भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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द्वाविंशस्तरङ्गः ५७६ तथा रोपण करता है, इसके सेवन से मासिक धर्म रुक जाता है और रक्तप्रदर में होनेवाला रक्तस्राव भी बन्द हो जाता है ॥ ४५, ४६ ॥ आभ्यन्तरप्रयोगे स्रोतस्सौवीराञ्जनयोर्मात्रा गुञ्जार्धतः समारभ्य गुञ्जैकमितमञ्जनम् । दिनद्वयं त्रयं वापि प्रयुञ्जीत भिषग्वरः ॥४७॥ अञ्जनद्वितयं रक्तप्रदरे तु दिनत्रयात् । अधिकं नोपयुञ्जीत रसतन्त्रविशारदः ॥४८॥ अधिकं नोपयुञ्जीतेति अधिकोऽनयोः प्रयोगो वन्ध्यात्वव्यापत्कर इत्यवधेयम् । अञ्जनं ह्यवयवेषु सञ्चितं भवति नैरन्तर्येणोपयुक्तं नानांशसाहचर्याच्चामृतनागजां- श्चोपद्रवान् सञ्जनयति ॥ ४७, ४८ ॥ भा.टी.—उक्त दोनों प्रकार के अञ्जनों में से यदि किसी का आभ्यन्तर प्रयोग करना हो तो आधी रत्ती से लेकर एक रत्ती तक की मात्रा में प्रयोग कर सकते हैं । इन दोनों को यदि रक्तप्रदर के रक्तस्राव को बन्द करने के लिए देना हो तो तीन दिन से अधिक दिन तक इसका सेवन नहीं करना चाहिए ॥४७, ४८॥ वक्तव्य—यह पहिले बताया गया था कि अञ्जन नागधातु का मूल खनिज है । अतः इसमें सीसक का होना स्वाभाविक है । इस सीसक के कारण ही यह ग्राही प्रभाव रखता है । यदि इसको कुछ काल तक निरन्तर सेवन कराया जाय तो अञ्जनगत नाग शरीर में विशेषतः आँतों में सञ्चित हो जाता है, जिससे कालान्तर में अशुद्ध और अमृत नाग के उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं और स्त्री को प्रदर शान्ति के लिए अधिक दिन तक सेवन कराने से गर्भाशय संकोच और डिम्बग्रन्थि संकोच होने से उनमें गर्भधारण और उत्पादन की शक्ति नहीं रहती है । कथंचित् गर्भाशयप्राप्त शुक्र को और जीवाणु को भी यह गर्भाशय में जीवित नहीं रहने देता है, क्योंकि यह गर्भाशय में संचित होता है । अथ पुष्पाञ्जनस्य परिचयः रीतिकाद्रावणविधौ रीतिस्थं यशदं द्रुतम् । समेत्यम्बरपीयूषयोगेन सितचूर्णिताम् ॥४९॥ तदेव सितचूर्णन्तु पुष्पाञ्जनमुदीरितम् । भस्त्राध्मातं पुष्पितं तु यशदं वा तदाह्वयम् ॥५०॥ पुष्पाञ्जनपरिचयो गुणाश्च निगदव्याख्याताः, अग्नियोगात् पुष्पितस्य यश- दस्य पुष्पाञ्जनं नामेति । रीतिका पित्तलम् ॥ ४६, ५० ॥