भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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द्वाविंशस्तरङ्गः ५८१ सीसोन्मितं सुविमलं सूतं सीसे तु विद्रुते । निक्षिप्य द्रुतमादाय खल्वे सम्पेपयेद् दृढम् ॥ ५५ ॥ श्लक्ष्णचूर्णं ततो ज्ञात्वा द्वयोर्द्विगुणमञ्जनम् । सौवीरं विमलं दत्त्वा पेषयेद्दिनसप्तकम् ॥ ५६ ॥ माषकत्रितयं चन्द्रं दत्त्वाथ परिपेषयेत् । कुप्यां न्यसेन्मतमिदं तिमिरापहमञ्जनम् ॥ ५७ ॥ तोलकैकमितं सीसकमिति शार्ङ्गधरादौ प्रत्यञ्जननाम्ना व्यवहृतम् । चन्द्रं कर्पूरम् ॥ ५४–५७ ॥ भा.टो.—एक तोला शुद्ध सीसे को एक लम्बे वेंटवाली लोहे की करछी में डालकर उस करछी को जलते हुए कोयलों की अँगेठी पर रखकर तीव्र अग्नि देते हुए पिघलावें । जब सीसा पिघल जाय तो उसमें एक तोला शुद्ध पारद डालकर शीघ्र ही करछी को खरल में उलट कर मूसली से खूब अच्छी तरह मर्दन करके बारीक चूर्ण बना लें । अब इस चूर्ण में चार तोला शुद्ध सौवीरा- ञ्जन ( काला सुरमा ) मिलाकर सात दिन की रगड़ाई करके अन्त में तीन मासे कपूर ( भीमसेनी ) डालकर अच्छी तरह मिलाकर शीशी में भरकर डाट बन्द करके रख लें । इस अञ्जन को कुछ काल निरन्तर नेत्रों में आँजने से तिमिर रोग नष्ट होता है ॥ ५४, ५७ ॥ तुहिनाञ्जनम् सोरकं तोलकार्द्धन्तु घनसारञ्च तन्मितम् । पलैकं खलु सौवीरं दत्त्वा सम्पेपयेद् भृशम् ॥ ५८ ॥ निदध्यात्काचकूप्यान्तु नाम्नेदं तुहिनाञ्जनम् । कण्डूदाहपरिस्रावहरं परमुदीरितम् ॥ ५६ ॥ भा.टी.—उत्तम सोरा आधा तोला, कपूर आधा तोला और शुद्ध सौवी- राञ्जन एक पल लेकर तीनों को एकत्र खरल में खूब अच्छी तरह घोटकर बारीक अञ्जन बनाकर काँच की शीशी में रख लें । इसको शीत अञ्जन कहते हैं, क्योंकि यह नेत्रों के लिए अत्यन्त ठंडा होने से बहुत लाभदायक होता है । इसके अतिरिक्त इस अञ्जन को कण्डू, दाह तथा स्रावयुक्त नेत्रों में भी पूर्ण रूप से व्यवहार करना चाहिए ॥ ५८–५६ ॥ अथ शिलाजतुनामानि शिलाजतु च शैलेयं शिलाजं शैलधातुजम् ।