भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५६४ रसतरङ्गिणी वस्ति, तथा वातकुण्डलिक्रा (मूत्ररोग) रोगों में शिलाजीत को दशमूल कषाय में खाँड मिलाकर उसके साथ सेवन करना चाहिए। शिलाजतु को वरुणादि क्वाथ के अनुपान से सेवन करने पर मूत्राघात (मूत्र रुकना) तथा पथरी रोग में लाभ होता है। मूत्राघात तथा मूत्रकृच्छ्र में शिलाजीत को अमृतादि क्वाथ अनु- पान से सेवन कराया जाता है। शिलाजीत में खाँड और कपूर मिलाकर सेवन करने से मूत्रातीत और मूत्र जठर रोगों में आराम आता है। शिलाजीत को गोखुरूक्वाथ के साथ सेवन करने से शीघ्र ही सब प्रकार के मूत्रकृच्छ्र नष्ट हो जाते हैं। त्रिफला क्वाथ से शुद्ध किये हुए शिलाजीत को यदि काकोल्यादि गणों के साथ सेवन किया जाय तो शरीर में वीर्य की वृद्धि होती है। राजयक्ष्मा में शिला- जीत को लोहभस्म, स्वर्णमाक्षिकभस्म, घी, शहद, हरीतकीचूर्ण, वायविडंगचूर्ण में मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है। वीरतरु आदि गणोक्तद्रव्यों के क्वाथ के साथ शिलाजीत का सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र आदि सब रोगों में आराम आता है। प्रमेह जन्य कष्ट को दूर करने के लिए शिलाजतु को प्रातः काल खाँड और दूध के साथ सेवन कराना चाहिए। शिलाजतु में शुद्ध गूगल, सोंठ, पिप्पली- चूर्ण मिलाकर गोमूत्र अनुपान से सेवन करने पर शीघ्र ही तीव्र प्रकार का ऊरु- स्तम्भ रोग शांत होने लगता है। शिलाजीत को लोहभस्म तथा स्वर्णमाक्षिक भस्म के साथ मिलाकर सेवन करने से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है। शिलाजीत को अर्जुनत्वक् क्वाथ अनुपान से दो मास तक निरन्तर सेवन करने से हृदय रोग में लाभ होता है। शरीर की स्थूलता को कम करने के लिए शिलाजीत को अग्निमन्थ (अरणी) के स्वरस के साथ निरन्तर दो मास तक सेवन कराना चाहिए। शुद्ध शिलाजीत को शालसारादि गणोक्त द्रव्यों के क्वाथ की इक्कीस भावना देकर तैयार कर लें। अब इस शिलाजीत को शाल- सारादिगणोक्त द्रव्यों के क्वाथ के साथ ही निरन्तर दो मास तक सेवन करायें तो बहुत पुराना मधुमेह, अश्मरी तथा मूत्रशर्करा रोग में शीघ्र आराम आ जाता है। प्रमेहरोग में शिलाजीत को पिप्पली, पाषाणभेद, इलायचीबीजचूर्ण के साथ मिलाकर चावलों के धोवन के साथ सेवन कराना चाहिए। मूत्राघात और मूत्रकृच्छ्र में शिलाजतु को इलायचीबीजचूर्णा तथा पिप्पलीचूर्णा के साथ मिला- कर सेवन कराना चाहिए। शिलाजीत को कपूर के साथ शुष्करूप में पीसकर तत्काल होनेवाले छुरी या चाकू आदि के घाव में भर देने से वह घाव बिना पके ही भर जाता है। कुम्भकामला रोग में शिलाजतु को हरिद्राचूर्ण में