रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५७४ रसतरङ्गिणी भा.टी.—जो काँसा बजाने पर अच्छा शब्द करता हो, चमकीला, स्निग्ध (चिकना स्पर्श), श्वेतवर्ण, कोमल, स्वच्छ हो और तीव्र अग्नि तथा हथौड़े की चोट को सहन करनेवाला हो उसे औषधि कार्य में ग्रहण करना चाहिए ॥२४॥ हेयकांस्यस्य स्वरूपम् निरुज्ज्वलं खरं रूक्षं पीतं दहनतापितम् । आताम्रं मन्दनादञ्च कांस्यं हेयमुदीरितम् ॥ २५ ॥ भा.टी.—मैला (देखने में), खुरदरा, रूक्ष, पीतवर्ण, आग में तपाने पर ताँबे के सदृश हो जानेवाला, मन्द आवाज का काँसा औषधि कर्म में ग्रहण नहीं करना चाहिये ॥ २५ ॥ कांस्यशोधनस्य प्रथमः प्रकारः तनुपत्रीकृतं कांस्यं वह्निसन्तापितं भृशम् । निर्वापितं गव्यमूत्रे सप्तधा शुद्धिमाप्नुयात् ॥ २६ ॥ भा.टी.—काँसे के पतले-पतले पत्र बनाकर उनको अग्नि में तपायें, जब लाल वर्ण के हो जायँ तो गोमूत्र में बुझा दें। इस प्रकार सात बार गोमूत्र में बुझाने से काँसे की शुद्धि हो जाती है ॥ २६ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः सूक्ष्मपत्रीकृतं घोषपुष्पाह्वयं मूत्रपट्वन्वितं स्थालिकायां न्यसेत् । यामसम्पाचितं तीक्ष्णतीक्ष्णाग्निना सर्वदोषोज्झितं जायते सत्वरम् ॥ भा.टी.—उत्तम काँसे को रेती से रेत कर सूक्ष्म चूर्ण बना लें। अब इस चूर्ण को एक हाँडी में डालकर उसमें गोमूत्र और सेन्धानमक भी डाल दें। इस हाँडी को चूल्हे पर रखकर एक पहर तक अग्नि से पकायें तो काँसा शीघ्र ही सर्व दोषरहित हो जाता है ॥२७॥ कांस्यमारणस्य प्रथमः प्रकारः तनुपत्रीकृतं कांस्यं समगन्धसमन्वितम् । अर्कक्षीरेण सम्पेष्य शोषयेदातपे दृढम् ॥२८॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा वारणाख्ये पुटे पुटेत् । एवं पुटत्रयात्कांस्यभस्म स्यात्सुमनोहरम् ॥ २९ ॥ भा.टी.—शुद्ध काँसे के अति सूक्ष्म पत्र बनाकर उसमें समभाग शुद्ध गंधक मिला आक के दूध के साथ अच्छी तरह घोंटकर धूप में सुखा लें। अब इसको सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें। इस प्रकार गन्धक के साथ के तीन गजपुट देने से काँसे की सुन्दर भस्म हो जाती है ॥ २८, २९ ॥