रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशस्तरङ्गः ५८६ भवतीति । तस्मात् नात्युष्णमिति सयुक्तिको विरोधपरिहार उद्भावितो वाग्भटे । उत्कृष्टञ्च तत्—“गोमूत्रगन्धि कृष्णं गुग्गुल्वाभं विशर्करं मृत्स्नम् । स्निग्धमनम्ल- कषायं मृदु गुरु च शिलाजतु श्रेष्ठम्” इति कथितम् । इत्यलमत्राम्रेडितेन । शिला- स्वेदो बल्य इत्यादिना शिलाजतुविशेषगुणाः निगदव्याख्याताः ॥ ८५, ८६ ॥ भा.टी.—शिलाजीत बलकारक, शोथ, पाण्डुरोग, क्षय, श्वास, प्लीहावृद्धि, ज्वर, अग्निमान्द्य रोगों को मिटाती है । इसको अपस्मार, उन्माद, उदररोग, बवासीर और मूत्रकृच्छ्र रोगों में प्रयोग किया जाता है । इसके सेवन से वात- प्रकोप, शरीर की स्थूलता, उरःक्षत, हृदय रोग ( शूल ), प्रमेह, उदरशूल, उदरकृमि अत्यन्त बढ़ी हुई अश्मरी ( पथरी ), कुष्ठ रोग, वमन, गुल्म, भयन्- कर वातरक्त रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ८५, ८६ ॥ वक्तव्य—पथ्य भोजन के साथ उत्तम विधि से नियम पूर्वम शिलाजीत का सेवन करने से यह विशेष रूप से जत्रु के ऊर्ध्वभाग में व्याप्त प्रसाद संज्ञक वायु को नियमन करती है । यदि उक्तस्थान से वायु क्षीण हो गयी हो तो उसका पोषण करती है । शिलाजीत के सेवन से मूत्र में आनेवाला ओजस्राव ( अल- ब्यूमन ) अथवा ओजधातु का क्षय दूर हो जाता है । इसके द्वारा चेतनावाही नाड़ियों की दुर्बलता दूर हो जाती है अर्थात् शिलाजीत चेतनावाही नाड़ियों के लिए बल्य है । धमनियों में बढ़ी हुई क्रिया को प्रकृतिस्थ करने के लिए शिलाजीत अमोघ और सर्वोत्तम औषधि है । अतः अधिक रक्तभार के कारण बढ़ी हुई धमनीक्रिया को नियमन करने के लिए अर्थात् अधिक रक्तभार (Blood pressure) के कारण फैली हुई धमनियों को संकुचित कर उनको बल देने के लिए शिलाजीत के समान अन्य कोई औषधि नहीं है । अधिक रक्त दबाव के कारण उत्पन्न होनेवाले तीव्र शिरःशूल में जिसमें हृदयकम्पन ( पल- पिटेशन ), नेत्र पलकों में शोथ, जी मिचलाना तथा अग्निमान्द्य में यह शीघ्र ही लाभ पहुँचाती है । पित्ताशय में जमे हुए कण रूप में होनेवाले पित्त को शिला- जीत शीघ्र ही पतला करती और बाहर निकालती है । शिलाजीत सेवन से पित्ताशय शुद्ध होता है और पित्ताशय शोथ शान्त हो जाता है । अतएव शिलाजीत पित्त जमने के कारण होनेवाली पित्ताश्मरी को निकालने के लिए उत्तम द्रव्य है । शिलाजीत के सेवन से मधुमेह शान्त हो जाता है और मधुमेह का उपद्रव स्वरूप संन्यास ( मूर्च्छा ) रोग नष्ट होता है । इसी तरह शिलाजतु से कामला तथा वमन रोग भी दूर हो जाते हैं । शिलाजतु सेवन से वातिक