भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५६० रसतरङ्गिणी

संस्थान (Nervous system) की दुर्बलता, मानसिक शिथिलता, अधिक रक्तदबाव के कारण उत्पन्न भयंकर उन्माद, आक्षेप (कन्वल्शन्) युक्त मूर्च्छा (coma), अपस्मार, ताण्डववात और योषापस्मार रोग शान्त होते हैं। शिलाजीत के सेवन से स्वेद वाहिनियाँ विस्तृत हो जाती हैं, जिससे अधिक स्वेद आने लगता है। इसके द्वारा उदरच्छुदा कला तथा सन्धि आदि स्थानों की कला में सञ्चित जल शोषित हो जाता है। इसके द्वारा हृदय की वृद्धि (विस्तृति) कम हो जाती है और अच्छी तरह निद्रा आने लगती है। शिला- जीत सेवन करने पर सर्वांग की महाधमनी अथवा क्षुद्रधमनी (केशिका) विस्तृत हो जाती है। इसके सेवन से वृक्कों में उत्तेजना उत्पन्न होती है जिससे मूत्र अधिक मात्रा में आता है, अतः शिलाजतु मूत्रल, पित्तनिःसारक, प्रवृद्धरक्त- वेगहर और स्वेदल है। क्योंकि शिलाजतु सेवन से वृक्कों की क्षुद्रधमनियाँ विस्तृत हो जाती हैं, जिससे अधिक मात्रा में मूत्र आता है। इसी तरह शिला- जतु से यकृत् की क्षुद्र धमनियां विस्तृत होती हैं, जिससे यकृत् में सञ्चित पित्त अधिक मात्रा में निकलता है। इसी प्रकार सर्वाङ्गत्वचा की क्षुद्रधमनियों की विस्तृतिकारक होने से शिलाजतु से सर्वांग त्वक्जात शोथ में होनेवाला अधिक रक्तदबाव भी दूर हो जाता है। त्वक्गत क्षुद्र धमनियों को विस्तृत करने के कारण शिलाजीत अधिक मात्रा में स्वेद लाती है। धमनीगत अल्पशोथ के कारण रक्त के दबाव से क्षीण हुई धमनियों की स्थिति स्थापकता शक्ति को पुनः शीघ्र प्रकृतिस्थ करने के लिए शिलाजीत उत्तम औषधि है। शिलाजतु सेवन से कामला रोग में उपद्रवस्वरूप कण्डूति (कण्डू) भी नष्ट हो जाती है। शिला- जतु में धमनी तथा मांसपेशियों के लिए स्थितिस्थापक गुण होने के कारण ही शिलाजीत हृदय आदि शारीरिक यन्त्रों की नष्ट हुई स्वाभाविक क्रियाओं को पुनः प्राप्त करने के लिए तथा इन्हीं अंगों की बढ़ी हुई स्वाभाविक क्रियाओं को नियमित करने के लिए सर्वोत्तम औषधि मानी गयी है। शिलाजीत सेवन करने से मूत्राशय में शोथ तथा रक्त सञ्चय के कारण होनेवाले मूत्राशय स्राव अर्थात् अधिक मूत्रप्रवृत्ति नष्ट हो जाती है। शिलाजीत के सेवन से मूत्र की प्रतिक्रिया (Reaction) में कोई परि- वर्तन नहीं होता और न मूत्र की गन्ध तथा वर्ण में कोई परिवर्तन होता है ! किन्तु इसके सेवन करने से चौबीस घण्टे में होनेवाले कुल मूत्र की मात्रा में वृद्धि हो जाती है अर्थात् जहाँ स्वभावतः चौबीस घण्टे में मनुष्य को सवा सेर से लेकर डेढ़ सेर तक मूत्र आता है वहाँ शिलाजीत से दो सेर तक मूत्र की मात्रा