भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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द्वविंशस्तरङ्गः ५८३ का यौगिक मानते हैं। सम्भव है कि इसी कारण उनके विचारों में शिलाजीत को अग्नि पर नहीं तपाना चाहिये। क्योंकि इसमें पैट्रोल की जाति का तैल होने से यह शीघ्र उड़नशील है और अग्निपरीक्षा में निर्धूम जलता है और पानी में तैरता है। परन्तु आयुर्वेद के रसग्रन्थों में इसकी भस्म करने को लिखा है। आधुनिक चिकित्सकों ने इसमें मिनरल आयल पाया है, अतः वे लोग भी शिलाजतु को क्षय रोग में व्यवहृत होता हुआ देखकर पेट्रोलियम इमल्शन (Petroleum Imullion) का क्षय रोग में व्यवहार करने लगे हैं। परन्तु आजकल शिलाजीत के विषय में बहुत ठगी चल पड़ी है, इसका पूरा ध्यान रखकर ही शिलाजीत का व्यवहार होना चाहिए। शिलाजतुभेदाः सौवर्णं राजतं ताम्रं लौहञ्चेति विभेदतः। शिलाजतु समाख्यातं भिषग्भिस्तु चतुर्विधम् ॥ ६४ ॥ शिलाजतुभेदाः सौवर्णादयः। उक्तं हि प्राचीनैः—"सौवर्णं राजतं ताम्रमा- यसञ्च चतुर्विधम्। शिलाजतु हि विज्ञेयं तत्तल्लिङ्गललक्षितम्" इति ॥६४॥ भा.टी.—स्वर्णगर्भ शिलाजतु, रजतगर्भ शिलाजतु, ताम्रगर्भ शिलाजतु, लौहगर्भ शिलाजतु, इस तरह स्वर्ण आदि धातुयुक्त पत्थरों से प्राप्त होने के कारण शिलाजीत के चार भेद पाये जाते हैं ॥६४॥ तेषां रूपाणि शिशिरं मधुरं तिक्तं कटुकं कटुपाकि च। जटाकुसुमसदृशां सौवर्णं शैलधातुजम् ॥ ६५ ॥ शिशिरं पाण्डुरं तिक्तं स्वादुपाकि च राजतम्। तिक्तोष्णनीदणं नालाभं ताम्रं गिरिजमीरितम् ॥ ६६ ॥ तिक्तं सलवणं कृष्णं विपाके कटुशीतलम्। गुरु स्निग्धं कषायञ्च सर्वश्रेष्ठं तदायसम् ॥ ६७॥ सौवर्णं वातपित्तघ्नं राजतं श्लेष्मपित्तहृत्। कफघ्नं ताम्रजं ज्ञेयं त्रिदोषहरमायसम् ॥ ६८ ॥ तेषां रूपाणि—शिशिरं मधुरं तिक्तमित्यादिना। उक्तं हि—"सौवर्णन्तु जपापुष्पवर्णं भवति शैलजम्। मधुरं कटुतिक्तञ्च शीतलं कटुपाकि च" इति। तथा शिशिरं पाण्डुरं तिक्तं राजतमिति। तथा चोक्तम्—"राजतं पाण्डुरं शीतं कटुकं स्वादुपाकि च" इति। तिक्तोष्णादिगुणं ताम्रम्। यथाहूः—"ताम्रं मयूर-