रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वाविंशस्तरङ्गः ५७१ द्वितीयः शोधनप्रकारः तनुपत्रीकृतं तप्तं रजनीरजसा युते । क्षिप्तं निर्गुण्डिकातोये पित्तलं शुद्धिमाप्नुयात् ॥६॥ . भा.टी.—पीतल के पतले-पतले पत्र बनाकर अग्नि में गरम करे, जब अच्छी तरह लाल वर्ण के हो जायें तो उन्हें निर्गुण्डीस्वरस में हल्दी का चूर्ण डाल उसमें बुझा दें । इस प्रकार सात बार करने से पित्तल शुद्ध हो जाता है ॥६॥ अथ पित्तलमारणस्य प्रथमः प्रकारः सूक्ष्मपत्रीकृतं शोधितं पित्तलं तुल्यगन्धान्वितं खल्वयन्त्रे न्यसेत् । पेषयेद्भास्करक्षीरसंयोजितं शोषितञ्चातपे सम्पुटे विन्यसेत् ॥१०॥ लेपिते मृत्स्नया पङ्कपिण्डाभया त्वग्निवारं पुटेद्वारणाख्ये पुटे । मारितं पित्तलं त्वत्र रीत्यानया जायते सुन्दरं कज्जलाभं परम् ॥११॥ मारणप्रकारः सूक्ष्मेति । भास्करक्षीरं अर्कदुग्धम् । अग्निवारं त्रिवारम् । पङ्कपिण्डाभयेति घनपंकेनेति यावत् । वारणाख्ये गजपुटे ॥ १०, ११ ॥ भा.टी.—शुद्ध पीतल को रेती से रेत कर चूर्ण बना लें । इसको खरल में डालकर उसमें पीतल समभाग शुद्ध गन्धक मिलाकर उसको आक के दूध के साथ खूब अच्छी तरह मर्दन कर धूप में सुखा लें । अब इसे एक सम्पुट में बन्द कर दें और इसको गाढ़े-गाढ़े मिट्टी के कीचड़ से लेप करके सुखा लें । सूखने के बाद इस सम्पुट को गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार गन्धक के साथ तीन गजपुट देने से पीतल की काजल के सदृश काले रंग की उत्तम भस्म हो जाती है ॥ १०, ११ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः तनुपत्रीकृतं शोधितं पित्तलं पलपञ्चकम् । समहिङ्गुलतालाभ्यां मर्दितं कन्यकाम्भसा ॥१२॥ सम्पुटस्थं ततः कृत्वा वारणाख्ये पुटे पुटेत् । त्रिधैवं पुटितं यत्नात् पित्तलं याति पञ्चताम् ॥१३॥ कज्जलाभं भवेद्भस्म रमणीयतरं शुभम् । इत्थं मृतं पित्तलं तु भवेद्-भ्रान्त्यादिवर्जितम् ॥१४॥ भा.टी—शुद्ध पीतल का चूर्ण पाँच पल लेकर खरल में डालें और इसमें पाँच पल शुद्ध हिंगुल और पाँच पल शुद्ध हरताल भी डाल दें । फिर इसको घीकुंआर के रस से खूब मर्दन करके सुखा लें । इस सूखे हुए चूर्ण को एक