भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५६६ रसतरङ्गिणी पाषाणगैरिकात् श्रेष्ठं कथितं स्वर्णगैरिकम् । अतः सर्वत्र मतिमान् योजयेत्स्वर्णगैरिकम् ॥ ११३ ॥ अथ गैरिकनामानि तन्त्रव्यवहृतानि । तच्च द्विविधं पाषाणगैरिकं स्वर्णगै- रिकञ्चेति । तद् गव्यपयसा भावितं गोघृतभृष्टं वा शुद्धयति ॥ ११२-११३ ॥ भा. टी.—उक्त दोनों में से स्वर्णगैरिक स्निग्ध (चिकना) मसृण (चम- कीला) अत्यन्त कोमल होता है । किन्तु पाषाण गैरिक रूक्ष, कठिन और साधारण लाल वर्ण का होता है । पाषाण गैरिक की अपेक्षा स्वर्णगैरिक श्रेष्ठ माना जाता है, अतः वैद्य को गैरिक प्रयोग में सर्वत्र स्वर्णगैरिक ही लेना चाहिये ॥ ११२, ११३ ॥ गैरिकशोधनस्य प्रथमः प्रकारः सुवर्णगैरिकं खल्वे चूर्णीकृत्य ततः परम् । भावितं गव्यपयसा शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ११४ ॥ भा.टी.—सोनागेरू को खरल में डालकर चूर्ण कर लें, तब इसमें ताजा गोदूध डालकर घोंटकर सुखा लें तो गेरू शुद्ध हो जाती है ॥ ११४ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः गव्याज्येन तु सम्भृष्टं यत्नतो मन्दवह्निना । सुवर्णगैरिकं शीघ्रं शुद्धिमाप्नोत्यसंशयम् ॥ ११५ ॥ भा.टी.—अथवा सोनागेरू के सूक्ष्म चूर्ण को कड़ाही में डालकर थोड़ा-सा गोघृत के साथ भून लें तो वह उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाता है ॥ ११५ ॥ शुद्धस्वर्णगैरिकस्य गुणाः सुवर्णगैरिकं स्निग्धं मधुरं शिशिरं परम् । तुवरं तापहरणं हिक्कावमिनिवारणम् ॥ ११६ । रक्तपित्तप्रशमनं तथासृग्दरनाशनम् । विषापहं तथा बल्यं मतं लोचनयोर्हितम् ॥ ११७ ॥ उदर्दकण्डूशमनं तथैव व्रणरोपणम् । ज्वरघ्नं च विशेषेण वह्निदीप्तिविवर्धनम् ॥ ११८ ॥ भा.टी.—शुद्धस्वर्णगैरिक स्निग्ध, मधुररस, अत्यन्त शीत, तुवर (कसैला), गर्मी को कम करनेवाला, हिक्का-वमन नाशक होता है । इसको रक्तपित्त तथा रक्तप्रदर में देने से शीघ्र लाभ होता है । बाह्याभ्यन्तर विविध विषों के प्रभाव को नष्ट करता है। कुछ काल तक सेवन करने से लोहांश के कारण बलप्रद है नेत्ररोग