रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८६ रसतरङ्गिणी मलाई को चौथे पात्र में डाल दें। इस प्रकार शिलाजतुजल युक्त पात्रों में से तब तक मलाई के रूप में जमी हुई शिलाजीत को निकालते रहें जब तक कि वह जल स्वच्छ वर्ण का न हो जाय और सारा पत्थर रेत मिट्टी आदि पात्र के तल में बैठ जाय। इस प्रकार अन्त में पूर्ण सावधानी के साथ स्वच्छ जल के ऊपर आयी हुई विशुद्ध शिलाजतु को एक स्वच्छपात्र में एकत्र कर लें। इस विधि से शिलाजतु उत्तम प्रकार से शुद्ध हो जाती है। इसको निःशंक होकर योगों में काम ला सकते हैं ॥ ६६-७८ ॥ वक्तव्य-जिन पात्रों में शिलाजीत का जल पड़ा हुआ हो उनको हिलाना- डुलाना नहीं चाहिए। अन्यथा न ऊपर के भाग में मलाई आयेगी और न नीचे रेत आदि पदार्थ ही बैठ सकेंगे। पात्र के ऊपर धूल आदि न पड़ने पावें। इस लिए पात्र के मुख पर सीसा रख देना चाहिए अथवा बहुत बारीक और साफ कपड़ा से ढकना चाहिए। मलाई को निकालते हुए सावधानी रखनी चाहिए जिससे उसके नीचे के जल में बहुत कम्पन न होने पावे। प्रक्षेपक्वाथमानम् शिलाजतुसमं क्वाथः जलमष्टगुणं ततः। पर्दाशशेषितः क्वाथ शिलामयविशुद्धये ॥७६॥ भा.टी.-शिलाजीत की शुद्धि के लिए जिस औषधि का क्वाथ काम में लाना हो उसे शोधनीय शिलाजीत के समभाग लेकर उसमें आठ गुणा जल डालकर पकायें, जब पकते-पकते जल चतुर्थांश रह जाय तो उसे छानकर शिलाजीत शोधन के काम में लाना चाहिए ॥ ७६ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः निरुक्तेनैव विधिना क्वाथस्थाने तु गोजलम्। दत्त्वाहृता शिलालाक्षा शुद्धिमायात्यसंशयम् ॥८०॥ भा.टी.-यदि शिलाजीत शोधन में (त्रिफला) कषाय के स्थान पर गोमूत्र (ताजा और साफ) डालकर धूप में रख के शिलाजीत की मलाई जमा ली जाय तो इससे भी शिलाजीत निःसन्देह शुद्ध हो जाती है ॥ ८० ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः पूर्वोक्तेनैव मार्गेण क्वाथे भृङ्गोत्थितं रसम्। दत्वा हृतः शिलास्वेदः परां शुद्धिंमवाप्नुयात् ॥८१॥ भा.टी.-यदि त्रिफला कषाय के स्थान पर भाँगरे का स्वच्छ साफ स्वरस