भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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द्वाविंशस्तरङ्गः ५८७ डालकर धूप में सुखाकर शिलाजीत की मलाई निकाल ली जाय तो भी शिलाजीत शुद्ध हो जाती है ॥८१॥ वक्तव्य—शिलाजीत को विशेष रूप से वातहर, पित्तहर तथा कफहर बनाने के लिए इसे सामान्य शोधन के अनन्तर वात, पित्त और कफ नाशक गणों की औषधियों के पृथक्-पृथक् क्वाथ, अथवा सम्पूर्ण वातहर या पित्तहर अथवा कफ नाशक वर्ग के कषाय की भावना देकर विशेष रूप से शिलाजीत को बनाया जा सकता है। इस विधि से तैयार की हुई शिलाजीत अधिक शक्तिशाली हो जाती है और रोगों को (वातादि प्रकोपजन्य) शीघ्र ही शान्त करनेवाली हो जाती है। शिलाजीत को विशेष शक्तिशाली बनाने के लिए पहिले सामान्य विधि से अर्थात् त्रिफला कषाय, गोमूत्र अथवा भाँगरे के कषाय स्वरस से शुद्ध करना चाहिए। इसके बाद जब उसमें मैल अथवा रेत बालु आदि का अंश न रहे तो फिर उसमें वातादि नाशक औषधियों का कषाय डालकर धूप में रख सुखा लेना चाहिए। जब पूर्व क्वाथ सूख जाय तो पुनः दूसरा क्वाथ उसमें डालकर धूप में रखकर सुखा लेना चाहिए। कई फार्मेसीवाले शिलाजीत को गरम पानी या गोमूत्र में घोलकर छान लेते हैं, फिर उसे अग्नि पर चढ़ा कर गाढ़ा कर लेते हैं और अग्नितापी शिला- जीत के नाम से व्यवहार करते हैं। परन्तु इस विधि से बनायी हुई शिलाजीत में बालुका, रेत, मिट्टी आदि का अंश रहने से यह उत्तम नहीं है। विशुद्धशिलाजतुनः परीक्षणम् याङ्गारसंस्था निर्धूमा पक्वा लिङ्गोपमा भवेत् । आस्वादे कटुतिक्ता च शिनालाक्षा तु साऽमला ॥८२॥ शुद्धशिलाजतुपरीक्षां याऽङ्गारसंस्थेत्यादिना। यथाहुः—“वह्नौ क्षिप्तन्तु निर्धूमं पक्वं लिङ्गोपमं भवेत्। तृणाग्रेणाम्भसि क्षिप्तमधो गलति तन्तुवत् ॥ गोमूत्रगन्धि मलिनं शुद्धं ज्ञेयं शिलाजतु”॥ इति। सामलेत्यत्र सा अमला इति च्छेदः ॥८२॥ भा.टी.—जिस शिलाजीत (शुद्ध) को जलते हुए कोयलों के ऊपर रखने से धुंआ न उठे, किन्तु भुत-भुत करके पकती हुई शिलाजीत लिंगाकार हो जाय, इसके साथ ही यदि उसे जिह्वा पर रखें तो उसमें कटु और तिक्त (कडुवा) स्वाद मालूम होता हो तो उसे शुद्ध (असली) शिलाजीत समझना चाहिए ॥८२॥