भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५८० रस्तरङ्गिणी भा.टी.—पीतल धातु को पिघलाने पर जब पीतल में होनेवाला यशद ( जस्ता ) पिघल कर ओषजन से मिलकर श्वेत चूर्ण काला रूप धारण कर लेता है तो इसी यशद के श्वेत चूर्ण को पुष्पांजन कहा जाता है । अथवा केवल यशद को एक लोहपात्र अथवा मिट्टी के पात्र में रखकर तेज अग्नि से तपाने पर भी यह यशदपुष्प बन जाता है ॥ ४६, ५० ॥ वक्तव्य—उक्त विधि से प्राप्त यशदपुष्प केवल अञ्जनप्रयोग में विशेषरूप से व्यवहार में आने के कारण पुष्पांजन कहा जाता है । वास्तव में यह (.Zinc Oxide ) होता है । अञ्जन के अतिरिक्त यह बाह्य प्रयोग में काम आता है । पुष्पाञ्जनस्य गुणाः पुष्पाञ्जनं तु शिशिरं स्निग्धं पित्तव्रणाशनम् । अभिष्यन्दप्रशमनं परं दाहविनाशनम् ॥५१॥ विचर्चिकादित्वग्दोषशमनं व्रणरोपणम् । समाख्यातं विशेषेण हिक्कापञ्चकनाशनम् ॥५२॥ भा.टी.—पुष्पांजन—शिशिर, स्निग्ध और पित्तप्रकोपनाशक है । इसके बाह्य प्रयोग से अभिष्यन्द (नेत्ररोग ) तथा नेत्रपलकों की दाह शान्त हो जाती है । विचर्चिका आदि त्वक्रोगों में इसके योग लगाये जाते हैं। व्रणों को भरने के लिए इसके व्रणरोपक लेप लगाये जाते हैं। इसको प्राचीन पुस्तकों में विशेषरूप से हिक्कानाशक गुणवाला लिखा है ॥ ५१, ५२ ॥ अञ्जनत्रितयस्य बाह्यप्रयोगः अञ्जनद्वितयं पुष्पाञ्जनेन सहितं तु वा । यशदेनाग्निदग्धेन ह्यभिष्यन्दहरं परम् ॥५३॥ भा.टी.—स्रोतोञ्जन, सौवीराञ्जन के साथ यदि यशद को अग्नि पर रख कर बनाये हुए उसके फूले ( पुष्पांजन ) के साथ मिला दिया जाय तो इसे अञ्जनत्रितय कहा जाता है । यह अञ्जनत्रितय बाह्य प्रयोग में नेत्राभिष्यन्द रोगों में अत्यन्त लाभदायक है ॥ ५३ ॥ तिमिरहराञ्जनम् तोलकैककमितं सीसं विशुद्धं दर्विकागतम् । हसन्तिकायां विन्यस्य गालयेत्प्रखराग्निना ॥५४॥

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