटे खण्डों में एकत्र करके भेजते हैं । कोई शिलाजीत को खनिज तैल मिनरल आयल ( Mineral oil )
द्वविंशस्तरङ्गः ५८३ का यौगिक मानते हैं। सम्भव है कि इसी कारण उनके विचारों में शिलाजीत को अग्नि पर नहीं तपाना चाहिये। क्योंकि इसमें पैट्रोल की जाति का तैल होने से यह शीघ्र उड़नशील है और अग्निपरीक्षा में निर्धूम जलता है और पानी में तैरता है। परन्तु आयुर्वेद के रसग्रन्थों में इसकी भस्म करने को लिखा है। आधुनिक चिकित्सकों ने इसमें मिनरल आयल पाया है, अतः वे लोग भी शिलाजतु को क्षय रोग में व्यवहृत होता हुआ देखकर पेट्रोलियम इमल्शन (Petroleum Imullion) का क्षय रोग में व्यवहार करने लगे हैं। परन्तु आजकल शिलाजीत के विषय में बहुत ठगी चल पड़ी है, इसका पूरा ध्यान रखकर ही शिलाजीत का व्यवहार होना चाहिए। शिलाजतुभेदाः सौवर्णं राजतं ताम्रं लौहञ्चेति विभेदतः। शिलाजतु समाख्यातं भिषग्भिस्तु चतुर्विधम् ॥ ६४ ॥ शिलाजतुभेदाः सौवर्णादयः। उक्तं हि प्राचीनैः—"सौवर्णं राजतं ताम्रमा- यसञ्च चतुर्विधम्। शिलाजतु हि विज्ञेयं तत्तल्लिङ्गललक्षितम्" इति ॥६४॥ भा.टी.—स्वर्णगर्भ शिलाजतु, रजतगर्भ शिलाजतु, ताम्रगर्भ शिलाजतु, लौहगर्भ शिलाजतु, इस तरह स्वर्ण आदि धातुयुक्त पत्थरों से प्राप्त होने के कारण शिलाजीत के चार भेद पाये जाते हैं ॥६४॥ तेषां रूपाणि शिशिरं मधुरं तिक्तं कटुकं कटुपाकि च। जटाकुसुमसदृशां सौवर्णं शैलधातुजम् ॥ ६५ ॥ शिशिरं पाण्डुरं तिक्तं स्वादुपाकि च राजतम्। तिक्तोष्णनीदणं नालाभं ताम्रं गिरिजमीरितम् ॥ ६६ ॥ तिक्तं सलवणं कृष्णं विपाके कटुशीतलम्। गुरु स्निग्धं कषायञ्च सर्वश्रेष्ठं तदायसम् ॥ ६७॥ सौवर्णं वातपित्तघ्नं राजतं श्लेष्मपित्तहृत्। कफघ्नं ताम्रजं ज्ञेयं त्रिदोषहरमायसम् ॥ ६८ ॥ तेषां रूपाणि—शिशिरं मधुरं तिक्तमित्यादिना। उक्तं हि—"सौवर्णन्तु जपापुष्पवर्णं भवति शैलजम्। मधुरं कटुतिक्तञ्च शीतलं कटुपाकि च" इति। तथा शिशिरं पाण्डुरं तिक्तं राजतमिति। तथा चोक्तम्—"राजतं पाण्डुरं शीतं कटुकं स्वादुपाकि च" इति। तिक्तोष्णादिगुणं ताम्रम्। यथाहूः—"ताम्रं मयूर-
५८४ | रसतरङ्गिणी
कण्ठाभं तीक्ष्णमुष्णं च जायते" इति। लौहं तु—तिक्तं सलवणं कृष्णं शीत- लञ्च । स्मरन्ति हि—"लौहं जटायुपक्षाभं सतिक्तं लवणं भवेत् । विपाके कटुकं शीतं सर्वश्रेष्ठमुदाहृतम्" इति । एतेन शिलाजतु स्वोपादानस्वर्णादिधातुवत् शीतवीर्यम्, ताम्रस्य तु उष्णवीर्यम् । ताम्रस्योष्णवीर्यत्त्वात् । तस्मात् लौहं शिलाजत्वपि उष्णवीर्यमिति लोकोक्तिर्भ्रान्तेति निश्चयः ॥६५–६८॥ भा.टी.—स्वर्णधातुयुक्त शिलाओं से निकलनेवाला शिलाजीत शिशिर- गुण, मधुर, तिक्त और कटुरस तथा कटुविपाकी और बाह्यदर्शन में गुड़हलपुष्प सदृश वर्ण का होता है । रजतधातु युक्त शिलाओं से निकलनेवाला शिलाजीत शिशिर पाण्डुवर्ण, तिक्त रस, मधुरपाकवाला होता है। ताम्रधातु युक्त शिलाओं से प्राप्त होनेवाला शिलाजीत तिक्तरस, तीक्ष्ण, उष्ण गुण और बाह्यदर्शन में नीलाभवर्ण का होता है । लौहधातु युक्त शिलाओं से प्राप्त होनेवाला शिला- जीत तिक्त, किञ्चित् लवण और कषाय रस, कटुविपाक, शीतल, गुरु तथा स्निग्ध गुण और बाह्यदर्शन में काले रंग का होता है। इनमें से सुवर्ण शिला- जतु वातपित्तनाशक, रजतशिलाजतु श्लेष्मपित्तहर, ताम्रशिलाजतु कफनाशक, किन्तु लौह शिलाजतु त्रिदोषशामक होता है ॥ ६५–६८ ॥ शिलाजतुनः शोधनम् [ गीतिका ] विगताम्बुदे निवाते धरणीतलप्रदेशे । प्रखरे निदाघकाले प्रणयेच्छिलाजशुद्धिम् ॥ ६६ ॥ विमलानि भाजनानि त्रयसा विनिर्मितानि । युगसंमितानि तीव्रे निदधीत सूर्यतापे ॥७०॥ सुविचूर्णीतं शिलाजं विनिधाय पात्रमध्ये । द्विगुणं प्रतप्तनीरं त्रिफलाकषायमर्द्धम् ॥७१॥ गिरिजे प्रदाय यामं निदधीत तीव्रतापे । कामं विमर्द्य गिरिजं विदधीत वस्त्रपूतम् ॥७२॥ विनिधाय पूर्वपात्रे निदधीत तीव्रतापे । अथ तीव्रतापयोगाद्विमलं सरं प्रकाशम् ॥७३॥ मृदुलं प्रगाढकृष्णं यदुपैति नीरपृष्ठे । विदधीत सोष्णतोये खलु भाजनेऽपरस्मिन् ॥७४॥ अथ वै द्वितीयपात्रात् खलु भाजने तृतीये ।
द्वाविंशस्तरङ्गः ५८५ अथ भाजनात्तृतीयात् निदधीत तुर्यपात्रे ॥७५॥ सलिलं तु यावदच्छं न भवेत्तु तावदेवम् । विदधीत वैद्यवर्यः सततं कृतावधानः ॥७६॥ सलिलं भवेद्यदाच्छं मलमेत्यधःप्रदेशे । सलिलोर्ध्वभागसंस्थं गिरिजं हरेद्विशुद्धम् ॥७७॥ विधिना ह्यनेन शुद्धिं तदुपैति निर्विशेषात् । गिरिजं विशुद्धमेवं विनियोजयेद्विशङ्कः ॥७८॥ शिलाजतुशोधनप्रकारश्चरकाचार्योक्त एव व्यवहृतः सर्वसम्मतश्चेति स एव सरलाक्षरैर्गीतिकया च निर्दिष्ट आचार्य्यैः । युगसंमितानीति चत्वारि । अशुद्धन्तु दाहादिकारणमाहुः । स्मरन्ति हि—"अशुद्धं दाहमूर्च्छायभ्रमपित्तास्रशोषकृत् । शिलाजतु प्रकुरुते मान्द्यमग्नेश्च विड्ग्रहम्" इति । प्रक्षेपक्वाथस्य मानञ्च जलम- ष्टगुणं शिलाजतुसमानञ्च क्वाथ्यद्रव्यमिति । यथाह स्म वाग्भटः—"तुल्यं गिरि- जेन जले वसुगुणिते भावनौषधं क्वाथ्यम्।" इति । इत्थं शुद्धस्य गुणोत्कर्षाय भावनान्तरयोगोऽपि स्मर्य्यते कैश्चित् । विस्तरस्तु शिवागुटिकानिर्माणादौ वृद्ध- वाग्भटेऽनुसन्धेयः । भृङ्गरसत्रिफलागोदुग्धादिभिः शोधनन्तु गोत्रदोषशान्तये तत्र तत्र गुणाधानार्थञ्च कार्यमेव "गोदुग्धत्रिफलाभृङ्गद्रवैः पिष्टं शिलाजतु ! दिनैकं लौहजे पात्रे शुद्धिमायात्यसंशयम्" इति स्मरणात् ॥ ६६-७८ ॥ भा.टो—बहुत तेज गर्मी के दिनों ( वैशाख और जेठ के महीने ) में जब आकाश में बादल बिलकुल न हों, तेज हवा न चलतां हो तो उन दिनों में शिलाजीत का शोधन करना चाहिए । शिलाजीतशोधन करने के लिए चार बड़े-बड़े लोहे के पात्र ( कड़ाही, परात आदि ) लेवें । अब एक पात्र में शिला- जतुचूर्ण ( पत्थर का चूर्ण या शिलाजीत का पिंड ) डालकर उसमें शिलाजतु से द्विगुण गरम जल और शिलाजतु से अर्धभाग त्रिफलाक्वाथ मिलाकर तीन घण्टे तक धूप में रख दें । इसके बाद धूप में ही इसको अच्छी तरह मसल कर कपड़े में छान लें । अब छाने हुए काले रंग के शिलाजतु जल को उक्त चार पात्रों में से एक पात्र में भरकर तेज धूप में रख दें । तेज धूप के लगने से जल के ऊपर कोमल स्वच्छ तथा अतिकृष्णवर्ण की मलाई-सी लग जायेगी । इस मलाई के सदृश पदार्थ को धीरे-धीरे निकालकर दूसरे वहाँ पर रखे हुए पात्र के गरम जल में डाल दें । जब इस दूसरे पात्रस्थ जल के ऊपर मलाई-सी जम जाय तो इसको तीसरे पात्र के गरम जल में डाल दें । इसी तरह तीसरे पात्र की
५८६ रसतरङ्गिणी मलाई को चौथे पात्र में डाल दें। इस प्रकार शिलाजतुजल युक्त पात्रों में से तब तक मलाई के रूप में जमी हुई शिलाजीत को निकालते रहें जब तक कि वह जल स्वच्छ वर्ण का न हो जाय और सारा पत्थर रेत मिट्टी आदि पात्र के तल में बैठ जाय। इस प्रकार अन्त में पूर्ण सावधानी के साथ स्वच्छ जल के ऊपर आयी हुई विशुद्ध शिलाजतु को एक स्वच्छपात्र में एकत्र कर लें। इस विधि से शिलाजतु उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाती है। इसको निःशंक होकर योगों में काम ला सकते हैं ॥ ६६-७८ ॥ वक्तव्य-जिन पात्रों में शिलाजीत का जल पड़ा हुआ हो उनको हिलाना- डुलाना नहीं चाहिए। अन्यथा न ऊपर के भाग में मलाई आयेगी और न नीचे रेत आदि पदार्थ ही बैठ सकेंगे। पात्र के ऊपर धूल आदि न पड़ने पावें। इस लिए पात्र के मुख पर सीसा रख देना चाहिए अथवा बहुत बारीक और साफ कपड़ा से ढकना चाहिए। मलाई को निकालते हुए सावधानी रखनी चाहिए जिससे उसके नीचे के जल में बहुत कम्पन न होने पावे। प्रक्षेपक्वाथमानम् शिलाजतुसमं क्वाथः जलमष्टगुणं ततः। पर्दाशशेषितः क्वाथ शिलामयविशुद्धये ॥७६॥ भा.टी.-शिलाजीत की शुद्धि के लिए जिस औषधि का क्वाथ काम में लाना हो उसे शोधनीय शिलाजीत के समभाग लेकर उसमें आठ गुणा जल डालकर पकायें, जब पकते-पकते जल चतुर्थांश रह जाय तो उसे छानकर शिलाजीत शोधन के काम में लाना चाहिए ॥ ७६ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः निरुक्तेनैव विधिना क्वाथस्थाने तु गोजलम्। दत्त्वाहृता शिलालाक्षा शुद्धिमायात्यसंशयम् ॥८०॥ भा.टी.-यदि शिलाजीत शोधन में (त्रिफला) कषाय के स्थान पर गोमूत्र (ताजा और साफ) डालकर धूप में रख के शिलाजीत की मलाई जमा ली जाय तो इससे भी शिलाजीत निःसन्देह शुद्ध हो जाती है ॥ ८० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः पूर्वोक्तेनैव मार्गेण क्वाथे भृङ्गोत्थितं रसम्। दत्वा हृतः शिलास्वेदः परां शुद्धिंमवाप्नुयात् ॥८१॥ भा.टी.-यदि त्रिफला कषाय के स्थान पर भाँगरे का स्वच्छ साफ स्वरस
द्वाविंशस्तरङ्गः ५८७ डालकर धूप में सुखाकर शिलाजीत की मलाई निकाल ली जाय तो भी शिलाजीत शुद्ध हो जाती है ॥८१॥ वक्तव्य—शिलाजीत को विशेष रूप से वातहर, पित्तहर तथा कफहर बनाने के लिए इसे सामान्य शोधन के अनन्तर वात, पित्त और कफ नाशक गणों की औषधियों के पृथक्-पृथक् क्वाथ, अथवा सम्पूर्ण वातहर या पित्तहर अथवा कफ नाशक वर्ग के कषाय की भावना देकर विशेष रूप से शिलाजीत को बनाया जा सकता है। इस विधि से तैयार की हुई शिलाजीत अधिक शक्तिशाली हो जाती है और रोगों को (वातादि प्रकोपजन्य) शीघ्र ही शान्त करनेवाली हो जाती है। शिलाजीत को विशेष शक्तिशाली बनाने के लिए पहिले सामान्य विधि से अर्थात् त्रिफला कषाय, गोमूत्र अथवा भाँगरे के कषाय स्वरस से शुद्ध करना चाहिए। इसके बाद जब उसमें मैल अथवा रेत बालु आदि का अंश न रहे तो फिर उसमें वातादि नाशक औषधियों का कषाय डालकर धूप में रख सुखा लेना चाहिए। जब पूर्व क्वाथ सूख जाय तो पुनः दूसरा क्वाथ उसमें डालकर धूप में रखकर सुखा लेना चाहिए। कई फार्मेसीवाले शिलाजीत को गरम पानी या गोमूत्र में घोलकर छान लेते हैं, फिर उसे अग्नि पर चढ़ा कर गाढ़ा कर लेते हैं और अग्नितापी शिला- जीत के नाम से व्यवहार करते हैं। परन्तु इस विधि से बनायी हुई शिलाजीत में बालुका, रेत, मिट्टी आदि का अंश रहने से यह उत्तम नहीं है। विशुद्धशिलाजतुनः परीक्षणम् याङ्गारसंस्था निर्धूमा पक्वा लिङ्गोपमा भवेत् । आस्वादे कटुतिक्ता च शिनालाक्षा तु साऽमला ॥८२॥ शुद्धशिलाजतुपरीक्षां याऽङ्गारसंस्थेत्यादिना। यथाहुः—“वह्नौ क्षिप्तन्तु निर्धूमं पक्वं लिङ्गोपमं भवेत्। तृणाग्रेणाम्भसि क्षिप्तमधो गलति तन्तुवत् ॥ गोमूत्रगन्धि मलिनं शुद्धं ज्ञेयं शिलाजतु”॥ इति। सामलेत्यत्र सा अमला इति च्छेदः ॥८२॥ भा.टी.—जिस शिलाजीत (शुद्ध) को जलते हुए कोयलों के ऊपर रखने से धुंआ न उठे, किन्तु भुत-भुत करके पकती हुई शिलाजीत लिंगाकार हो जाय, इसके साथ ही यदि उसे जिह्वा पर रखें तो उसमें कटु और तिक्त (कडुवा) स्वाद मालूम होता हो तो उसे शुद्ध (असली) शिलाजीत समझना चाहिए ॥८२॥
५८८ रसतरङ्गिणी अपरं परीक्षणम् सलिले या विनििक्षिप्ता तन्तुप्रस्रवकारिणी । आस्वादे कटुतिक्ता च शिलालाक्षा तु साऽमला ॥८३॥ भा.टी.-अथवा जिस शिलाजीत को थोड़ा-सा लेकर जल में डाला जाय यदि वह जल में इधर-उधर को तार से होकर फैलने लगे और स्वाद में कटु और तिक्त हो तो वह भी शुद्ध शिलाजीत होती है ॥८३॥ शिलामयस्य गुणाः शिलाजतु मतं तिक्तं विपाके कटुकं तथा । मूत्रलञ्च विशेषेण योगवाहि रसायनम् ॥८४॥ भा.टी.-शिलाजीत तिक्त प्रधान रस, विपाक में कटु, मूत्र अधिक लाने वाला योगवाही और रसायन द्रव्य है ॥८४॥ अपि च- शिलास्वेदो बल्यः श्वयथुशमनः पाण्डुहरणः क्षयश्वासप्लीहज्वरदहनमान्द्यापहरतः । अपस्मारोन्मादोदरगुदजकृच्छ्रप्रशमनः समीरस्थौल्योरुक्षतहृदयशूलैकदलनः ॥८५॥ प्रमेहकरिकेशरी प्रबलशूलकालानलः कृमिप्रशमनः परं सुवितताश्मरीशैलभित् । सकुष्ठवमिगुल्मजित् प्रबलवातरक्तप्लुतं स्मृतो रसविशारदैः खलु शिलामयो निर्मलः ॥८६॥ गुणाः- उक्तमन्यत्रापि "शिलाह्वं कटुतिक्तोष्णं कटुपाकं रसायनम् । छेदि योगावहं हन्ति कफमेहाश्मशर्कराः ॥ मूत्रकृच्छ्रं क्षयं श्वासं वातास्राशांसि पाण्डुताम् । अपस्मारं तथोन्मादं शोथकुष्ठोदरकृमीन्" इति । स्यादेतत् शिशिरं हि शिलाजतु इति पूर्वमुक्तमत्र च शिलाह्वं कटुतिक्तोष्णमिति उष्णवीर्य- मुच्यते विरुद्धम् ? अत्र ब्रूमहे-न वयं सर्वं शिलाजतु शीतवीर्यमिति प्रतिजानीमहे, यावता भवतैवं पर्यनुयुज्येमहि, अपितु ताम्रमुष्णवीर्यं सौवर्णं राजतं लौहञ्च शीतवीर्यमिति, "शिलाभ्यो यस्य यज्जातं धातोस्तत्तद्गुणं वदेत्" इति वृद्धवाग्भ- टस्मरणात् । यत्तु अनुभवसिद्धमस्योष्णत्वमिति तत्र च "सर्वञ्च तिक्तकटुकं नात्युष्णं कटुपाकतः" इति गृहाण । कटुपाकतः इति हेतुपञ्चम्यास्तसिल् । इदमयुक्तं भवति कटुपाकप्रभावाद् उष्णत्वमपि स्वधातुगुणयोगात् शीतलं सत् नात्युष्णं
द्वाविंशस्तरङ्गः ५८६ भवतीति । तस्मात् नात्युष्णमिति सयुक्तिको विरोधपरिहार उद्भावितो वाग्भटे । उत्कृष्टञ्च तत्—“गोमूत्रगन्धि कृष्णं गुग्गुल्वाभं विशर्करं मृत्स्नम् । स्निग्धमनम्ल- कषायं मृदु गुरु च शिलाजतु श्रेष्ठम्” इति कथितम् । इत्यलमत्राम्रेडितेन । शिला- स्वेदो बल्य इत्यादिना शिलाजतुविशेषगुणाः निगदव्याख्याताः ॥ ८५, ८६ ॥ भा.टी.—शिलाजीत बलकारक, शोथ, पाण्डुरोग, क्षय, श्वास, प्लीहावृद्धि, ज्वर, अग्निमान्द्य रोगों को मिटाती है । इसको अपस्मार, उन्माद, उदररोग, बवासीर और मूत्रकृच्छ्र रोगों में प्रयोग किया जाता है । इसके सेवन से वात- प्रकोप, शरीर की स्थूलता, उरःक्षत, हृदय रोग ( शूल ), प्रमेह, उदरशूल, उदरकृमि अत्यन्त बढ़ी हुई अश्मरी ( पथरी ), कुष्ठ रोग, वमन, गुल्म, भयन्- कर वातरक्त रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ८५, ८६ ॥ वक्तव्य—पथ्य भोजन के साथ उत्तम विधि से नियम पूर्वम शिलाजीत का सेवन करने से यह विशेष रूप से जत्रु के ऊर्ध्वभाग में व्याप्त प्रसाद संज्ञक वायु को नियमन करती है । यदि उक्तस्थान से वायु क्षीण हो गयी हो तो उसका पोषण करती है । शिलाजीत के सेवन से मूत्र में आनेवाला ओजस्राव ( अल- ब्यूमन ) अथवा ओजधातु का क्षय दूर हो जाता है । इसके द्वारा चेतनावाही नाड़ियों की दुर्बलता दूर हो जाती है अर्थात् शिलाजीत चेतनावाही नाड़ियों के लिए बल्य है । धमनियों में बढ़ी हुई क्रिया को प्रकृतिस्थ करने के लिए शिलाजीत अमोघ और सर्वोत्तम औषधि है । अतः अधिक रक्तभार के कारण बढ़ी हुई धमनीक्रिया को नियमन करने के लिए अर्थात् अधिक रक्तभार (Blood pressure) के कारण फैली हुई धमनियों को संकुचित कर उनको बल देने के लिए शिलाजीत के समान अन्य कोई औषधि नहीं है । अधिक रक्त दबाव के कारण उत्पन्न होनेवाले तीव्र शिरःशूल में जिसमें हृदयकम्पन ( पल- पिटेशन ), नेत्र पलकों में शोथ, जी मिचलाना तथा अग्निमान्द्य में यह शीघ्र ही लाभ पहुँचाती है । पित्ताशय में जमे हुए कण रूप में होनेवाले पित्त को शिला- जीत शीघ्र ही पतला करती और बाहर निकालती है । शिलाजीत सेवन से पित्ताशय शुद्ध होता है और पित्ताशय शोथ शान्त हो जाता है । अतएव शिलाजीत पित्त जमने के कारण होनेवाली पित्ताश्मरी को निकालने के लिए उत्तम द्रव्य है । शिलाजीत के सेवन से मधुमेह शान्त हो जाता है और मधुमेह का उपद्रव स्वरूप संन्यास ( मूर्च्छा ) रोग नष्ट होता है । इसी तरह शिलाजतु से कामला तथा वमन रोग भी दूर हो जाते हैं । शिलाजतु सेवन से वातिक
५६० रसतरङ्गिणी
संस्थान (Nervous system) की दुर्बलता, मानसिक शिथिलता, अधिक रक्तदबाव के कारण उत्पन्न भयंकर उन्माद, आक्षेप (कन्वल्शन्) युक्त मूर्च्छा (coma), अपस्मार, ताण्डववात और योषापस्मार रोग शान्त होते हैं। शिलाजीत के सेवन से स्वेद वाहिनियाँ विस्तृत हो जाती हैं, जिससे अधिक स्वेद आने लगता है। इसके द्वारा उदरच्छुदा कला तथा सन्धि आदि स्थानों की कला में सञ्चित जल शोषित हो जाता है। इसके द्वारा हृदय की वृद्धि (विस्तृति) कम हो जाती है और अच्छी तरह निद्रा आने लगती है। शिला- जीत सेवन करने पर सर्वांग की महाधमनी अथवा क्षुद्रधमनी (केशिका) विस्तृत हो जाती है। इसके सेवन से वृक्कों में उत्तेजना उत्पन्न होती है जिससे मूत्र अधिक मात्रा में आता है, अतः शिलाजतु मूत्रल, पित्तनिःसारक, प्रवृद्धरक्त- वेगहर और स्वेदल है। क्योंकि शिलाजतु सेवन से वृक्कों की क्षुद्रधमनियाँ विस्तृत हो जाती हैं, जिससे अधिक मात्रा में मूत्र आता है। इसी तरह शिला- जतु से यकृत् की क्षुद्र धमनियां विस्तृत होती हैं, जिससे यकृत् में सञ्चित पित्त अधिक मात्रा में निकलता है। इसी प्रकार सर्वाङ्गत्वचा की क्षुद्रधमनियों की विस्तृतिकारक होने से शिलाजतु से सर्वांग त्वक्जात शोथ में होनेवाला अधिक रक्तदबाव भी दूर हो जाता है। त्वक्गत क्षुद्र धमनियों को विस्तृत करने के कारण शिलाजीत अधिक मात्रा में स्वेद लाती है। धमनीगत अल्पशोथ के कारण रक्त के दबाव से क्षीण हुई धमनियों की स्थिति स्थापकता शक्ति को पुनः शीघ्र प्रकृतिस्थ करने के लिए शिलाजीत उत्तम औषधि है। शिलाजतु सेवन से कामला रोग में उपद्रवस्वरूप कण्डूति (कण्डू) भी नष्ट हो जाती है। शिला- जतु में धमनी तथा मांसपेशियों के लिए स्थितिस्थापक गुण होने के कारण ही शिलाजीत हृदय आदि शारीरिक यन्त्रों की नष्ट हुई स्वाभाविक क्रियाओं को पुनः प्राप्त करने के लिए तथा इन्हीं अंगों की बढ़ी हुई स्वाभाविक क्रियाओं को नियमित करने के लिए सर्वोत्तम औषधि मानी गयी है। शिलाजीत सेवन करने से मूत्राशय में शोथ तथा रक्त सञ्चय के कारण होनेवाले मूत्राशय स्राव अर्थात् अधिक मूत्रप्रवृत्ति नष्ट हो जाती है। शिलाजीत के सेवन से मूत्र की प्रतिक्रिया (Reaction) में कोई परि- वर्तन नहीं होता और न मूत्र की गन्ध तथा वर्ण में कोई परिवर्तन होता है ! किन्तु इसके सेवन करने से चौबीस घण्टे में होनेवाले कुल मूत्र की मात्रा में वृद्धि हो जाती है अर्थात् जहाँ स्वभावतः चौबीस घण्टे में मनुष्य को सवा सेर से लेकर डेढ़ सेर तक मूत्र आता है वहाँ शिलाजीत से दो सेर तक मूत्र की मात्रा
एकविंशस्तरङ्गः ५६१
भी बढ़ जाती है। यदि मूत्र में पहिले अलब्यूमिन ( ओज ) अथवा शर्करा निकलती हों तो वह भी शिलाजीत सेवन से बन्द हो जाती है। शिलामयस्य मात्रा द्विगुञ्जातः समारभ्य वसुगुञ्जामितं परम् । शिलामयं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ८७ ॥ शिलाजतुनो मात्रा देशकालापेक्षया सप्तमुक्ता। वसुगुञ्जामितं अष्टगुञ्जाप्रमितं यावत्। कर्षमर्धपलं पलं, हीनमध्योत्तमो योगः प्राचीनोक्तो नाधुना हीनबलेषु युक्तः; व्यापद्भयात् । तदेतदाह बलकालाद्यपेक्षयेति ॥ ८७ ॥ भा.टी.—दो रत्ती परिमाण से लेकर आठ रत्ती परिमाण तक, रोगी का बलकाल आदि का ठीक-ठीक ध्यान रखते हुए शिलाजीत की मात्रा का प्रयोग किया जाना चाहिए ॥ ८७ ॥ शिलामयस्य आमयिकः प्रयोगः शिलाजतु क्षौद्रयुतं शीलितं तु द्विगुञ्जकम् । शुक्रबन्धसमुद्भूतं मूत्रकृच्छ्रं निवारयेत् ॥ ८८ ॥ दशमूलकषायेण शिलाजतु सितायुतम् । अष्ठीलिकां वातबस्तिं वातकुण्डलिकां हरेत् ॥ ८६ ॥ वरुणादिकषायेण शीलितस्तु शिलामयः । विनिहन्त्यचिरादेव मूत्राघातमथाश्मरीम् ॥६०॥ अमृताबिकषायेण शीलितं तु शिलाजतु । मूत्राघातं मूत्रकृच्छ्रं नाशयत्यविलम्बितम् ॥ ६१ ॥ ससितं च सकर्पूरं शैलेयं परिशीलितम् । मूत्रातांतं तथा मूत्रजठरञ्च विनाशयेत् ॥ ६२ ॥ गोक्षुर क्वाथसंयुक्ता शिलालाक्षा तु शीलिता । मूत्रकृच्छ्राण्यशेषाणि नाशयेदतिसत्वरम् ॥ ६३ ॥ काकोल्यादिगणोद्दिष्टभेषजैः सह शीलितः । शिलामयो वराशुद्धो वीर्यवृद्धिकरः परम् ॥ ६४ ॥ लोहताप्यघृतक्षौद्राभ्रराजन्तुघ्नसंयुता । शीलिता तु शिलालाक्षा यक्ष्माणमिह नाशयेत् ॥ ६४ ॥
५६२ रसतरङ्गिणी वीरतर्वादिगणभेषजक्वाथसंयुतम् । गिरिजं शीलितं हन्ति मूत्रकृच्छ्रादिकान् गदान् ॥९६॥ सिताक्षीरयुतं प्रातः शीलितं तु शिलाजतु । विनिहन्ति विशेषेण प्रमेहजनितां व्यथाम् ॥९७। शिलाजतु सगोमूत्रं पुरविश्वकणायुतम् । ऊरुस्तम्भं महाघोरं नाशयत्यविलम्बितम् ॥९८॥ लोहभस्मयुतं नित्यं शिलाजतु समाक्षिकम् । शीलितं तु विशेषेण रक्तसञ्जननं परम् ॥९९॥ अर्जुनक्वाथसंयुक्तं शिलाजतु निषेवितम् । मासमात्रप्रयोगेण विनिहन्ति हृदामयम् ॥ १०० ॥ अग्निमन्थरसोपेतं शिलाजतु निषेवितम् । मासद्वयप्रयोगेण स्थौल्यं नाशयति ध्रुवम् ॥ १०१ ॥ शालसारादितोयेन शैलेयं परिभावितम् । तेनैव च कषायेण द्विमासं परिशीलितम् ॥ १०२ ॥ विनाशयेच्चिरोद्भूतं मधुमेहं विशेषतः । तथैव नाशयत्याशु त्वश्मरीं मूत्रशर्कराम् ॥ १०३ ॥ कणापाषाणभेदैलासंयुक्तस्तण्डुलाम्भसा । शिलामयः शीलितस्तु प्रमेहं विनिवारयेत् ॥ १०४ ॥ एलामागधिकायुक्ता शिलालाक्षा तु शीलिता । मूत्राघातं मूत्रकृच्छ्रं नाशयत्यविकल्पतः ॥ १०५ ॥ शिलामयः शिलाघृष्टः सचन्द्रः परिपूरणात् । क्षतं सद्योऽभिघातोत्थं विना पाकं प्ररोपयेत् ॥ १०६ ॥ रजनीरजोपेता शिलालाक्षा तु शीलिता । गोमूत्रेण समाख्याता कुम्भकामलिनां हिता ॥ १०७ ॥ लोहकाञ्चनभस्माढ्यः सर्ज्जकद्रवभावितः । शिलामयो गुञ्जमितः सततं परिशीलितः ॥ १०८ ॥ मसूरिकाज्वरं स्फोटं शोणकायज्वरं तथा । नाशयत्यचिरादेव वृत्तमिन्द्रोऽशनिर्यथा ॥ १०९ ॥ शिलामयस्य रोगयोग्यः प्रयोगः—वाताकुण्डलिका मूत्राघातविशेषः वरुणादिगणस्तु सुश्रुतोक्तः । तद्यथा—“वरुणार्र्तगलशिग्रुमधुशिग्रुतर्कारीमेषशृ-
३८ द्वांविंशस्तरङ्गः ५६३ ङ्गीपूतीकनक्तमालमोरटाग्निमन्थसैरेयकद्वयबिम्बीवसुकवसिरचित्रकशतावरीबिल्वा- जशृङ्गीदर्भा बृहतीद्वयं च ॥ वरुणादिर्गणो ह्येष कफमेदो निवारणः । विनिहन्ति शिरःशूलगुल्माभ्यन्तरविद्रधीन् ॥” अमृतादिकषायस्तु-“अमृतं नागरं धात्री वाजिगन्धा त्रिकण्टकम् । प्रपिबेद्धातरोगातैः सशूली मूत्रकृच्छ्र- वान् ॥” इत्युक्तः । ससितमित्यादिप्रयोगे शैलेयं शिलाजतु । काकोल्यादिग- णश्च-“काकोलीक्षीरकाकोलीजिवकर्षभकमुद्गपर्णीमेदामहामेदाच्छिन्नरुहाकर्कट- शृङ्गीतुगाक्षीरीपद्मकप्रपौण्डरीकर्द्धिवृद्धिमृद्वीकाजीवन्त्यो मधुकं चेति ।” इति सुश्रुतोक्तः । गुणाश्चास्य “काकोल्यादिरयं पित्तशोणितानिलनाशनः । जीवनो वृंहणो वृष्यः स्तन्यः श्लेष्मकरस्तथा”। वीरतर्वादिकोऽपि गणः सुश्रुताभिहित एव । यथा--“वीरतरुसहचरद्वयदर्भेक्षुन्नादनी-गुन्द्रानलकुशकाशाश्मभेदकाग्निमन्थमो- रटवसुकवसिरभल्लूककुरण्टकेन्दीवरकपोतवङ्गा श्वदंष्ट्रा चेति । वीरतर्वादिरित्येष गणो वातविकारनुत् । अश्मरीशर्करामूत्रकृच्छ्राघातरुजापहः ॥” पुरो गुग्गुलुः, विश्वं शुण्ठी । शालसारादिगणोऽपि सुश्रुतोक्तः--“शालसाराजकर्णखदिर- कदरकालस्कन्धक्रमुकभूर्जमेषशृङ्गितिनिशचन्दनकुचन्दनशिशपाशिरीषासनधवा- र्जुनतालशाकनक्तमालपूतीकाश्चकर्णगुरूण कालीय कं चेति । शालसारादिरित्येष गणः कुष्ठविनाशनः । मेहपाण्ड्वामयहरः कफमेदोविशोधनः ॥” मागधिका पिप्पली । सचन्द्रः सकर्पूरक्षोदः । शोणकायज्वरो नाम सपदि सर्वकायस्य शोण- वर्णप्रदो ज्वरविशेषः “Scarlet Fever” इत्याङ्गलभाषायाम् । स्पष्टमन्यत् । दिङ्मात्रमत्रोदाहृतः प्रयोगः । यच्चाधुना दृश्यते प्रायशो वार्द्धक्ये रक्तवहा धमन्यः खरतां गताः रक्तवेगासहाः सत्यः शिरोरुग्भ्रममनोदेहेन्द्रियादिदौर्बल्यादिलक्षणा- नन्यांश्च कांश्चिद्दारुणानुपद्रवान् पक्षाघादीन् जनयन्तस्तत्रापि वातपित्तहरैमूत्रलैर्वा द्रव्यैः सह शिलाजतुनः प्रयोगः सुखकरं भवतीति । तथा-“ज्वरी ज्वरघ्नाम्बुदपर्पटादेः काथेन रक्ती मधुयष्टिकायाः । शोषी रसैः क्रव्यभुगामिषोत्थैर्मायूरमांसैः पयसा च काश्यें । मध्वम्बुना मेदसि सम्प्रवृद्धे क्षीरेण पर्याकुलबुद्धिसत्त्वः । पाण्ड्वामयार्तावुदरे सशोफे पिबेच्छिलाजं महिषीजलेन ॥ अश्मरीं वीरतराद्येन कुष्ठं खदिरवारिणा । विषं विषघ्नैरगदैः हन्त्येवं तद् यथामयम् ॥” इति च वाग्भटोक्तमनुसन्धेयमिति । तथा चास्य प्रयोगानन्तरमपि पथ्यापथ्ये विशेषः--“व्यायामातपमारुतचेतः सन्तापगुरुविदाह्यादि । उपयोगादपि परतो द्विगुणं परिवर्जयेत् कालम् ॥ कुलत्थान् काकमाचीं च कपोतांश्च सदा त्यजेत् । पिवेन्माहेन्द्रमुदकं कौपं प्रस्रवणाम्बु वा ॥” इति च ॥ ८८-१०६ ॥ भा.टी.-दो रत्ती शुद्ध शिलाजीत को मधु में मिलाकर सेवन कराने से शुक्रावरोध के कारण होनेवाले मूत्रकृच्छ्र में आराम आता है । अष्ठीलिका, वात-
५६४ रसतरङ्गिणी वस्ति, तथा वातकुण्डलिक्रा (मूत्ररोग) रोगों में शिलाजीत को दशमूल कषाय में खाँड मिलाकर उसके साथ सेवन करना चाहिए। शिलाजतु को वरुणादि क्वाथ के अनुपान से सेवन करने पर मूत्राघात (मूत्र रुकना) तथा पथरी रोग में लाभ होता है। मूत्राघात तथा मूत्रकृच्छ्र में शिलाजीत को अमृतादि क्वाथ अनु- पान से सेवन कराया जाता है। शिलाजीत में खाँड और कपूर मिलाकर सेवन करने से मूत्रातीत और मूत्र जठर रोगों में आराम आता है। शिलाजीत को गोखुरूक्वाथ के साथ सेवन करने से शीघ्र ही सब प्रकार के मूत्रकृच्छ्र नष्ट हो जाते हैं। त्रिफला क्वाथ से शुद्ध किये हुए शिलाजीत को यदि काकोल्यादि गणों के साथ सेवन किया जाय तो शरीर में वीर्य की वृद्धि होती है। राजयक्ष्मा में शिला- जीत को लोहभस्म, स्वर्णमाक्षिकभस्म, घी, शहद, हरीतकीचूर्ण, वायविडंगचूर्ण में मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है। वीरतरु आदि गणोक्तद्रव्यों के क्वाथ के साथ शिलाजीत का सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र आदि सब रोगों में आराम आता है। प्रमेह जन्य कष्ट को दूर करने के लिए शिलाजतु को प्रातः काल खाँड और दूध के साथ सेवन कराना चाहिए। शिलाजतु में शुद्ध गूगल, सोंठ, पिप्पली- चूर्ण मिलाकर गोमूत्र अनुपान से सेवन करने पर शीघ्र ही तीव्र प्रकार का ऊरु- स्तम्भ रोग शांत होने लगता है। शिलाजीत को लोहभस्म तथा स्वर्णमाक्षिक भस्म के साथ मिलाकर सेवन करने से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है। शिलाजीत को अर्जुनत्वक् क्वाथ अनुपान से दो मास तक निरन्तर सेवन करने से हृदय रोग में लाभ होता है। शरीर की स्थूलता को कम करने के लिए शिलाजीत को अग्निमन्थ (अरणी) के स्वरस के साथ निरन्तर दो मास तक सेवन कराना चाहिए। शुद्ध शिलाजीत को शालसारादि गणोक्त द्रव्यों के क्वाथ की इक्कीस भावना देकर तैयार कर लें। अब इस शिलाजीत को शाल- सारादिगणोक्त द्रव्यों के क्वाथ के साथ ही निरन्तर दो मास तक सेवन करायें तो बहुत पुराना मधुमेह, अश्मरी तथा मूत्रशर्करा रोग में शीघ्र आराम आ जाता है। प्रमेहरोग में शिलाजीत को पिप्पली, पाषाणभेद, इलायचीबीजचूर्ण के साथ मिलाकर चावलों के धोवन के साथ सेवन कराना चाहिए। मूत्राघात और मूत्रकृच्छ्र में शिलाजतु को इलायचीबीजचूर्णा तथा पिप्पलीचूर्णा के साथ मिला- कर सेवन कराना चाहिए। शिलाजीत को कपूर के साथ शुष्करूप में पीसकर तत्काल होनेवाले छुरी या चाकू आदि के घाव में भर देने से वह घाव बिना पके ही भर जाता है। कुम्भकामला रोग में शिलाजतु को हरिद्राचूर्ण में
मिलाकर गोमूत्र अनुपान से सेवन कराने पर आराम आता है। शिलाजीत में लोहभस्म और स्वर्णभस्म मिलाकर सर्जक (राल) द्रव (क्वाथ) से सात भावना देकर रखलें। अब इसमें से एक रत्ती की मात्रा में कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से मसूरिकाज्वर, स्फोटज्वर तथा तथा शोणकायज्वर (Scarlet Fever) शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ८८-१०६ ॥ वक्तव्य—शिलाजतु का सेवन सामान्य और विशेष रूपसे किया जाता है। सामान्य रूप से सेवन करने में विशेषरूप से पथ्यादि की आवश्यकता नहीं होती है। परन्तु विशेषरूप से (रासायनिक गुण प्राप्त करने के लिए) सेवन करने पर शिलाजीत सेवन करने के बाद द्विगुण समय तक रोगी को पथ्यपूर्वक ही रखना चाहिए और अपथ्य पदार्थों का त्याग करना चाहिए। अथ गैरिकस्य नामानि गैरिकं त्वथ गैरेयं, गिरिमृद् गिरिमृत्तिका। रक्तधातुर्लोहधातुस्तदेव गिरिमृद्भवम् ॥ ११० ॥ भा.टी.—गैरिक, गैरेय, गिरिमृद, गिरिमृत्तिका, रक्तधातु, लोहधातु तथा गिरिमृद्भव; ये सब नाम गेरू के कहे जाते हैं ॥ ११० ॥ वक्तव्य—गेरू पर्वतीय खानों से प्राप्त होनेवाली एक विशेष प्रकार की मृत्तिका है। यह लोहे की उपधातु मानी जाती है। क्योकि इसके सत्वपातन करने में लौह धातु प्राप्त होता है, अतः गेरू लौह का प्राकृत स्वरूप मानी जाती है। इसको साधारणतया हीमोटाइट (Heamatite) कहते हैं। इसका स्वर्णगैरिक भेद भारतवर्ष में अल्पमात्रा में पाया जाता है, किन्तु अमेरिका और जर्मन देशों में प्रचुरमात्रा में मिलता है। यह लौह का समास होने से रेड आयर्न औक्साइड (Red Iron Oxide) कहा जाता है। टाटा के कारखानो में इससे लोहा निकाला जाता है। गैरिकस्य द्वैविध्यम् गैरिकं तु समाख्यातं द्विविधं रसकोविदैः। पाषाणगैरिकं त्वाद्यं द्वितीयं स्वर्णगैरिकम् ॥ १११ ॥ भा.टी.—रसशास्त्रियों ने गेरू के दो भेद माने हैं, १—पाषाणगैरिक, २—स्वर्ण गैरिक ॥ १११ ॥ तयोः स्वरूपम् सुवर्णगैरिकं स्निग्धं मसृणं त्वतिकोमलम् । पाषाणगैरिकं रूक्षं कठिनं नातिलोहितम् ॥ ११२ ॥