रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८२ रसतरङ्गिणी शिलामयः शिलास्वेदः शिलानिर्यास इत्यपि ॥ ६० ॥ अश्मजं त्वश्मजतु कं गिरिजं त्वद्रिजं तथा । अश्मोत्थमश्मलाक्षा च गैरेयञ्च मतन्तु तत् ॥ ६१ ॥ भा.टी.—शिलाजतु, शैलेय, शिलाज, शैलधातुज, शिलामय, शिला- स्वेद, शिलानिर्यास, अश्मज, अश्मजतु क, गिरिज, अद्रिज, अश्मोत्थ, अश्म- लाक्षा और गैरेय, ये नाम शिलाजीत के कहे जाते हैं ॥ ६०, ६१ ॥ शिलाजतुपरिचयः सूर्य्यसन्तापसन्तप्ताः शिलाः शैलाधिपस्य यद् । गोढं मुञ्चन्ति निर्यासं तच्छिलाजतु कीर्त्तितम् ॥६२॥ शैलाधिपशिलासारो निर्गतो रवितापतः । शुष्कः सन्मूर्त्ततां यातः शिलाजतु निगद्यते ॥६३॥ भा.टी.-जब ज्येष्ठ वैशाख की तीव्र सूर्य की किरणों से हिमालय की शिला (चट्टान) गरम हो जाती हैं और उनमें होनेवाला रस पिघलकर बाहर आकर जमने लगता है उसे शिलाजीत कहते हैं । अथवा हिमालय की शिलाओं का सार सूर्य के ताप से चू करके बाहर आ जाता है और सूख करके काला कोल- तार-सा हो जाता है उसे शिलाजीत कहते हैं ॥ ६२, ६३ ॥ वक्तव्य—यह देखने में कोलतार ( अलकतरा ) के समान काला और गाढ़ा-सा द्रव होता है । सूखने पर चमकीला और भङ्गुर हो जाता है। यह जल में घुल जाता है और तारों को छोड़ता है । अलकोहल, क्लोरोफार्म तथा ईथर में नहीं घुलता है । रासायनिक प्रतिक्रिया में उदासीन रहता है । शिलाजतु विश्लेषण—शुद्ध शिलाजतु के विश्लेषण करने से उसमें जल ६.५%, ऐन्द्रियिक द्रव्य ३६.२०%, पार्थिव द्रव्य ३४.६५%, ( Nitrogenous matters ) १.३%, चूना, ७.८०%, अभ्रक ( Mica ) १.३५%, मात्रा में पाये जाते हैं । सम्भवतः इन्हीं तत्वों की उपस्थिति के कारण शिलाजतु त्रिदोष- नाशक स्थिर किया गया हो । यह प्रायः सभी रोगों में लाभदायक होता है । कहा गया है—"न सोऽस्ति रोगों भुवि मानवानां शिलाजतु यन्न जयेत्प्रसह्य।" आज-कल शिलाजीत काश्मीर, गढ़वाल, बागेश्वर ( अल्मोड़ा ), भूटान, तिब्बत और गिलगित आदि पर्वतीय स्थानों से प्राप्त होता है । इसको वहाँ के लोग छोटे-छोटे खण्डों में एकत्र करके भेजते हैं । कोई शिलाजीत को खनिज तैल मिनरल आयल ( Mineral oil )