रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाबिंशस्तरङ्गः ५७३ पित्तलरसायनम् पित्तलं कान्तकं व्योमसत्त्वं मृतं कीटविद्वेषणं त्र्यूषणं तुल्यकम् । होमधान्याजमोदाग्निभल्लातकब्रह्मबीजोद्भवत्क्षोदसंयोजितम् ॥१६॥ रक्तिकाद्धोन्मितं मासमासेवितं नाशयेद् दारुणां श्वेतकुष्ठव्यथाम् । बह्निसन्दीपनं त्वामसम्पाचनं शूलनिर्मूलनं कीटकोत्सादनम् ॥२०॥ अथ पित्तलरसायनम्—व्योमसत्त्वमभ्रसत्त्वम्, कीटविद्वेषणं विडङ्गम्, होम- धान्यं तिलाः, अग्निः चित्रकः, ब्रह्मबीजम् पलाशबीजम् ॥ १६-२० ॥ भा.टी.-पित्तलभस्म, कान्तलौहभस्म, अभ्रकसत्वभस्म, विडङ्ग, सोंठ, पीपर, मरिच, तिल, अजमोदा, चित्रक, शुद्ध भेलावा और पलास का बीज, ये सब समान भाग लेकर आधी रत्ती की मात्रा से मास पर्यन्त खाने से भयंकर श्वेतकुष्ठ दूर होता है और अग्निवृद्धि, आमदोष का पाचन, शूल का नाश तथा कीटों का नाश करता है ॥ १६, २० ॥ अथ कांस्यस्य नामानि कंसोयं कांस्यक कास्यं घोषपुष्पञ्च घोषकम् । घोषो घोषं वह्निलोहं तदेव परिकीर्तितम् ॥ २१ ॥ भा.टी.-कंसीय, कांस्यक, कांस्य, घोषपुष्प, घोषक, वह्निलोह, घोष, ये सब नाम काँसे के कहे जाते हैं ॥ २१ ॥ कांस्यस्य निर्माणप्रकारः रविलोहं वेदभागमितं विधिविशोधितम् । आगिकं विमलं वङ्गं गाढं मूषागतं धमेत् ॥ २२ ॥ विद्रुतं जायते रम्यं वरघोषं तु कांस्यकम् । एवं विनिर्मितं कांस्यं मारणाय प्रयोजयेत् ॥ २३ ॥ भा.टी.-अच्छी तरह शुद्ध ताम्र चार भाग और शुद्ध वंग एक भाग लेकर दोनों को एक मूषा में रखकर तीव्र गति से तपायें। जब दोनों पिघलकर एक हो जायँ तो इसको ढाल लें। इस प्रकार करने से सुन्दर उत्तम काँसा बन जाता है। इसी काँसे को भस्म करने के काम में लाना चाहिए ॥२२, २३॥ ग्राह्यकांस्यस्य स्वरूपम् सुनादं भास्वरं स्निग्धं श्वेतं मृदु च निर्मलम् । घनाग्निसहमत्यन्तं कांस्यं ग्राह्यमिहोच्यते ॥ २४ ॥ ग्राह्यकांस्यं सुनादमिति। उक्तं हि-"श्वेतं दीप्तं मृदु ज्योतिः शब्दाढ्यं स्निग्धनिर्मलम् । घनाग्निसहसूत्राङ्गं कांस्यमुत्तममीरितम् ॥” इति ॥ २४ ॥