भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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द्वाविंशस्तरङ्गः ५७५ द्वितीयो मारणप्रकारः तुल्यरक्तान्वितं निम्बूकस्याम्भसा सूक्ष्मपत्रीकृतं कांस्यकं पेषयेत् । शोषितं त्रिपुटैत् सम्पुटस्थं ततो घोषपुष्पं तदा पञ्चतां यात्यलम् ॥३०॥ भा.टी.—शुद्ध कांसे का चूर्ण और शुद्ध हिंगुल को समभाग में लेकर खरल में नींबू के रस से अच्छी तरह मर्दन कर धूप में सुखा लें । अब इसको एक सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार तीन गजपुट देने से कांसे की भस्म हो जाती है ॥ ३० ॥ तृतीयो मारणप्रकारः कांस्यं तुल्यं शिलागन्धयुतं कन्याम्बुपेषितम् । पुटेत् त्रिधैवं यत्नेन भस्म स्यात् कज्जलप्रभम् ॥ ३१ ॥ भा.टी.—उत्तम शुद्ध काँसे के सूक्ष्म पत्र अथवा चूर्ण में समभाग शुद्ध मैनसिल और शुद्ध गन्धक मिला घीकुआर के रस से अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें । अब इसको सम्पुट में बन्द कर गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार मैनसिल तथा गन्धक के साथ तीन गजपुट देने से काँसे की काजल के सदृश काले रंग की भस्म हो जाती है ॥ ३१ ॥ मृतकांस्यस्य गुणाः घोषपुष्पं तु तुवरं तिक्तोष्णं लेखने हितम् । नेत्रप्रसादनं रूक्षं सरं च विशदं परम् ॥३२॥ क्रिमिघ्नं कुष्ठशमनं कफपित्तप्रणाशनम् । वातघ्नं दीपनञ्चैव परमेतत्प्रकीर्तितम् ॥३३॥ कांस्यं तुवरादिगुणम् । प्रयोगादयश्चास्य ताम्रवदेवेति । अपि च—"घृतवर्जं बुधैः सर्वं पाच्यं कांस्यस्य पात्रके । भोजनन्तु प्रशस्तं स्याद् रीतिका मध्यमा स्मृता ॥" इत्यप्याहुः प्राज्ञाः ॥ ३२, ३३ ॥ भा.टी.—कांसे की भस्म तुवर (कषाय) और तिक्तरस, उष्ण और लेखन गुण युक्त होती है । इसके प्रयोग से नेत्र स्वच्छ होते हैं । यह रूक्ष, सर और विशद गुणयुक्त होती है । इसके सेवन से उदरक्रिमि और कुष्ठ रोग नष्ट होते हैं । यह कफ, पित्त तथा वातनाशक और उत्तम दीपक होती है ॥३२, ३३॥ मृतकांस्यस्य प्रयोगादयः कांस्यकस्य प्रयोगस्तु रविलोहसमो मतः । गुञ्जार्द्धतश्च गुञ्जैकमिता मात्रा प्रयुज्यते ॥३४॥