भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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मिलाकर गोमूत्र अनुपान से सेवन कराने पर आराम आता है। शिलाजीत में लोहभस्म और स्वर्णभस्म मिलाकर सर्जक (राल) द्रव (क्वाथ) से सात भावना देकर रखलें। अब इसमें से एक रत्ती की मात्रा में कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से मसूरिकाज्वर, स्फोटज्वर तथा तथा शोणकायज्वर (Scarlet Fever) शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ८८-१०६ ॥ वक्तव्य—शिलाजतु का सेवन सामान्य और विशेष रूपसे किया जाता है। सामान्य रूप से सेवन करने में विशेषरूप से पथ्यादि की आवश्यकता नहीं होती है। परन्तु विशेषरूप से (रासायनिक गुण प्राप्त करने के लिए) सेवन करने पर शिलाजीत सेवन करने के बाद द्विगुण समय तक रोगी को पथ्यपूर्वक ही रखना चाहिए और अपथ्य पदार्थों का त्याग करना चाहिए। अथ गैरिकस्य नामानि गैरिकं त्वथ गैरेयं, गिरिमृद् गिरिमृत्तिका। रक्तधातुर्लोहधातुस्तदेव गिरिमृद्भवम् ॥ ११० ॥ भा.टी.—गैरिक, गैरेय, गिरिमृद, गिरिमृत्तिका, रक्तधातु, लोहधातु तथा गिरिमृद्भव; ये सब नाम गेरू के कहे जाते हैं ॥ ११० ॥ वक्तव्य—गेरू पर्वतीय खानों से प्राप्त होनेवाली एक विशेष प्रकार की मृत्तिका है। यह लोहे की उपधातु मानी जाती है। क्योकि इसके सत्वपातन करने में लौह धातु प्राप्त होता है, अतः गेरू लौह का प्राकृत स्वरूप मानी जाती है। इसको साधारणतया हीमोटाइट (Heamatite) कहते हैं। इसका स्वर्णगैरिक भेद भारतवर्ष में अल्पमात्रा में पाया जाता है, किन्तु अमेरिका और जर्मन देशों में प्रचुरमात्रा में मिलता है। यह लौह का समास होने से रेड आयर्न औक्साइड (Red Iron Oxide) कहा जाता है। टाटा के कारखानो में इससे लोहा निकाला जाता है। गैरिकस्य द्वैविध्यम् गैरिकं तु समाख्यातं द्विविधं रसकोविदैः। पाषाणगैरिकं त्वाद्यं द्वितीयं स्वर्णगैरिकम् ॥ १११ ॥ भा.टी.—रसशास्त्रियों ने गेरू के दो भेद माने हैं, १—पाषाणगैरिक, २—स्वर्ण गैरिक ॥ १११ ॥ तयोः स्वरूपम् सुवर्णगैरिकं स्निग्धं मसृणं त्वतिकोमलम् । पाषाणगैरिकं रूक्षं कठिनं नातिलोहितम् ॥ ११२ ॥