भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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५७२ रसतरङ्गिणी सम्पुट में अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूँके देवें। इस प्रकार तीन बार गजपुट में फूँकने से पीतल की सुन्दर काजल के सदृश काले रंग की उत्तम भस्म हो जाती है। इस भस्म में वान्ति भ्रान्ति आदि ताम्र के आठ दोष नहीं रहते हैं ॥१२-१४॥ तृतीयो मारणप्रकारः पत्रीकृतं पित्तलं तु समगन्धशिलान्वितम्। कन्यानीरेण सम्पिष्टं शोषितं सम्पुटे न्यसेत् ॥१५॥ त्रिवारं पुटयेदेवं भस्म स्यात्कज्जलप्रभम्। एवं मृतं पित्तलं तु वीनशङ्कः प्रयोजयेत् ॥१६॥ तृतीये प्रकारे—समगन्धशिलान्वितमिति गन्धके शिलया च पृथक् सम- भागेन योजितम् ॥ १५, १६ ॥ भा.टी.—शुद्ध पीतल चूर्ण के समभाग शुद्ध गन्धक और शुद्ध मैनसिल मिलाकर घीकुआर के रस के साथ अच्छी तरह मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इस सूखे हुए चूर्ण को सम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें। इस प्रकार गन्धक और मैनसिल के साथ तीन गजपुट देने से पीतल की काजल के सदृश काली भस्म हो जाती है ॥ १५-१६ ॥ मृतपित्तलस्य गुणाः सुमृतं पित्तलं रूक्षं तिक्तं नातिविलेखनम्। कृमिघ्नं कुष्ठशमनं पाण्ड्वामयविनाशनम् ॥१७॥ पित्तलं सम्यङ्ग्मृतं रूक्षादिगुणम्। प्रयोगस्ताम्रवत्। मात्रा तु यशदयोगात् गुञ्जापर्यन्तमपि इति विशेषः ॥ १७ ॥ भा.टी.—उत्तम विधि से बनी हुई पीतल की भस्म रूक्षगुण, तिक्तरस और कुछ लेखन कर्म करनेवाली है। इसके सेवन से उदरकृमि, कुष्ठ रोग तथा पाण्डुरोग नष्ट होते हैं ॥ १७ ॥ पित्तलस्य प्रयोगमात्रानिरूपणम् पित्तलस्य योगस्तु रविलोहसमो मतः। गुञ्जार्धतस्तु गुञ्जैकमिता मात्रा च युज्यते ॥१८॥ भा.टी.—पीतल की भस्म की प्रयोगविधि ताम्रभस्म के समान ही सम- झनी चाहिये। और इसकी मात्रा आधी रत्ती से लेकर एक रत्ती तक प्रयोग की जाती है ॥ १८ ॥